शब्दव्युत्पत्तिशास्त्र या एटीमोलॉजी के अलावा उस शब्द का ऐतिहासिक सन्दर्भ भी उस शब्द के भावार्थ को पलटने की एक अच्छी रणनीति है और इसका उपयोग प्रस्तुत शब्द के साथ नकारात्मक भाव सम्बद्ध करने के लिए भी किया जाता है यथा "सेना ऐतिहासिक रूप से भाड़े के हत्यारे-बलात्कारियों का संगठित समूह है" [sic]। "शब्दा: कामधेनव:"और एक अच्छे लेखक को पास इस कामधेनु को दुहने की कला बखूबी होती है। एक अच्छा और पका हुआ लेखक यह जानता है कि विमर्श में प्रयुक्त व्यंजनात्मक और लक्षणात्मक अर्थ की आलोचना से उस शब्द को उसके अविधात्मक अर्थ पर ज़ोर देकर कैसे बचाया जाए।
अब एक शब्द लेते हैं "नक्सली",इस शब्द के साथ आम जनता की जो भावना जुड़ी है वह भावना इस शब्द से अभिव्यक्त होती है बजाय इसके अविधात्मक अर्थ के और इस आंदोलन के नक्सलबाड़ी गाँव मे उतपन्न होने के।
तुम गधे हो कहने पर यह तर्क देना की मेरा जीन, मेरा फेफड़ा, मेरा रक्त, मेरा गुर्दा आदि गधे के जिन, फेफड़ा, रक्त, गुर्दा आदि से अलग है अतः मैं गधा नही हूँ संवाद की मूल भावना से उस मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा पीछा छुड़ाना है जिसे मनोविज्ञान में डिफेंस बाई इंटेलेक्चुअलाइज़ेशन कहते हैं। और यह डिफेंस, यह बौद्धिककरण सार्थक संवाद को, सार्थक विमर्श को तत्क्षण रोक देता है।
प्रश्न यह नही है कि गधे की जीववैज्ञानिक परिभाषा क्या है, प्रश्न यह है कि मुझे गधा क्यों कहा गया। प्रश्न यह नही है कि वामपंथ शब्द की उतपत्ति क्या है बल्कि प्रश्न यह है कि यह शब्द पूरी दुनिया मे एक नकारात्मक शब्द क्यो बन गया।
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