धर्मो के वर्गीकरण के कई आधार हो सकते हैं। ईश्वर की अवधारणा की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर धर्मो को "स-ईश्वर" और "ईश्वर-विहीन" धर्मो में वर्गीकृत किया जाता है। डॉ● या● मसीह अपनी पुस्तक "सामान्य धर्मदर्शन और दार्शनिक विश्लेषण" में धर्मो को उपासनामूलक और समाधिमूलक दो प्रकारों में वर्गीकृत करते हैं। नृवैज्ञानिक धर्मो को आदिम, व्यक्तिगत तथा संगठित या सांस्थानिक आदि के रूप में वर्गीकृत करते हैं। धर्म का एक अन्य वर्गीकरण धर्म की भौगोलिक उत्पत्ति तथा उसके अंदर मौजूद सांस्कृतिक-दार्शनिक विशिष्टता और इस विशिष्टता की निरंतरता के आधार पर भी किया जा सकता है। इस वर्गीकरण का आधार इन धर्मो में व्याप्त वह मूल दृष्टि है, जो धर्मो की उत्पत्ति के साथ-साथ युगों-युगों तक उस धर्म-विशेष को निरन्तरता और वैशिष्ट्य प्रदान करती है।
यद्यपि बौद्ध धर्मावलंबियों की संख्या भारत के बाहर ही अधिक है तथापि इसे भारतीय धर्म ही कहा जाता है, क्योंकि इसमें भारतीय मनस और मनीषा की ही मूल दृष्टि और परम्परा विद्यमान है।
ध्यातव्य है कि भारत की भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण कर बौद्ध धर्म जब चीन, जापान और कम्बोडिया आदि देशों में पहुँचा तो यह वहाँ मौजूद दृष्टियों में विलीन नही हो गया बल्कि दृष्टियों के संश्लेषण में इसकी दृष्टि का ही तत्त्व प्रभावी, और उस संश्लेषण का गाइडिंग फैक्टर रहा।
इसी प्रकार इस्लाम और ईसाइयत के भारत आगमन के पश्चात जो संश्लेषण हुए उनमे प्रभावी तत्त्व वही मूल दृष्टि रही जो अब्राहमीय परम्परा की अपनी विशिष्टता मानी जाती है।
अब्राहमीय धर्म, जिसके अंदर यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम आता है, में मौजूद दृष्टि के साथ भारतीय दृष्टि की तुलना कर भारतीय धर्म के अर्थ को और अधिक स्पष्ट किया जा सकता है।
■अब्राहमीय और भारतीय दृष्टि की तुलना:
अब्राहमीय परम्परा का जन्म "सेमेटीक संस्कृति" में हुआ है। सेमेटीक शब्द का आधार "सेम" शब्द है जो "नूह" के तीन पुत्रो में से थे जिनका वर्णन बाईबल के जेनेसिस अध्याय में मिलता है। अब्राहम इसी परम्परा के महापुरुष हैं जिन्हें ईसाई, यहूदी और मुसलमान तीनो स्वीकार करते हैं।
लूईस मैसीगनॉन के अनुसार "अब्राहमिक धर्म", इस शब्द का भावार्थ यह है कि इस्लाम, यहूदी तथा ईसाइयत, ये तीनो एक ही आध्यात्मिक स्रोत से निकलते हैं।
विभिन्न अब्राहमिक धर्मो का एकीकरणीय कारक इस बात पर सहमति है कि ईश्वर ने स्वयम को पेट्रियार्क अब्राहम के सम्मुख प्रकाशित किया।
भारतीय परंपरा में वेद महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। वेदों की प्रामाणिकता स्वीकार करने वाले सम्प्रदायों को आस्तिक तथा अस्वीकार करने वाले सम्प्रदाय नास्तिक कहे जाते हैं।
वेदों की स्थापनाओं के विपरीत जो अन्य स्थापनाएं हुईं उनमे बौद्ध और जैन स्थापनाएं प्रमुख हैं और ये भारतीय परंपरा में नास्तिक धर्म हैं।
नास्तिक और आस्तिक सम्प्रदायों के मध्य अंतर अवश्य है किंतु यह अंतर पाथेय अथवा मार्ग में पड़ने वाली आवश्यकताओं के विषय मे है, पथ और गन्तव्य के विषय मे इनमे मतैक्य है:
आस्तिक और नास्तिक दोनों ही दृष्टियाँ समय और संसार के चक्रीय स्वरूप के विषय मे सहमत हैं। इन दोनों दृष्टियों को कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म मान्य है। जन्म-मरण चक्र का निषेध ही इन दोनों सम्प्रदायों का लक्ष्य है। दोनों ही दृष्टियाँ अविद्या को दुखो का मूल कारण स्वीकार करती हैं।
अब्राहमीय तथा भारतीय दृष्टियों की तुलना निम्न कुछ बिंदुओं के विषय मे उनकी वैचारिक स्थापनाओं के आधार पर की जा सकती है-
●मानवीय अस्तित्व: मानव क्या है, मानवीय अस्तित्व के क्या मायने हैं, यह मानवीय चेतना में मूलभूत प्रश्न हैं। मानव विषयक मूल समस्याओं के अध्ययन और उनके समाधान प्रस्तुत करने के पूर्व मानवीय अस्तित्व विषयक सिद्धान्त एक प्रागपेक्षा है। धर्मो में मानवीय अस्तित्व के प्रति दृष्टि का होना अनिवार्यता है। इस दृष्टि के अनुरूप ही धर्मो में प्रदत्त अस्तित्व का निषेध और विस्तारण होता है, जहाँ इन क्रियाओं द्वारा पीड़ाओं का शमन अथवा उनके शमन का प्रयास किया जाता है।
अब्राहमीय तथा भारतीय परंपरा में मानवीय अस्तित्व के प्रति भिन्न दृष्टि रही है। अब्राहमीय दृष्टि में मनुष्य जन्मना पापी है। वह आदम और ईव द्वारा किए गए आद्य पाप में मनुष्य होने के नाते सहभागी है। ईश्वर की करुणा के बिना वह इस पाप से मुक्त नही हो सकता।
भारतीय दृष्टि मनुष्य के दिव्य स्वरूप को स्वीकार करती है। मनुष्य अविद्या के कारण अपने यथार्थ रूप को विस्मृत कर ससीम हो जाता है तथा इस ससीमता के फलस्वरूप सांसारिक सुख-दुख का अनुभव करता है। यहाँ धर्म का उद्देश्य ईश्वर को द्रवित कर उसकी करुणा प्राप्त करना नही बल्कि, अविद्या का नाश कर मनुष्य को उसके वास्तविक दिव्य रूप में प्रतिष्ठित करना है।
पीड़ा मानव-जीवन का यथार्थ है। ईश्वर की उपस्थिति में मानवीय पीड़ा का यथार्थ, अब्राहमीय धर्मो में इस विरोधाभास पर विचार करने के लिए बाध्य करता है। चूंकि ईश्वर के विषय मे यह स्थापना है कि वह सर्वशक्तिमान, दयालू तथा मानव का सृष्टिकर्त्ता है अतः ईश्वर को इस उत्तरदायित्व से मुक्त करने के लिए मानव का आद्य रूप, "ईश्वरीय प्रतिरूप" या "ईमेगो डेई" स्वीकार किया जाता है, साथ ही मनुष्य में पतित होने की प्रवृत्ति भी स्वीकार करनी पड़ती है क्योंकि वह शैतान के बहकावे में आकर ईश्वरीय आदेश की अवज्ञा करता है।
मानव ईश्वरीय प्रतिरूप होने के बावजूद, उसका शैतान के बहकावे में आकर ईश्वरीय आदेश की अवज्ञा और तदोपरांत अशुभ की की उपस्थिति अब्राहमीय धर्म के लिए एक बहुत बड़ी समस्या प्रस्तुत करती है।
ऐसा नही है कि भारतीय धर्मो ने इस समस्या के भारतीय संस्करण में इसका सम्यक समाधान प्रस्तुत कर दिया है। अविद्या और कर्म सिद्धान्त थोड़े सन्तोषप्रद अवश्य हैं लेकिन, यहाँ भी यह यक्ष प्रश्न उपस्थित रहता है कि मानव का यथार्थ रूप "दिव्य" होने के बावजूद वह अविद्याग्रस्त होता ही क्यों है?
धर्म एक अनवरत प्रक्रिया है और उक्त विरोधाभासों का हल धर्म की निरंतरता में ही प्राप्त किया जा सकता है। फ्रेंच दार्शनिक गैब्रियल मार्शल समस्या एवम रहस्य में भेद करते हैं। उनके अनुसार रहस्य प्रश्नों को समस्या प्रश्नों की भांति हल नही किया जा सकता, इनको केवल "रिस्पॉन्ड" किया जा सकता है।
रिस्पॉन्स को किसी ऑथोरिटी द्वारा अनुशाषित करना धर्म के मूल अभिप्राय की ही उपेक्षा है क्योकि सत्ता का विचार पीड़ा के रहस्य प्रश्नों के रिस्पॉन्स के क्रम में उभरता है। भारतीय दृष्टि इस तथ्य से अवगत है अतः उद्धरेदात्मनात्मानम्" (अध्याय 6-5) तथा अप्प दीपो भव का उद्घोष करती है।
● विश्वास-तन्त्र और अन्वेषण: यद्यपि धर्मो में मनुष्य अपने प्रदत अस्तित्व के निषेध द्वारा एक सत्व या सत्ता रचता है तथा इस सत्ता से स्व को विविध रूपो में सम्बद्ध करता है, कई स्थितियों में इस सत्व तथा इसके मूर्तकरण की प्रक्रिया एक रूढ़ रूप ले लेती है। यदि यह मान्यता उपस्थित हो कि सत्ता और मानव के स्व का उस सत्ता से सम्बद्धता हेतु किसी की मध्यस्थता आवश्यक है, तो यह स्थिति प्रायः मुक्त अन्वेषण का विरोध करती है। अब्राहमीय धर्मो में वह सत्ता स्वयम को "मानवो में से चयनित" को ही अपनी प्रकाशना करती है अतः इनमें नबी और पैगम्बर की उपस्थिति अनिवार्य है। यहाँ नबी या पैगम्बर द्वारा अनुभूत सत्य ही अंतिम होते हैं। यह कहना गलत नही होगा कि नबी या पैगम्बर ही जिस सत्व का निर्माण करता है उसे स्वीकार करना अन्यो का कर्तव्य होता है। इसे जस्टिफाई करने के लिए विश्वासो का एक तंत्र विकसित किया जाता है जिसके विषय मे प्रश्न करना निषिद्ध माना जाता है।
इसका परिणाम यह होता है कि समीक्षा के अभाव में इन धर्मो के रूढ़ि हो जाने की सम्भाव्यता अपने अपने प्रबलतम रूप में इनमे विद्यमान रहती है।
भारतीय धर्मो में यद्यपि गुरु, आप्तपुरुष, जिन, बुद्ध पुरुष आदि की अवधारणाएं विद्यमान हैं तथापि यहाँ इनका वह स्थान नही होता जो अब्राहमीय धर्मो में नबी का होता है। यहाँ आप्तपुरुष व्यक्ति के अपने निजी अन्वेषण में सहायक मात्र होते हैं।
● उपागम: सत्ता या सत्व के विचार का प्रादुर्भाव पीड़ा के रहस्य प्रश्नों की पृष्ठभूमि में इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढने के क्रम में होता है। सत्ता या सत्व निर्माण के पश्चात इसको स्व से सम्बद्ध करने की प्रक्रिया दो रूपों में सम्भव है: सत्ता से प्रारम्भ कर स्व तक पहुंचा जाय या स्व से प्रांरभ कर सत्ता तक पहुंचा जाय।
सत्ता से प्रारम्भ कर स्व तक पहुंचने की प्रक्रिया अधोगामी उपागम है जबकि स्व से आरम्भ कर सत्ता तक पहुंचना उर्ध्वगामी।
अब्राहमीय परम्परा अधोगामी उपागम की प्रकिया अपनाती है। इस उपागम को अपनाने के कारण ही ईश्वर जगत और मानव के सृष्टिकर्त्ता के रूप में अधिष्ठापित होता है। यहाँ ईश्वर स्वयम जगत नही है बल्कि वह जगत और मानव से भिन्न है। ईश्वर जगत के साथ संवाद पैग़म्बरों अथवा नबियों के माध्ययम से स्थापित करता है और उनके द्वारा मानवता को समय-समय पर आवश्यक निर्देश देता है।
भारतीय परम्परा उर्ध्वगामी उपागम अपनाती है। इस उपागम की परिणति एक ओर जहाँ "अयमात्मा ब्रह्म" महावाक्य में होती है वहीं नास्तिक बौद्ध धर्म मे प्रत्येक व्यक्ति एक "शक्य बुद्ध" है। नास्तिक जैन परम्परा में भी प्रत्येक व्यक्ति अनन्त चतुष्टय: अनन्त ज्ञान, अनन्त श्रद्धा, अनन्त वीर्य और अनन्त आनंद से युक्त होता है। जीवन का उद्देश्य इन सुषुप्त अनन्तताओं की जागृति है।
सर्वेश्वरवाद या पैनथीइज़्म तथा पैनेनथीइज़्म की स्थापना भी इसी उपागम का परिणाम है। पैनथीइज़्म के अनुसार "सब कुछ ईश्वर है" तथा पैनेनथीइज़्म की मान्यता में "सब कुछ ईश्वर में", है। जहाँ पैनथीइज़्म में ईश्वर जगत के रूप में नि:शेष हो जाता है वहीं, पैनेनथीइज़्म जगत के रूप में ईश्वर को एग्जॉस्ट नही करता बल्कि उसकी सत्ता जगत के बाहर भी विद्यमान रहती है।
जैन और बौद्ध धर्मो के उर्ध्वगामी उपागम की पद्धति अपनाने के फलस्वरूप ही इनमे ईश्वर की अवधारणा की अनुपस्थिति के बावजूद ये धर्म के अंतर्गत शामिल किए जाते हैं।
यह नही है कि भारतीय परंपरा अधोगामी उपागम की प्रक्रिया नही अपनाती। ईश्वर के साकार स्वरूप की उपस्थिति में मानव और ईश्वर के सम्बंध को अधोगामी उपागम की अनुपस्थिति में सृजित नही किया जा सकता। लेकिन, जहाँ अब्राहमीय परम्परा में यह अपने विशुद्ध रूप में उपस्थित है, भारतीय परंपरा में अधोगामी उपागम, उर्ध्वगामी उपागम की स्थापनाओं की ओर झुका हुआ है जिसकी व्यवहारिक परिणति यह होती है कि व्यक्ति स्व को ईश्वर से अलग भी मानता है और एक भी।
आचार्य शंकर द्वारा इसकी बड़ी अच्छी व्याख्या की गई है जहाँ निराकार, माया की उपस्थिति में साकार बन जाता है। शांकर दर्शन में ईश्वर को "मायोपहित ब्रह्म" कहा जाता है।
डॉ●एच●पी●सिन्हा लिखते हैं, "यद्यपि शंकर के दर्शन में ईश्वर और ब्रह्म का अंतर दीखता है फिर भी उनके दर्शन में ईश्वर तथा ब्रह्म के बीच निकटता का सम्बंध है। ब्रह्म और ईश्वर को मिलाकर शंकर के दर्शन में चार अवस्थाओ का उल्लेख हुआ है। इनमे तीन ईश्वर और एक ब्रह्म की अवस्था है" 【भारतीय दर्शन की रूप रेखा, पृष्ठ 304】। वह आगे लिखते हैं, "जब तक माया कार्यान्वित नही होती तब तक वह ईश्वर है। ज्योंहि माया अपना कार्य प्रारंभ कर सूक्ष्म पदार्थो को बना डालती है त्योंहि उसे "हिरण्यगर्भ" कहा जाता है। जब स्थूल पदार्थ का निर्माण हो जाता है तब ईश्वर का पूर्ण विकसित रूप विराट या वैश्वानर कहा जाता है। ये तीनो रूप असत्य और मायावी हैं। ब्रह्म इनसे प्रभावित नही होता। इन तीनो अवस्थाओ से अलग ब्रह्म का रूप है जिसे वास्तविक तथा परमार्थत: सत्य कहा गया है" 【वही, पृष्ठ 305】
●एकेश्वरवाद, मार्ग और मतिग्रस्ति: अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है। "ईश्वर एक है", इस कथन का अभिप्राय भारतीय तथा अब्राहमीय परम्परा में गुणात्मक रूप से अलग है। जहाँ अब्राहमीय परम्परा में "एक" अलगाव और यूनिकनेस का भाव व्यक्त करता है वहीं, भारतीय परम्परा "एक" शब्द के अंदर सबको समाहित कर लेती है।
भारतीय परंपरा में एकेश्वरवाद, वैचारिक स्तर पर जगत के विविध घटनाक्रमो में एक सामान्य सिद्धान्त ढूंढ़ने के क्रम में, एक आंतरिक निष्पत्ति है। मैक्सम्यूलर इसे बहुदेववाद से एकाधिदेववाद तथा एकाधिदेववाद से एकेश्वरवाद की स्थापना, इस क्रम में स्वीकार करते हैं। वैदिक युगीन मानव ने घटनाक्रम के अलग-अलग कारणों की जगह उनमे एक आदि कारण का अन्वेषण प्रारम्भ किया। यह प्रवृति शीघ्र ही "एकाधिदेववाद" या "हिनोथीइज्म" के रूप में अभिव्यक्त हुई। मैक्सम्यूलर ने इसे एकत्व की दिशा में जाने की सहज प्रवृति की अचेतन अभिव्यक्ति मानते हुए इसे बहुदेववाद और एकेश्वरवाद के मध्य विकास की एक निश्चित व्वयस्था माना।
प्रो● एम●हिरियन्ना लिखते हैं, "यह माना जा सकता है कि यह 'अवसरवादी सर्वेश्वरवाद', जैसा कि मैक्सम्यूलर के "हिनोथीइज्म" को नामान्तर से कहा गया है, सब मिलाकर पिछले समय के नाना देवताओं के स्थान पर अकेले ईश्वर में विश्वास पैदा करने में सहायक हुआ" 【भारतीय दर्शन की रूपरेखा, पृष्ठ 37】
अब्राहमीय परम्परा में एकेश्वरवाद की स्थापना का क्रम यह नही रहा है। यहाँ एकेश्वरवाद का सन्दर्भ अपेक्षाकृत सामाजिक अधिक रहा है तथा कई परिस्थितियों में इसे वाह्य रूप से अथवा समझौते के रूप में आरोपित किया गया है।
याहवा यहूदी धर्म के देवता हैं। प्रारम्भ में यह एक जनजातीय देवता थे जो जनजातियों के तत्कालीन प्रभावशाली सभ्यताओं के संग संघर्ष में, इनके माध्ययम से उस जनजाति की, जिसके यह देवता थे, अपने मे उत्कृष्टता के विश्वास को, याहवा के एकमात्र स्वामित्व या लॉर्डशीप के द्वारा व्यक्त किया गया है।
जनजातियों द्वारा शासन तंत्र और राज्य के विकास के साथ यह उनके एकमात्र राष्ट्रीय देवता बन गए और तत्कालीन मौजूद अन्य जनजातियों के देवताओं की विशेषताओं और गुणों का इनमे विलय कर दिया गया।
पीटर स्लॉटरज़िक के अनुसार, प्राचीन बेबीलोनियन, मिस्री, हित्ती बहुदेववाद के विरोध के रूप में यहूदी एकेश्वरवाद एक प्रतिरोध के धर्मशास्त्र के रूप में जन्मा। यह पराजय के अंदर विजय का धर्म था। जहाँ यहूदियों के धर्म उनके अपने लोगों के मध्य ही सीमित रहा, ईसाइयत ने इसके सन्देश को सार्वभौमिक सत्य के रूप में उद्घाटित किया। इस्लाम इस सार्वभौमिकता को सैन्य तथा राजनैतिक विस्तार के रूप में एक नए स्तर तक ले गया। 【गॉड्स ज़ील: बैटल औफ थ्री मोनोथीइज़्म】
तौहीद इस्लामी एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति है। शिर्क, तौहीद की प्रतिपक्षता है। इस्लामी शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ अल्लाह के साथ उस के स्वामित्व, इबादत या नाम और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना है। शिर्क इस्लाम मे घोरतम पाप है।
क़ुरान में आया है, "अल्लाह त'आला अपने साथ शिर्क किए जाने को माफ़ नही करेगा, और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उसने अल्लाह पर भारी आरोप गढ़ा 【सुरतुन निसा :48】
सम्भवतः अरब समाज की तत्कालीन परिस्थितियों में एकेश्वरवाद की यह व्याख्या और आरोपण एक ऐतिहासिक बाध्यता रही हो क्योंकि अरब संस्कृति ज्ञान-विज्ञान की वाहक मुहम्मद साहब की अगुवाई में तौहीद और इस्लाम की क्रांति के बाद ही बनी लेकिन, तत्कालीन ऐतिहिसिक परिस्थितियों का हल आज के समाज पर आरोपण समय और इतिहास को ही नकार देना है। यह इनकार प्रायः अब्राहमीय धर्मो में एकेश्वरवाद के प्रति मतिग्रस्ति उतपन्न करता है जिसका परिणाम अब्राहमीय धर्मो के आपसी टकराहट के साथ-साथ उनके साथ भी टकराहट में परिलक्षित होता है जो अहल-ए-किताब नही हैं।
मानव का मानव से समानता होने के बावजूद प्रत्येक मानव व्यक्तिगत स्तर पर एक विशिष्ट चरित्र का अधिष्ठाता होता है। संस्कृतियों के विषय मे भी यह बात लागू होती है। व्यक्तियों की भांति ही संस्कृतियों की भी अपनी चरित्रगत विशेषताएँ होती हैं। संस्कृतियों की इन अपनी चरित्रगत विशेषताओं का प्रभाव इनमे उतपन्न धर्मो पर भी पड़ता है जिसके कारण धर्म, मज़हब और रिलीजन का वाच्यार्थ समान होने के बावजूद इनके भावार्थ अलग हो जाते हैं। कई परिस्थितियों में इनका भावार्थ इतना प्रभावी हो जाता है कि यह अपनी सीमा का अतिक्रमण कर वाच्यार्थ को ही प्रभावित करने लगता है। विशुद्ध सांस्कृतिक सन्दर्भ में धर्म केवल अपने भावार्थ के साथ ही उपस्थित होता है अतः यहाँ धर्म, मजहब और रिलीजन के अर्थ समानार्थी नही रह जाते।
एक संस्कृति के रूप में भारत, धर्म का अपना एक विशिष्ट अर्थ अभिप्राय और अवधारणा रखता है।
●रिलीजन और धर्म: यदि अत्यंत सरल शब्दों में रिलीजन और धर्म का अंतर स्पष्ट करना हो तो "बांधने" तथा "धारण करने" के निहितार्थ द्वारा इस अंतर को स्पष्ट किया जा सकता है। रिलीजन जहाँ बांधने की प्रक्रिया है, वहीं धर्म धारण करना है। व्युत्पत्ति की दृष्टि से "रिलीजन" शब्द लैटिन के "रिलाएगर" शब्द से व्युत्प्न्न है जिसका अर्थ "कस के बंधना" होता है।
धर्म शब्द की उतपत्ति संस्कृत के "धृ" धातु से हुई है जिसका अर्थ है, स्वभावतः धारण करना। शब्दसागर के अनुसार धर्म शब्द का प्राचीनतम अर्थ ऋगवेद (1.22.18) में स्वभाव या नित्य नियम ही है अतः धर्म, धरण करने के भाव मे प्रयुक्त होता है; धारयते इति धर्म:। क्या धारण किया जाय यह धर्म का प्रतिपाद्य विषय है।
मनुष्य अपने वास्तविक रूप में सच्चिदान्द स्वरूप है। अविद्या के कारण वह अपने यथार्थ रूप को विस्मृत कर गया है। धर्म उसके वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार करने में आवश्यक गुणों का धारण है।
रिलीजन का निहितार्थ बन्धन और बांधना, इसकी एक महत्वपूर्ण अवधारणा "कोवेनेन्ट" में भी अभिव्यक्त होती है। कोवेनेन्ट का अर्थ अनुबन्ध या करार होता है। जेर्मियाह कि पुस्तक (31.33) में लिखा है कि ईश्वर "इज़रायल के घराने की स्थापना करेगा"। यह अनुबन्ध में, ईश्वर का वचन है। मानव के लिए इस अनुबंध में यह शर्त है कि वह उस ईश्वर के एकमात्र स्वामित्व को स्वीकार करे। ईसाइयो के अनुसार भी "नया करार" मानव की अंतिम नियति के बारे में है तथा ईश्वरीय साम्राज्य की स्थापना से सम्बंधित है। इस करार के संदर्भ में मनुष्य का कर्तव्य यह स्वीकार करना है कि ईसा मसीह ने उसके पापों को ढोया तथा वह उनके एकमात्र उद्धारक हैं।
बन्धन का केवल आध्यात्मिक आयाम ही नही है बल्कि रिलीजन में इस बन्धन के आयाम को राजनैतिक, सैन्य तथा विस्तारवादी सन्दर्भ भी दिया गया है क्योंकि यहूदी धर्म को छोड़कर बाकी अब्राहमीय मज़हब प्रोसेलिटाइजिंग पन्थ हैं।
ईश्वर और मनुष्य के मध्य करार को आधार बनाकर रिलीजन की विस्तारवादी प्रवृति ने कई संस्कृति एवम सभ्यताओं को नष्ट भी किया है।
धर्म की कभी विस्तारवादी संकल्पना नही रही है। इसकी प्रवृति प्रारम्भ से ही समाहित करने की रही है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म मे वैदिक, अवैदिक, पौराणिक, तांत्रिक, शाबर सभी समवेत रूप से पाए जाते हैं। यही नही इसने अपनी समन्वयकारी प्रवृति और ग्राह्यता के कारण इस्लामी तत्वो को भी अपने अंदर आत्मसात किया।
आत्मसात करने में अंतरात्मा की सहमति होती है, बन्धन में यह स्वीकृति नही भी हो सकती यदि इसे बलात थोपा जाय। इस प्रकार का बंधन केवल वाह्य हो सकता है क्योंकि वह मूल्य, वह इंजँक्शन जिनके द्वारा व्यक्ति और समाज को बांधा गया है, सम्भव है कि वह इनके अंतरात्मा को स्पर्श ही न करे और अंतरात्मा अपने मौलिक मूल्यों की अभिव्यक्ति का उपयुक्त समय या एक नया तरीका ढूंढे। पश्चिम के संदर्भ में यह अभिव्यक्ति मध्यकालीन प्रभाव से दूर पुनर्जागरण मे चर्च की सत्ता के विरुद्ध सेक्युलरिज़्म के रूप में हुई है।
प्रश्न किया जा सकता है कि बन्धन और धारण करने में श्रेष्ठ क्या है। वस्तुतः यह प्रश्न ही निरर्थक है क्योंकि यह प्रश्न जगत में व्याप्त सामाजिक-सांस्कृतिक विविधताओं की उपेक्षा कर देता है। प्रत्येक समाज की अपनी मान्यताएं होती है तथा अपनी एक दृष्टि होती है। इनका अध्ययन करना इनको किसी अन्य समाज या संस्कृति के मानकों पर कस कर जजमेंटल बनने से ज्यादा उचित है।
◆धर्म और पुरुषार्थ: अर्थ का अभिप्राय प्रयोजन है। पुरूषार्थ का अर्थ पुरुष का प्रयोजन है। धर्म, अर्थ, काम एवम मोक्ष चार पुरुषार्थो को स्वीकार किया गया है। इनमे से प्रथम तीन पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ एवम काम त्रिवर्ग कहे गए हैं। इस त्रिवर्ग को साधन तथा चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष को साध्य कहा गया है जो त्रिवर्गो के सम्पन्न होने से स्वतः सिद्ध हो जाता है। पुरुषार्थो में धर्म का स्थान प्रथम है। यह अर्थ एवम काम का नियामक बनकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
पुरुषार्थ की अवधारणा के साथ धर्म का सामाजिक सन्दर्भ प्रारम्भ होता है क्योंकि अर्थ और काम की सिद्धि समाज मे ही सम्भव है
सामाजिक सन्दर्भ में धर्म का दायित्व एक ऐसे सामाजिक प्राणी का निर्माण होता है जो अन्यों की उपस्थिति को अंतरात्मा से स्वीकार करते हुए अपने सांसारिक प्रयोजन की सिद्धि करे। वह समाज जिसमे व्यष्टियों के मध्य संघर्ष न्यूनतम हो, स्थाई होता है। व्यक्तियों के मध्य संगर्ष न्यूनतम रखना इस प्रकार अपने सामाजिक सन्दर्भ में धर्म का दायित्व बन जाता है। इस दायित्व को धर्म व्यष्टियों के ऐसे सृजन द्वारा प्राप्त करता है जो अतःकरण से धर्मसर्वस्वम या गोल्डन रूल के मूल्य से संचालित हों।
अर्थ एवम काम मनुष्य की आवश्यकताएं है, इनकी अनदेखी नही की जा सकती। लेकिन, इन्हें धर्म द्वारा अनुशाषित कर व्यक्ति और समाज तथा व्यक्ति और व्यक्ति के संघर्ष को न्यूनतम स्तर पर रखा जा सकता है। यही कारण है कि पुरुषार्थो का क्रम धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष है।
●धर्मो के लक्षण और स्रोत- मनु ने धर्म के दस लक्षण गिनाए हैं। याज्ञवल्क्य ने नौ, श्रीमद्भागवत के सप्तम स्कंध में धर्म के तीस लक्षण बताए गए हैं। स्मृतियां, श्रुति, सदाचार धर्म के स्रोत हैं। के●वी●आर● आयंगर लिखते हैं कि जब श्रुति, स्मृति और सदाचार से निर्णय न हो पाए तब आत्मतोष का प्रयोग बताया गया है। 【हिन्दू व्यू ऑफ लाईफ अकॉर्डिंग टू धर्मशास्त्र, पृष्ठ 73】
समाज की जटिलता तथा जीवन की आवश्यकताओ के परिप्रेक्ष्य के आधार पर धर्मो का निम्नवत वर्गीकरण किया गया है:
★वर्णधर्म: यह चारो वर्णो के अपने विशिष्ट कर्त्तव्य हैं।
★आश्रम धर्म: जीवन चार आश्रमो में विभाजित है। आश्रमानुसार नियम का अनुपालन आश्रम धर्म है।
★वर्णाश्रम धर्म: यह ऐसे धर्म हैं जिन्हें वर्ण-विशेष में सम्बधित होने के कारण आश्रम-विशेष की अवस्था मे धारण किया जाता है।
★गुण धर्म: वर्ण विशेष के रहने पर भी गुण प्रवर्तन के कारण किसी धर्म को धारण करना गुण धर्म है।
★नैमेत्तिक धर्म: जीवन को मर्यादित रखने हेतू निमित्तवश कुछ कार्यो का करना नैमित्तिक धर्म है।
★सामान्य धर्म: यह सभी के लिए आवश्यक धर्म हैं। इनमे वर्ण देश कालादि की अपेक्षा नही होती।
★आपात धर्म: विशेष आपातकालीन परिस्थितियों में जीवन निर्वाह के लिए अपनाए गए धर्म आपात धर्म हैं।
◆एगेन्स्ट धर्मा: धर्म के पुरुषार्थ के रूप में चर्चा के साथ वेंडी डोनिगर की चर्चा भी आवश्यक है। वेंडी अमेरिका आधारित इंडोलॉजिस्ट हैं और धर्म विशेषकर हिन्दू धर्म पर इन्होंने काफी पुस्तकें लिखी है। इनकी पुस्तक "हिन्दू, एन ऑल्टरनेट हिस्ट्री" काफी विवादों में रही।
वेंडी की चर्चा इसलिए आवश्यक है कि पश्चिम में यह हिन्दू धर्म के ऊपर एक ऑथोरिटी मानी जाती है तथा इनके कार्य से पश्चिम हिन्दू धर्म के विषय मे अपनी अवधारणा बनाता है।
विंडी की पुस्तक "अगेंस्ट धर्मा" का केंद्रीय थीसिस पुरूषार्थो के विषय मे ही है। उनकी स्थापना यह है कि त्रिवर्ग धर्म, अर्थ और काम मे एक द्विपक्षीय संगर्ष होता रहा जिसमे धर्म का अर्थ और काम विरोध करते रहे और यदि उन्होंने धर्म से सहमति जताई तो यह केवल वाह्य था जिसे वह लिप सर्विस कहती हैं।
अर्थशास्त्र तथा कामसूत्र में वर्णित कुछ दृष्टांतो के आधार पर वह यह निष्कर्ष निगमित करती हैं। अर्थशास्त्र तथा कामसूत्र में कुछ ऐसे दृष्टांत है जिन्हें धर्म के उच्च आदर्शो के अनुरूप नही कहा जा सकता यथा, अर्थशास्त्र राजनीति में छल कपट को स्वीकार करता है तथा कामसूत्र अपने प्रतिपाद्य विषय “काम” के कारण विषयासक्ति को धर्म की भांति हतोत्साहित नही करता।
सम्भवतः वेंडी कन्फ्यूज हैं कि यदि अर्थ और काम को धर्म से अनुशाषित होना चाहिए तो इन दृष्टांतो में धार्मिकता नही होने के कारण यह धर्म का विरोध करते हुए धर्म के समानांतर खड़ा होना चाहती है।
वेंडी के अनुसार यह धर्म और अर्थ तथा काम के मध्य टकराहट है।
धार्मिकता की अनुपस्थिति और धर्म के उदात्त आदर्शो की की अनुपस्थिति में अंतर है।
अर्थशास्त्र का प्रतिपाद्य विषय राजनीति है और राजनीति के अपने कम्पलशन्स है जिनको अस्वीकार नही किया जा सकता।
कामसूत्र मनुष्य को यथारूप स्वीकार करता है अतः इसमें भी धर्मशास्त्र के उन उच्च आदर्शो की उपस्थिति का अभाव हो सकता है।
व्यवहार में मात्र उच्च आदर्शो के साथ पूरा समाज नही जी जा सकता। जीवन की आवश्यकताओ के अनुरूप ही आदर्श सम्भव हैं। पुनः कामसूत्र गृहस्त के लिए है न कि त्यागी के लिए साथ ही अर्थशास्त्र राजा के विषय मे है न कि सन्यासी के विषय मे। समाज के सुचारू संचालन के लिए धर्म के साथ अर्थ और काम भी आवश्यक हैं।
अतः यदि अर्थशास्त्र और कामसूत्र धर्मसूत्रों के उच्च आदर्शो से हटते भी है तो यह धर्म के विरुद्ध नही बल्कि जीवन और समाज को सन्तुलित करने के लिए हैं और इस विचलन से पुरुषार्थ की अवधारणा धर्म और अर्थ तथा काम के मध्य संघर्षरत होकर बिखर नही जाता।
■सार: धर्म एक बहुत ही व्यापक शब्द है जो जीवन के समस्त व्यापारों को अपने अंदर समाहित कर लेता है। धर्म की व्यपकता का कारण जीवन और जगत को देखने की वह विशिष्ट भारतीय दृष्टि है, जो जगत को स्व का विस्तार मानती है। जगत, स्व का ही विस्तार होने के कारण अभौतिक स्तर पर समस्त सृष्टि एक ही तत्व है। अतः यहाँ मनुष्य और प्रकृति, प्राणी और प्राणी, पथ एवम पथ का भेद उपस्थित नही होता।
इस दृष्टि के कारण धर्म का अभिप्राय बाध्यकारी नियम नही बल्कि धारिता है। मनुष्य अपने यथार्थ रूप में अनन्तताओं से युक्त एक आध्यात्मिक सत्ता है अतः सद्गुण उसके स्वभावधर्म हैं। इन सद्गुणों को धारण करना ही धर्म है। पुनः मनुष्य निष्क्रिय प्राणी नही है, वह कर्ता है। कर्म सिद्धान्त कभी उल्लंघित नही होते, ऋत का पालन सृष्टि ही नही देवता भी करते है अतः धर्म की अवधारणा में कर्म भी समाहित हैं। जीवन की आवश्यकताओं और व्यक्ति विशेष की प्रवृतिगत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए धर्म विविध कर्मो को भी प्रस्तावित करता है। यह कर्म उसके सामाजिक तथा व्यक्तिगत आयामो में संतुलन बनाते हुए उसे उसके यथार्थ रूप की ओर अग्रसारित करते हैं क्योंकि इस यथार्थ रूप को प्राप्त किए बिना मनुष्य पीड़ा से मुक्त नही हो सकता, जो धर्म का मूल लक्ष्य है।
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