Tuesday, January 21, 2020

टुशुु, टुशुमनी और एक परम्परा का मिथकीकरण

 


■एक

झारखण्ड के पारसनाथ से छतीसगढ़ के सरगुजा तक और बंगाल के मिदनापुर से उड़ीसा के मयूरभंज तक उनके हिन्दू पहचान के परत को यदि आप उघाड़ते है तो आपको एक ऐसे लोग मिलेंगे जिनकी अपनी सांस्कृतिक-धार्मिक विशिष्टता है। इस विशिष्टता का आधार है धान; इस विशिष्टता का आधार है पथरीली ज़मीन को अपने पसीने से सींच कर धान पैदा करने की कूवत।
जी हाँ मैं कुडमियों की बात कर रहा हूँ। वर्तमान में कुड़मी हिन्दू धर्म के अंतर्गत एक अन्य पिछड़ी जाति के रूप में परिभाषित है लेकिन उनके शब्दो में उनकी यह पहचान उनकी संस्कृति-परम्परा के लिए घातक है।
और इसलिलिए आज अपनी इस विशिष्ट सांस्कृतिक-सामाजिक पहचान को बचाए रखने के लिए वह सरकार से खुद को अनुसूचित जनजाति के रूप में परिभाषित करने के लिए लामबन्द हो रहे हैं।
ध्यातव्य हो की ब्रिटिश राज के 1865 के इंडियन सक्सेसन एक्ट के अंतर्गत ये नोटिफाइएड ट्राइब के रूप में परिभाषित थे।
पुनः 1913 में इनकी पहचान एक आदिम जनजाति की थी लेकिन 1950 की जनगणना में उन्हें जनजातीय श्रेणी से बाहर कर दिया गया।
सन 2004 में झारखण्ड सरकार ने उन्हें अन्य पिछड़े वर्ग की श्रेणी से हटाकर जनजाति की श्रेणी में रखने की अनुसंशा की।
झारखण्ड सरकार अपनी अनुसंशा को यथार्थ रूप कब देती है यह तो समय बताएगा फिलहाल हम इनकी संस्कृति, इनकी परम्परा को समझने का प्रयास करने के क्रम में सर्वप्रथम टुशु पर्व की बात करते हैं।

टुशु पर्व प्रकृति के प्रति आभार व्यक्त करने का पर्व है, उसके साथ एक मिथक किसी काल क्रम में जोड़ दिया गया कि यह टुशुमनी नामक एक कुड़मी कुमारी कन्या के प्रणोत्सर्ग की याद के रूप में मनाया जाता है।
इस मिथक का कुड़मी समाज के द्वारा विरोध किया जाता है । उनका कहना है कि यह मिथक उनके इतिहास को विकृत करने का एक षड्यंत्र है क्योंकि यह कथा की 'एक दैवीय आभा युक्त कुड़मी कन्या थी जिस पर बाहर देश का कोई राजा मुग्ध हो गया और अपने स्मिता की रक्षा करने के लिए उस कन्या ने अपने दामोदर/ स्वर्णरेखा नदी के कूद कर प्रणोत्सर्ग कर दिया' उनकी विशिष्ट पहचान मिटाने के उद्देश्य से है।

सम्भवतः कुडमियों द्वारा पथरीली-पठारी ज़मीन को खेती योग्य बनाई गई भूमि थी। उसकी दैवीय आभा, उस जमीन की उर्वरा शक्ति। बहरी राजा किसी बाहरी की इस भूमि पर गिद्ध दृष्टि और प्रणोत्सर्ग उस भूमि की रक्षा के लिए कुडमियों को कमर कसने का सन्देश लेकिन, जब कुड़मी समाज के एक प्रबुद्ध व्यक्ति से बात हुई तो उन्होंने बताया कि यह मिथक कुड़मी समाज के अंदर से आई ही नही है। इस मिथक का जन्म किसी अन्य समाज ने किया है ताकि इस परम्परा की प्राचीनता को खत्म कर इसे मुगल आक्रमण के आस पास स्थापित किया जा सके।
अब यदि यह मिथक कुड़मी समाज के अंदर से उत्तपन्न नही है तो मेरी इस मिथक को व्याख्या करने की दृष्टि स्वतः ख़ारिज हो जाती है।

एक फोकलोर और कल्चर के अध्येता को प्रथम दृष्टया यह लग सकता है कि दिव्य आभा से युक्त कुड़मी कन्या,  बाहरी राजा, आकर्षण, विवाह का प्रस्ताव, प्रणोत्सर्ग द्वारा एक जमीन के प्रति, (उस जमीन के प्रति जो पथरीली और उबड़ खाबड़ थी और जिसको आज के कुडमियों के पुरखों ने अपनी मेहनत से खेती योग्य बनाया) लगाव पैदा करते हुए इस मिथक के माध्ययम से भावात्मक अपील की गई है कि अपनी टुशुमनी के प्रति जागरूक बनो अन्यथा बाहरी राजा की गिद्धदृष्टि के कारण हर टुशुमनी को अपनी जान देंनी पड़ेगी।

लेकिन नही कहानी कुछ और है और यह कहानी कुड़मी, धान की खेती और उनकी धान के इर्द गिर्द विकसित एक अपनी और विशिष्ट पहचान देने की शृंखला में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है और कुड़मियो कि इस विशिष्ट पहचान के साथ न्याय होनी चाहिए●●●●●


4 comments:

  1. सुंदर, इसस पर और काम करें। आप अंग्रेज कलेक्टरों खई य़आध धइळआते हैं जो प्रशासन के साथ जिले की संस्कृति, समाजशास्त्र तथा एंथ्रॉपलॉजी का डॉक्युमेंटेसन भी करते थे। उनके दस्तावेज शोध के श्रोत हैं।

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