Friday, September 25, 2020

अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम

(एक साथ--असंपादित)

फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस 【एक】
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हम कुछ भी सीखते ही क्यों हैं इसका एक पंक्ति में उत्तर है सर्वाइव करने के लिए।  विकास क्रम में निम्न स्पीशीज में सम्बंधित बेहेवियर इंस्टिक्ट में होता है। एक मधुमक्खी अपना छत्ता बनाना कहीं सीखती नही है, यह उसके अंदर है। एक चिड़िया अपने घोंसले बनाने के लिए विश्विद्यालय नही जाती, उसके अंदर है। विकास क्रम में चेतना के विस्तारण के साथ, मन के इमर्ज होने के बाद, मस्तिष्क के और जटिल होने के बाद इंस्टिक्ट के अलावा लर्नड बिहेवियर इमर्ज होता है। अब सूचना हमारे इंस्टिंक्ट के बाहर भी स्टोर किया जा सकता है और बिना किसी जेनेटिक्स के इसको अगली पीढ़ी में ट्रांसफर किया जा सकता है।
इस जेनेटिक्स के बाहर उपस्थित सूचना का भी मूल अभिप्राय इंस्टिंक्टिव बिहेवियर की तरह सर्वाइवल ही है, अंतर मात्र यह है कि इस सूचना पर आधारित व्यवहार अतःस्फूर्त नही होता है।
विकास क्रम में उच्चतर जीव के आने के बाद व्यवहार का एक अनुषांगिक पक्ष भी होता है:
हमारे लिए भोजन मात्र स्वयम को जीवित रखने के लिए नही है, इससे सम्बंधित एक अनुषांगिक पक्ष भी है: स्वाद। और हम इसके लिए भी पाकशास्त्र सीखते है। सेक्स हमारे लिए अब मात्र अपनी प्रजाति को जीवित रखने का करण नही है, सेक्स अब हम मजा के लिए भी करते हैं।
ज्ञान का भी मात्र और मात्र सर्वाइवल मूल्य जो आज तक होता था, मानव में इससे सम्वन्धित एक अनुषांगिक पक्ष भी उभरता है और इसमें ज्ञान का सर्वाइवल मूल्य प्रमुख नही होता।

हममें अब्स्ट्रेक्शन, जेनरलाइजेशन और पैटर्न पहचानने का बोध अन्य जीवों से ज्यादा है जिसका कोई रहस्यात्मक कारण नही बल्कि विकास क्रम में मात्र यह एक सर्वाइवल उपकरण है। हमने आकाश को देखा उसके चमकते तारो में एक पैटर्न था, हमने अपने अगल-बगल की घटनाओं को देखा, उसमे एक पैटर्न था, हमने जेनरलाइजेशन किया, एब्स्ट्रैक्ट चिंतन की।  हमारे पैटर्न पहचानने के बोध, सामान्यीकरण तथा अमूर्तकरण की क्षमता ने मिथक-दर्शन-विज्ञान आदि को जन्म दिया हैं, लेकिन फिर वही बात की यह मात्र हमारे सर्वाइवल टूल हैं; विज्ञान अब तक का सबसे बेहतर।

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【दो】

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गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को   ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर। 
खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है। 
ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन  अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता। 
ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?

अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【तीन】

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--क
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वैज्ञानिक प्रज्ञा जब दार्शनिक चिंतन करती है तो वह बड़ी सावधान होती है और उन बड़े बड़े दावों,   रसेल के शब्दों में बॉम्बेस्टिक नॉनसेंस, से बचते हुए बड़ी शालीनता से अपनी बात कहती है। 
वैज्ञानिक चेतना प्रायः निरपेक्ष और सत्य ज्ञान जैसे दार्शनिक सम्प्रत्यय के प्रयोग से बचती है। 
वस्तुतः वैज्ञानिक चेतना में निरपेक्ष, वास्तविकता आदि शब्दो का प्रयोग नही होता क्योकि वैज्ञानिक विधि में "आगमन की समस्या" "थ्योरी लैडननेस" और हमारी "संवेदनात्मक सीमितता" इसकी विधि में ही इन्हेरेंट है। इन कारकों की उपस्थिति में निरपेक्ष ज्ञान या यथार्थ आदि की बात करना आत्मव्याघात है।

हॉकिंग "समय का संक्षिप्त इतिहास" इस पंक्ति से प्रारम्भ करते हैं कि कही कोई एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक (कुछ के अनुसार बर्ट्रेंड रसल) ने खगोलशास्त्र पर एक पब्लिक व्य्याख्यान दिया। व्य्याख्यान की समाप्ति पर व्य्याख्यानशाला के पीछे की पंक्ति में बैठी एक बुजुर्ग महिला उठीं और उन ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक से कहा कि अब तक आपने जो कुछ भी बताया है वह कूड़ा है--असल मे विश्व एक बहुत बड़े कछुवे की पीठ पर रखी एक बहुत बड़ी थाली है---।
हॉकिंग आगे अपनी बात रखते हैं कि विश्व विषयक बहुत सारे प्रश्नों के जवाब आज हमारे पास है लेकिन हमारी आने वाली पीढ़ी के लिए ये भी यह जवाब वास्तविक जवाब ही होंगे या उसी कछुआ और थाली की तरह एक हास्यास्पद नॉनसेंस यह केवल समय ही बता सकता है!
-----इतनी अनिश्चितता?
वास्तव में यह अनिश्चितता विज्ञान में समाहित है और यह अनिश्चितता हमे तबतक ही अजीब लग सकता है जबतक हम भौतिकी के सिद्धांतों को यूजफुल की बजाय सत्य माने। एक बार सत्य को यूजफुल से प्रतिस्थापित कर दिया जाय, यह अनिश्चितता हमे सहर्ष स्वीकार हो जाती है, कोई कॉग्निटिव डिज़ोनेंस उतपन्न नही होता क्योकि भविष्य में हमे और अधिक उपयोगी सिद्धान्त मिलते है न कि और अधिक सत्य।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【चार】

ज्ञान की आदर्श सीमा (आइंस्टिन)--ख
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क्या यह सम्भव नही है कि हम भौतिकी के माध्ययम से प्रतिज्ञप्तियों या प्रोपोजिशन्स का एक ऐसा तन्त्र रच रहे हों जो आपस मे सुसंगठित और  कोहरेन्ट तो हो किन्तु इस तंत्र के अनुरूप कोई वाह्य सता न हो अर्थात इस सुव्यस्थित, सुसंगठित और कोहरेन्ट तन्त्र के अनुरूप कोई कोरोस्पोंडेंस या संवादिता न हो? 
ऐसा सम्भव है की हमारी थ्योरी, हमारे मॉडल के अनुरूप एक्सटर्नल रियलिटी हो ही नही बावजूद इसके हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट हो और काम कर रही हो। यहाँ काम करने और सेल्फ कंसिस्टेंट होने का अर्थ मात्र इतना है कि हमारी थ्योरी में प्रेडिक्टिव पावर हो, अपवादों की संख्या न्यूनतम हो तथा इस थ्योरी-तन्त्र के लिए कम से कम अज़्मप्शन्स बनाने पड़े।
आइंस्टीन के शब्दों में हमने घड़ी नही खोली किंतु घड़ी हमारे लिए काम कर रही है, घड़ी से सम्बंधित हमारी अवधारणाओं का तंत्र काम कर रहा है अर्थात हमारी थ्योरी सेल्फ कंसिस्टेंट है, इसमें प्रेडिक्टिव पावर है तथा यह हमारे आनुभविक जगत की घटनाओं की व्याख्या कर दे रहा है बावजूद इसके की हम घड़ी के अंदर नही झाँक सकते। आइंस्टीन इसे ही ज्ञान की आदर्श सीमा कहते हैं (एवोल्यूशन ऑफ फ़िजिक्स)

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"अर्थक्रियाकरित्व लक्ष्मण सत" 

सत के लक्षण के विषय मे कहा गया है-"अर्थक्रियाकरित्व सत लक्षणम"। अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य है। इसी आधार पर अनुवादकों ने  "प्रैगमटिज़्म" का अनुवाद "उपयोगितावाद" के साथ "अर्थक्रियावाद" भी किया है। अतः सत  प्रयोजन को पूर्ण करने के सामर्थ्य की स्थिति है।

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फँक्शनल कॉन्सेप्शन ऑफ नॉलेज; रिप्लेसिंग ट्रुथ विथ यूज़फुलनेस  【पाँच】
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विज्ञान का चरित्र छद्मविज्ञान से इस अर्थ में भी भिन्न होता है कि कालांतर में इसके पूर्वमान्यताओ की पृष्ठभूमि में प्रारम्भ किए गए अन्वेषण यदि किसी ऐसे निष्कर्ष की ओर ले जाते हैं जो अब उस पूर्वमान्यता से ही संगति नही रखते तो विज्ञान इन नवीन निष्कर्षो को अपनी पूर्वमान्यताओ में ही ढालने के लिए तोड़-मरोड़ नही करता बल्कि अपनी पूर्वमान्यता की ही जाँच करता है और उसमे अपेक्षित सुधार करता है। यदि सुधार से भी काम न बना तो फिर विज्ञान उनका परित्याग करने से भी नही हिचकता और एक नवीन पूर्वमान्यता को स्थापित कर उसे आगे के अनुसंधानों के लिए लिए पृष्ठभूमि में स्थापित करता है।
इस सन्दर्भ में दृष्टांत के लिए निरपेक्ष देश और काल, जिनमे घटनाएँ घटती थी, से जनरल रिलेटिविटी के उस देश-काल तक, जो मात्र कोई स्टेज न होकर घटनाओ में हिस्सा लेता है, की यात्रा बड़ी मनोरंजक है।
यहाँ दार्शनिक एक प्रश्न उठाते हैं कि क्या इस द्वितीय स्तर की पूर्वमान्यतावो के अस्तित्व में आने के बाद भी क्या यह कहा जा सकता है कि इन मान्यताओं के अनुरूप वाह्य जगत में भी वैसी ही सत्ता है? क्या यह सम्भव नही है कि हम प्रतिज्ञप्तियों या ज्ञान का एक ऐसा तन्त्र रच रहे है या हमारी बुद्धि हमसे धोखा करते हुए एक ऐसा ज्ञानतन्त्र रचवा रही हो जिसमें इस तंत्र के अव्ययों में संगति और सुसंगतता तो है किंतु उस पूर्वमान्यता के अनुरूप कोई सत्ता ही न हो?
अपनी बात को पुष्ट करते हुए एक ऐसे स्वप्न का उदाहरण दिया जा सकता है जिसमें सुख-दुख आदि की अनुभूति तो होती है किंतु यह बोध नही होता कि स्वप्न में हम स्वप्न-जगत में रहते हैं और उस स्वप्न के "मैं" मे भी मैं और जगत विषयक कुछ पूर्वमान्यता विद्यमान होती है।  
यहाँ व्यक्ति की "ज्ञान" विषयक क्या अवधारणा है यह निर्धारित करता है कि वह अज्ञेयवादी, संशयवादी, शून्यवादी, मायावादी या अर्थक्रियावादी विश्वदृष्टि अपनाएगा। 
वैज्ञानिक दृष्टिकोण ज्ञान के विषय मे एक अर्थक्रियावादी समझ रखता है। इसके अनुसार ज्ञान किसी अतीन्द्रिय सत्ता के निमित्त नही है बल्कि इसका केवल और केवल सर्वाइवल मूल्य है हालांकि विकास वृक्ष में अपनी अब तक सबसे विशिष्ट अवस्थिति के कारण मनुष्य इसका कुछ उपयोग ठीक उसी प्रकार अलग भी कर सकता है ज्यों हम अपने कंकाल तन्त्र और पेशी तन्त्र का उपयोग ब्रेकडान्स के लिए भी कर लेते है हालांकि हमारी पेशियाँ और कंकाल ब्रेक-डांस करने के निमित नही विकसित हुए।

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