Saturday, September 12, 2020

गणित का दर्शन

गणित सर्वाधिक व्यववस्थित व संरचनाकृत या स्ट्रक्चर्ड चिंतन है। भौतिकी गणित के माध्ययम से चिंतन मनन करती है। गणित के विषय मे दो मत हैं: हमारी चेतना इस सर्वाधिक स्ट्रक्चर्ड वे को   ब्रह्मांड, प्रकृति पर आरोपित करती है या दूसरे मत के अनुसार मैथमेटिक्स इज़ ऑलरेडी आउट देयर। 
खैर, जो भी हो भौतिकी के लिए गणित अपरिहार्य है। यदि समग्र भौतिकी से गणित निकाल दिया जाय तो भौतिकी अधिभौतिकी या मेटाफिजिक्स के आस पास आ जाती है या स्वयम ही मेटाफ़िजिक्स बन जाती है। 
ऐसा नही है कि इस मेटाफिजिकल चिंतन में गणित युक्त भौतिकी के निष्कर्ष नही आते लेकिन  अधिभौतिकी को भौतिकी के समान गणितीय चिंतन की अनुपस्थिति में जगत के ऊपर नियंत्रण स्थापित करने का करण नही बनाया जा सकता। 
ज्ञान का कार्य सामर्थ्यवान बनाना है शरणागत नही या ज्ञान यदि ज्ञेय से बिल्कुल डिटेचड़ हो तो भी वह ज्ञान एक बायोलॉजिकल बीइंग के रूप में हमारे लिए किस काम का?

अतः हमारे एक जैविक बीइंग के रूप में भौतिकी हमारे लिए अधिभौतिकी से अधिक, बल्कि बहुत अधिक उपयोगी है।




गणित दर्शन (शून्य)
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आनुभविक विज्ञान के डोमिनेन्स के कारण सामान्यतया हम विज्ञान का अर्थ आनुभविक विज्ञान ही समझते है।
भौतिकी, रसायन, जीव विज्ञान आनुभविक विज्ञान हैं जबकि गणित और तर्कशास्त्र फॉर्मल विज्ञान की श्रेणी में आते हैं।

गणित में 2+2 हमेशा और हर जगह 4 ही होता है अतः इन फॉर्मल विज्ञानों में एक एब्सोल्यूट ट्रुथ मैजूद होता है इसके विपरीत आनुभविक विज्ञान में तीन कारणों से किसी एब्सोल्यूट ट्रुथ की कल्पना करना बेमानी होती है और ये तीन कारण है:
■हमारा संज्ञानत्मक/संवेदनात्मक सीमितता
■ आगमन की समस्या तथा
■थ्योरी लैडननेस
गणित के नियम और ट्रुथ निरपेक्ष होते हैं।
इसका कारण यह है कि गणित में इसके निष्कर्ष आधारवाक्य में निश्चित रूप से होते हैं और निष्कर्ष को बस निगमित किया जाता है वहीं आनुभविक विज्ञान में नया ज्ञान, नई प्रतिज्ञप्ति प्राप्त की जाती है।

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गणित दर्शन (एक)
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गणित के निष्कर्ष निरपेक्ष होते हैं अर्थात 2+2 =4 हर काल और देश मे सत्य है जबकि आनुभविक विज्ञानों के निष्कर्ष सम्भाव्य होते हैं इसका कारण यह है कि गणित के प्राक्कथन "पुनरुक्तियाँ" होती हैं। (रसेल)
एक ऐसा प्राक्कथन बनाया जा सकता है जो हमेशा सत्य ही होगा यथा:

आज या तो तीन तारीख है या तीन तारीख नही है

यह कथन हमेशा सत्य होगी क्योंकि यदि आज तीन तारीख है तो भी यह कथन सत्य है और यदि आज तीन तारीख नही है तो भी यह कथन सत्य है।

और इसीलिए गणित के निष्कर्ष हमेशा सत्य होते हैं।

एक गणितीय अभव्यक्ति में ऐसी कई चीजें इम्प्लाइड हो सकती हैं जिनको ढूंढने में दो चार जेनरेशन का समय लग जाए लेकिन इन ढूंढी गई चीजो को वह गणितीय अभव्यक्ति प्रेडिक्ट कर रही होती है। जगत विषयक किसी भी नवीन ज्ञान की स्थापना आनुभविक विज्ञान द्वारा ही होती है भले ही यह नवीन ज्ञान गणितीय रूप में सूत्रबद्ध हो।

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गणित दर्शन (दो)
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जगत में मात्र क्वांटिफिकेबल सत्ताएं ही नही है इसमें क्वालिटेटिव सत्ता भी है। लाल से सम्बंधित डेविड चालमर का चेतना का हार्ड प्रॉब्लम, क्वालिया की समस्या जो भी हो लेकिन लाल रंग को क्वांटिफाई किया जा सकता है। इसे इसके वेवलेंथ और फ्रीक्वेंसी कोरिलेट्स में संख्यात्मक रूप से व्यक्त किया जा सकता है। अभी भी बहुत सी घटनाएं, सत्ताएं, चीजें हैं जिनका क्वान्टिफिकेशन नही किया जा सकता है। सम्भवतः इनमे से कुछ चीजों का भविष्य में कोई कोरिलेट्स ढूंढ लिया जाय जिसको इन कोरिलेट्स के गणितीय मान से व्यक्त किया जा सके क्योंकि विज्ञान के विकास का आशय इस क्वान्टिफिकेशन के स्कोप का विस्तार करना है; किसने कल्पना की थी कि लालिमा को गणित में अभिव्यक्त किया जा सकता है! सम्भवतः कुछ चीजें ऐसी भी हों जिनका कभी क्वान्टिफिकेशन सम्भव ही न हो लेकिन तब यह भी नही कहा जा सकता कि उनका अस्तित्व नही है।
"वह बहुत लंबा है" इसमें "बहुत" को क्वांटिफाई नही किया जा सकता क्योंकि "बहुत" का कोई मानक नही है हालांकि क्वान्टिफिकेशन के पश्चात "लम्बा" का भी कोई अर्थ नही रह जाता: चीजो की लंबाई होती है जिनको इकाइयों में अभिव्यक्त किया जाता है।
यहाँ यह कहा जा सकता है कि "बहुत" "लंबा" आदि शब्द विषयनिष्ठ कंस्ट्रक्ट हैं और प्रकृति के परिप्रेक्ष्य में "लम्बा" प्रकृति का कोई अपना गुणधर्म नही है।
"वह लम्बा है" निश्चित रूप से यह एक क्वालिटेटिव प्रकथन है और "उसकी लम्बाई 180 सेंटी मीटर है" एक क्वांटिटेटिव। प्रश्न है कि हम कैसे मान लें कि 180 प्रेक्षक निरपेक्ष एक वस्तुनिष्ठ सत्ता है और यह "लम्बा" की भांति ही दस बीस की बजाय सभी मानवो का सब्जेक्टिव कंस्ट्रक्ट नही है जिसका तार्किक निष्कर्ष यह होगा की गणित हमारे अंदर है,  हमारी बुद्धि की संरचना में, वाह्य जगत में नही।

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गणित दर्शन (तीन)
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विश्व के कई महान गणितज्ञ महान दार्शनिक भी हैं; डेकार्ट, लिबिनितज़, रसेल, फ़्रेगे----- दोनों ही विधाएं अमूर्त चिंतन या एब्स्ट्रैक्ट थिंकिंग  के उच्चतम स्तर को उपयोग में लाती हैं। गणित ने दर्शन को चिंतन का मॉडल देने के अलावा कई दार्शनिक प्रश्न भी दिए हैं।

प्राचीन ग्रीक यह मानते थे कि ज्ञान का गणितीय मॉडल सर्वश्रेठ है। उनकी इस मान्यता के पीछे निम्न कारण थे:
 ◆ गणितीय ज्ञान निश्चित होता है। 2+2 किसी भी देश काल मे 4 ही होता है और इस ज्ञान की निश्चितता पर संदेह नही किया जा सकता।
◆ गणितीय ज्ञान में फलिबिलिज्म के लिए कोई जगह नही होती।
◆ गणितीय ज्ञान शाश्वत और निरपेक्ष होता है।
◆ गणितीय ज्ञान अनिवार्य होता है।

दार्शनिकों के लिए गणितीय ज्ञान एक पहेली उपस्थित करती है कि गणित के ज्ञान शाश्वत, अनिवार्य, निरपेक्ष और असन्दिग्ध क्यो होते हैं तथा बाकी डिसिप्लिन के ज्ञान गणितीय ज्ञान की तरह क्यो नही हो सकते।
बहरहाल गणितीय ज्ञान को ज्ञान का मॉडल मानने के कारण  वास्तविक ज्ञान का अर्थ ही वह ज्ञान समझा जाने लगा जिसमे उपरोक्त चारो विशेषताएं  उपस्थित हों। 

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गणित दर्शन (चार)
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निश्चित रूप से गणित ने दार्शनिकों को अनेक दार्शनिक प्रश्न व ज्ञान एवम चिंतन का एक मॉडल दिया है किंतु दार्शनिक इस प्रश्न से भी पज़ज़्ल्ड रहे है की गणित किसके बारे में है (व्हाट इज मैथेमेटिक्स अबाउट)
दो संतरे और तीन संतरे मिल कर पाँच संतरे होते हैं। 2+3=5 यहाँ संतरों के बारे में नही है बल्कि संतरों पर ऐप्लिकेबल है।
तो फिर यह किसके बारे में है? 
यह संख्याओं के बारे में है। 
लेकिन तब प्रश्न आता है कि ये संख्याएं क्या है।
संख्याओं पर जितना गम्भीरतापूर्वक विचार किया जाता है ये उतने ही अस्पष्ट होते चले जाते हैं।
प्रतीत होता है कि संख्याएं वस्तुनिष्ठ सत्य के कंटेंट हैं तो क्या संख्याएं ऑब्जेक्ट/वस्तु हैं?
यदि संख्याएं ऑब्जेक्ट हैं तो ये एक विशेष प्रकार की वस्तुएं हैं: ये देश-काल में अस्तित्वमान नही हैं, ये हमारे देशीय-कालिय जगत के हिस्से नही हैं, ना इसका क्षरण होता है, न ये पुराने होते हैं और न ही किसी एक संख्या का विकास होता है।  बुद्ध का क्षणिकवाद इन्हें स्पर्श करता दिखाई नही देता, हीगल और मार्क्स की डायलेक्टिक्स से भी ये अछूते हैं,बिल्कुल सत चित आनंद के सत की तरह।

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गणित दर्शन (पाँच)
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गणितीय ज्ञान निरपेक्ष और सत्य होते हैं जबकि आनुभविक विज्ञानों से प्राप्त ज्ञान सापेक्ष और सम्भाव्य। गणितीय ज्ञान की इस विशेषता और चरित्र ने दार्शनिकों को काफी पज़ल्ड किया है और गणितीय ज्ञान तथा गणित की प्रकृति पर चिंतन करने को बाध्य किया है। 
जर्मन दार्शनिक कांट के गणित पर विचार काफी प्रभावी रहे हैं जिसके अनुसार गणितीय प्रतिज्ञप्तियां "संश्लेषणात्मक प्रागानुभविक" होने के कारण ये अनिवार्य रूप से सत्य व निरपेक्ष होती हैं।
काँट दो प्रकार की कथनों के बारे में बात करते हैं:
संश्लेषणात्मक तथा विश्लेषणात्मक।
विधलेष्णात्मक सत्य संश्लेषणात्मक सत्यों के उलट अनिवार्य रूपेण सत्य होते हैं।

संश्लेषणात्मक कथनों में दो अलग पदों या वस्तुओं या घटनाओं के बीच संश्लेषण होता है यथा: 
धातु गर्म होने पर पर फैलता है।
मच्छर काटने पर मलेरिया होता है।
यहाँ धातु और फैलने तथा मच्छर और मलेरिया के मध्य संश्लेषण हुवा है अतः ये संश्लेषणात्मक कथन हैं। ध्यातव्य है कि संश्लेषणात्मक सत्य आपतिक रूप से सत्य होते हैं।

एक और कथन लिया जा सकता है:
त्रिभुज के तीन भुजाएं होती हैं।
दुनिया के सारे कुवांरे अविवाहित हैं।
इन कथनों में दो घटनाओं या वस्तुओं के मध्य संश्लेषण नही हुवा बल्कि किसी एक वस्तु या घटना का ही विश्लेषण हुवा है अतः इस प्रकार के कथन विश्लेषणात्मक कथन हैं।

हम विधलेष्णात्मक कथन के इम्पोर्ट को और अधिक स्पष्ट करने के लिए जनरल रिलेटिविटी के इस समीकरण को लेते हैं: 

यह विश्लेषणात्मक कथन "कुंवारे अविवाहित होते हैं" की तर्ज पर ब्लैक होल, ग्रेविटेशनल वेव, ब्रह्मांड का नॉन स्टेटिक कैरेक्टर व ऐसी ही बहुत सारी चीजें बताता है।

काँट ज्ञान के दो प्रकार में भेद करते हैं: ए प्रिओराई तथा ए पोस्टीरिओराई (प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान)

■प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान

इसके पूर्व की उक्त दो ज्ञानो की चर्चा की जाय अनिवार्य सत्य और आपतिक सत्य की संकल्पना को समझना आवश्यक है।
दार्शनिक विमर्शों में "अनिवार्य" तथा "आपतिक" ये दो शब्द विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैं: अनिवार्य सत्ता, अनिवार्य सत्य, आपतिक सत्ता, आपतिक सत्य आदि।

जगत के सम्बंध में एक प्रश्न किया जाता है कि इसकी सत्ता की प्रकृति कैसी है: अनिवार्य अथवा आपतिक अर्थात क्या जगत जैसा है वैसा उसे होना ही था या यह जैसा है उससे अलग भी हो सकता था।
यदि जगत जैसा है वैसा होना ही था तो जगत की सत्ता  इस अर्थ में एक अनिवार्य सत्ता है और यदि हम माने की जगत इस रूप से अलग रूप में भी विद्यमान हो सकता था तो तो इस संदर्भ में जगत की आपतिक सत्ता है।
गणितिय ज्ञान अनिवार्य होते हैं--दो और दो का जोड़ चार के अलावा कुछ और हो ही नही सकता। हमे कोई भी इंस्टेन्स नही मिल सकता जहाँ दो और दो का योग चार न हो जबकि गर्म करने पर धातुएं फैलती है के अपवाद मिलने की पूरी सम्भाव्यता है।
विज्ञान दार्शनिक कार्ल पॉपर तो फौलसिफिकेशन  को ही बल्कि वैज्ञानिक क्रिया मानते हैं। आशय यह कि विज्ञान का कार्य सचेतन रूप से इस कथन की पुष्टि की "गर्म होने पर धातुएं फैलती हैं" कि बजाय ऐसे अपवादों को ढूंढना है जिसमे गर्म होने पर धातुएं नही फैलती।

खैर, हम वापस प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक ज्ञान पर आते हैं।

ज्ञान प्रतिज्ञप्तियों के माध्ययम से व्यक्त होता है। यद्यपि रहस्वादियो, धार्मिक व्यक्तियों द्वारा बहुधा ऐसे ज्ञान की बात भी की जाती है जिन्हें व्यक्त नही किया जा सकता। यह ज्ञान ज्ञाता का नितांत व्यक्तिगत और निजी होने के कारण ज्ञानमीमांसा के लिए इसका अपेक्षाकृत कम मूल्य है और यह मीमांसा के लिए प्रायः दुरूह है। 

प्रागानुभविक और इंद्रियांनुभविक शब्द का उपयोग मुख्यतया उन आधारों के संदर्भ में होता है जिन पर प्रतिज्ञप्तियों की रचना होती है।
प्रागानुभविक प्रतिज्ञप्तियों की रचना के लिए  न तो इन्द्रियानुभव की आवश्यकता  होती है और न ही इनके वेरिफिकेशन की आवश्यकता पड़ती है जबकि इंद्रियांनुभविक प्रतिज्ञप्तियों की रचना ही इंद्रियानुभव के माध्ययम से होती है। 
सरलता के लिए यूक्लिडियन ज्यामिति की स्वयमसिद्धियाँ को प्रागानुभविक ज्ञान के उदारहण के रूप में लिया जा सकता है।

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गणित दर्शन (छह)
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काँट के अनुसार गणितीय ज्ञान संश्लेषणात्मक प्रागानुभविक ज्ञान है और इसमे अवस्थित उक्त प्रागानुभविक तत्त्व के कारण ही गणितीय ज्ञान अनिवार्य और निरपेक्ष होते हैं।

प्रश्न है कि हम संश्लेषणात्मक  प्रगानुभओ को कैसे जानते है?

जो कुछ भी जाना जा सकता है अपने अस्तित्व के परिप्रेक्ष्य में ही जाना जा सकता है। अस्तित्व को ट्रांसेन्डेन्ट कर कुछ जाना ही नही जा सकता।

आधुनिक विज्ञान के जनक गैलीलियो का कथन है कि ब्रह्मांड गणित की भाषा  में लिखा गया है। निश्चित रूप से ब्रह्मांड गणित की भाषा मे लिपिबद्ध है लेकिन सवाल यह नही है बल्कि सवाल यह है कि  क्या हम गणित को ब्रह्मांड से लेते हैं या फिर हम ही गणित को ब्रह्मांड पर आरोपित करते हैं?
काँट कहते हैं कि हम गणित को ब्रह्मांड से नही लेते बल्कि गणित हमारे अंदर है। हम गणित के फिल्टर से ही जगत को देखते है और इसी कारण जगत की  भाषा हमे गणित दिखती है। 
काँट की मान्यता है कि गणित के दो विभाग हैं: ज्यामिति और अर्थमेटिक।
जगत देश और काल के ढांचे पर खड़ा है। हमारे ज्ञान की फेकल्टी के साथ अनिवार्य रूप से गुंथी हुई ज्यामिति - फिल्टर हमे जगत के देशीय आयाम का बोध देती है तथा अर्थिमेटिक-फिल्टर जगत के कालीय आयाम का।
या यूं कहें कि ज्यामिति हमारे देशीय अंत प्रज्ञा/इंट्यूशन एवम अरिथमेटिक हमारी कालीय या टेम्पोरल इंट्यूशन का हिस्सा है।

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