Saturday, September 12, 2020

सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी

भूमिका: त्रिगुणात्मिका प्रकृति की साम्यवस्था भंग हुई ब्रह्मांड का विकास हुवा और मैं पुरुष प्रकृति में  फँस गया।

प्रकृति की साम्यवस्था का भंग होना ही बिग बैंग है क्या और लॉरेंस क्रॉस एवम पीटर अटिक्सन का एब्सोल्यूट नथिंगनेस या निरपेक्ष अनस्तित्व ही त्रिगुणात्मिका प्रसवधर्मीणी प्रकृति?
सर रोजर पेनरोज की सायकल ऑफ टाइम्स (समय के चक्र; सृष्टि और प्रलय) के अनुसार बिग बैंग होता रहता है।

सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【क】
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सांख्य दर्शन के सर्ग और प्रतिसर्ग पर बात करने के पूर्व इसके कारणता सिद्धान्त "सत्कार्यवाद" पर बात करना आवश्यक है।  भारतीय दर्शन में कारणता पर दो मत हैं: आरंभवाद या असतकार्यवाद एवम सत्कार्यवाद। असतकार्यवाद  के अनुसार उतपत्ति के पूर्व कारण में कार्य का अभाव होता है; कार्य कारण से बिल्कुल भिन्न एक नवीन सत्ता है। कार्य की सत्ता सर्वथा नवीन होने के कारण असतकार्यवाद को आरम्भवाद भी कहते हैं: कार्य पूर्णरूपेण एक नवीन सृष्टि होती है। भारतीय परम्परा में न्याय-वैशेषिक आरम्भवादी हैं।
न्याय वैशेषिक के कार्य-कारण सिद्धान्त के विपरीत सांख्य और वेदांत कार्य को कारण में पूर्व रूप से अवस्थित मानते हैं जो कार्य-करण की शृंखला में मात्र अभिव्यक्त होते हैं। 
भारतीय दर्शन में सत्कार्यवाद के दो रूप मिलते हैं: परिणामवाद और विवर्तवाद। 
सांख्य दर्शन जहाँ परिणामवादी है वहीं  अद्वैत वेदांत विवर्तवादी।
परिणामवादी कार्य को कारण का परिणाम मानते हैं, वास्तविक रूपांतरण, तात्त्विक परिवर्तन: कार्य मे कारण का वास्तविक व तात्विक रूपांतरण हो जाता है। सांख्य प्रकृति-परिणामवादी है जबकि रामानुज का विशिष्टाद्वैत ब्रह्म-परिणामवादी।
विवर्तवाद में कार्य को कारण का वास्तविक और तात्विक रूपांतरण न मानकर कार्य को कारण का विवर्त या आभास माना जाता है। शंकर का अद्वैत वेदांत विवर्तवाद का समर्थक है-यह प्रपंचात्मक जगत ब्रह्म का यथार्थ रूपांतरण न होकर विवर्त या आभासमात्र है।

प्रश्न यह है कि भौतिकीविद जिस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग की खोज कर रहे हैं उस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग में बाद के चारो मौलिक बल :गुरुत्वाकर्षण, स्ट्रांग न्यूक्लियर, वीक नाभिकीय और इलेक्ट्रोमैग्नेटिक बल पहले से मौजूद हैं कि नही?  ऐसा नही है कि उस थ्योरी ऑफ एवरीथिंग के कोरोसोस्पॉन्डिंग तत्व, कॉन्सेप्ट या वह जो कुछ भी है उससे बिल्कुल अलग ये चारों मौकिल बल बिल्कुल नवीन सत्ता हैं। 
अर्थात, थ्योरी और एवरीथिंग में सांख्य का सत्कार्यवाद इम्प्लॉयड है न कि वैशेषिक और न्याय का असतकार्य या आरंभवाद।
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सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【ख】
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ट्रू नथिंग, एब्सोल्यूट नथिंग, निरपेक्ष अनस्तित्व या सांख्य की प्रकृति: 

भौतिकीविद लॉरेंस क्रॉस लिखते हैं कि यह जगत अपने आप से उतपन्न क्यो नही हो सकता, हमे एक स्रष्टा की आवश्यकता क्यो पड़ती है? जब  धर्मशास्त्रियों यह कहते हैं कि ईश्वर ने शून्य(नथिंग) से इस जगत की रचना की और मैं पूछता हूँ कि इस नथिंग को थोड़ा और विस्तृत करें तो धर्मशास्त्री मौन हो जाते हैं। 
लॉरेंस की एक पुस्तक है: यूनिवर्स फ्रॉम नथिंग, व्हाई देयर इज़ समथिंग रैदर दैन नथिंग। उसमे वह लिखते हैं कि ट्रू नथिंग कुछ होता ही नही। वैक्यूम नथिंग नही है वहाँ फील्ड्स मौजूद हैं। जिस नथिंग की बात धर्मज्ञ करते हैं वह नथिंग नही हो सकता क्योंकि वह कुछ है जिसमे समथिंग होने की सम्भाव्यता है जिसे एक वाह्य कारक आकार देता है। भौतिकी के समीकरण भी यह बताते हो कि नथिंग, ट्रू नथिंग नही है; इनमे कवांटम फलक्चुवेशन मौजूद हैं और यह नथिंग  अनस्टेबल है। 

क्रॉस लिखते हैं कि मैं उस नथिंग की बात कर रहा हूँ जो प्लेटो और एक्वाइन्स का नथिंग है: निर्वात/ एम्प्टी स्पेस। 
मैटर और रेडिएशन की अनुपस्थिति के बावजूद इस नथिंग का नॉन-ज़ीरो ऊर्जा अवस्था हो सकती है। जेनरल रिलेटिविटी कहती है कि यह लघु स्पेस एक्सपोनेंशियली इतना विस्तृत हो सकता है कि आगे चलकर इसमें हमारा सम्पूर्ण ब्रह्मांड समा जाय। ज्यो ज्यो हमारा ब्रह्मांड विस्तृत होता है इस तवीरत विस्तारण के समय वह हिस्सा जिसमें हमारा ब्रह्मांड है, वह सपाट होता जाता है बावजूद इसके की उसकी एनर्जी कंटेंट बढ़ रही है। यह सम्भव है क्योंकि इस प्रकार के एम्प्टी स्पेस में ऊर्जा से सम्बंधित गुरुत्वाकर्षण दाब नकारात्मक होता है। ज्यों ज्यो विस्तार होता है यह विस्तारण स्पेश में ऊर्जा डंप करता है न कि इसके उलट (पृष्ठ 204-5)

मुझे यह  नथिंग सांख्य की प्रकृति क्यों लग रही है?

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सांख्य दर्शन के अनुसार सर्ग और प्रतिसर्ग व आधुनिक कॉस्मोलॉजी 【ग】
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सांख्य दर्शन का सामान्य परिचय

डॉक्टर राधाकृष्ण अपनी पुस्तक भारतीय दर्शन के अध्याय सांख्य दर्शन की प्रस्तावना में लिखते है: 'सृष्टिरचना के स्थान पर विकासवाद का प्रतिपादन करके सांख्य ने अलौकिक धर्म की नींव पर ही कुठाराघात किया है। इसके अनुसार, यह संसार किसी सृष्टिकर्त्ता ईश्वर का कार्य नही है, जिसने अपनी इच्छा के चमत्कार से अपने से सर्वथा भिन्न इस संसार को आह्वान करके उतपन्न किया है, बल्कि यह असंख्य आत्माओं तथा सदा कर्मशील प्रकृति की परस्पर प्रक्रिया का परिणाम है।'

मैक्समूलर मानते है कि अद्वैत वेदांत के बाद हिंदुओ का सबसे प्रमुख दर्शन सांख्य दर्शन है। आचार्य शंकर ने तो सांख्य को "प्रधान मल्ल" तक कहकर संकेतित किया है। 

सांख्य आस्तिक किंतु अनीश्वरवादी दर्शन है। ध्यातव्य है कि भारतीय दार्शनिक परंपरा में नास्तिक का अर्थ वेदों की सत्ता न मानना है (नास्तिको वेदनिन्दक:) और इस अर्थ में चार्वाक, जैन और बौद्ध भारतीय दर्शन के नास्तिक सम्प्रदाय हैं। सांख्य वेदों की सत्ता मानने के बावजूद ईश्वर की सत्ता को नही मानने के कारण एक आस्तिक अनीश्वरवादी दर्शन है।

सांख्य द्वैतवादी दर्शन है और साथ ही वास्तववाद का समर्थक भी है। यह अंतिम रूप से दो प्रकार की सत्ताओं को मानता है जो एक दूसरे से पूर्णतया भिन्न हैं: पुरुष और प्रकृति। पुरूष जगत का चेतन सिद्धान्त है जबकि प्रकृति इस समस्त विकृति या अलख ब्रह्मांड का जड़ सिद्धान्त।
सांख्य के वास्तववादी होने का अर्थ यह है कि वह  यह नही मानता कि जगत या उसके संगठक चेतना में रचे जाते हैं: प्रकृति, पुरुष, विकृति, सर्ग, प्रतिसर्ग आदि सब वास्तविक हैं।

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