जगत के ज्ञान के परिप्रेक्ष्य में चार सम्भावनाए बनती है:
◆ जगत वास्तव में है ही नही, इसे हमारी चेतना रच रही है।
◆ जगत है और यह जैसा और जहां तक वास्तव में है हमे वैसा और वहाँ तक ज्ञान होता है/हो सकता है।
◆ जगत है लेकिन हम इसको इसके वास्तविक स्वरूप में (जैसा वह है बिल्कुल वैसा) उसी सीमा तक जान सकते है, जहाँ तक जानने की आज़ादी जगत ने हमे दी है।
◆ जगत है लेकिन हम इसको इसके डिस्टिर्टेड रूप में ही जानने के लिए जगत द्वारा प्रोग्राम्ड हैं।
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