Friday, September 25, 2020

फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी

फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी 【एक】
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ज्ञान, बौद्धिक या आनुभविक उतना ही पारदर्शी और सत्य है जितना गुरुत्वाकर्षण या विकासवाद या E=Mc^2.।
ज्ञान ब्रह्मण्ड का ही हिस्सा है, उसी की एक घटना अतः ब्रह्मांड हमे धोखा नही देता बल्कि वह अपना असल स्वरूप ही दिखाता है, हाँ यह और बात है कि वास्तविकता की कई परते हैं लेकिन हर परत उतनी ही सत्य है जितनी कोई दूसरी, और यह ब्रह्मांड की विशेषता है।
क्लासिकल भौतिकी का डिटरमिनिज़्म  क्लासिकल स्तर पर उतना ही सत्य है जितना क्वांटम भौतिकी की अन्सरटेंती क्वांटम लेवल पर।

ज्ञान का मीमांसा दर्शन प्रतिपादित प्रभाकर के आख्यातिवाद  सिद्धान्त के अनुसार कोई भी ज्ञान असत्य नही होता मात्र अस्पष्ट होता है। ख्याति या  भ्रम वस्तुतः ज्ञान का अभाव नही, ज्ञान होने की प्रक्रिया का वह कदम है जहाँ ज्ञान पूरी तरह स्पष्ट नही हुवा है।

स्वप्न, जाग्रत और सुसुप्तावस्था की अनालोजी पर आधारित वेदांत तुरीयावस्था की कल्पना करता है क्योकि यह इन तीनो अवस्थाओं को एक दूसरे से पृथक और अलग मानता है लेकिन आधुनिक शोधों में यह निष्कर्ष आ रहे हैं कि स्वप्न हमारे जागृत जगत का ही विस्तार है और जब स्वप्न हमारे जागृत जगत के ही विस्तार हैं तो जागृत अवस्था की तुलना में स्वप्न मिथ्या कैसे?

ब्रह्म भी सत्य है और जगत भी उतना ही सत्य!

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फ़ॉलोसॉफिकल एपिलेप्सी : 【 दो】
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द कॉस्मॉस या एंथ्रोपिसिटी के कारण ए कॉस्मॉस इन द केयोस:
(The Cosmos or A cosmos in the Chaos due to
Anthropicity?)

भौतिकवाद या आज भूत द्रव्य की मौलिक स्तर की अनुपस्थिति के कारण प्रकृतिकी "फिजिकलिज़्म" का तार्किक निष्कर्ष वैज्ञानिक निहिलिज़्म होगा और वैज्ञानिक निहिलिस्म का मानवीय जीवन मे विस्तार करने पर यह दृष्टि सामने आती है कि जगत में जो व्यवस्था दिखाई देती है वह "केयोस" के अनायासिक स्वरूप के कारण उतपन्न, जीवन और चेतना में व्याप्त इसी आकस्मिकता का आवर्धित रूप है, जो केयोस के निःसार, असंगत, उद्देश्यहीन और अराजक स्वरूप को "फेथ" की उपस्थिति  में समग्र रूप से ढक लेता है।

निरुद्देश्य, यांत्रिक ब्रह्मांड में भला कोई नियम और व्ययवस्था या ऑर्डर कैसे हो सकता है?
यह ऑर्डर और नियमबद्ध नही वरन जिसे हम कॉस्मॉस कहते है वह विशुद्ध केयोस के किसी छोटे से हिस्से की तस्वीर है और मानव उस वेंटज पॉइंट पर खड़ा है जहाँ से उसे यह केयोस कॉस्मॉस दिखता है।

एक प्रयोग किया जा सकता है: हम ढेर सारे रंगों को लेकर बार-बार बेतरतीब ढंग से उसमे ब्रश डालकर बेतरतीब ढंग से कैनवास पर ब्रश चला कर एक केयोस रचे फिर ध्यान से देखने पर उसका कोई हिस्सा कही न कही पैटर्न बनाता दिखाई देता है। मनुष्य उसी पैटर्न देखने वाले वेंटज पॉइंट पर अस्तित्वमान है और वहां खड़े होकर उस पैटर्न को ही समग्र मान बैठता है और कभी भौतिकी के सहारे तो कभी दर्शन के सहारे उस पैटर्न को जो केयोस में एक्सीडेंट वश उभर गया, उस पैटर्न में एकत्व की खोज कर पूरे केयोस ओर आरोपित करने की भूल करता है।

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