कैसे प्रत्ययवाद भौतिकवाद की छाया मात्र है?
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कल्पना कीजिए उस काल की जब हम पशुता से अभी अभी ऊपर उठे है और अभी भी हमारी सहज प्रेरण का स्थान हमारी तार्किकता ने नही लिया है।
क्या खाना है और क्या पीना है इसको तो हर पशु यहां तक की जीवन का सरलतम रूप अमीबा भी जानता है क्योंकि यह उसे जीवन के साथ गूंथा हुवा है।
मनुष्यो को भूख लगी है और शिकार पर गए है लेकिन तभी उनसे ताक़तवर जानवरो के झुण्ड ने उनपर हमला कर दिया है; मनुष्यो का झुण्ड प्राण बचाने के लिए भाग रहा है।
भूखे है मनुष्य तब भी भाग रहे है, सहज वृति!
इसी भागने के क्रम में मनुष्यों के उस झुण्ड का वह मनुष्य जिसकी घ्राण शक्ति अन्यो के मुकाबले तीव्र है एक ऐसी चीज को देखता है जो वृक्ष से जुडी दिखाई देती है और उस चीज के गन्ध से यह स्वयं निर्धारित है कि वह एक खाद्य वस्तु है।
मनुष्यो का झुण्ड कही रुकता है और वह तीव्र घ्राण शक्ति वाला मनुष्य चुकी बुढ़ापे में भागने के कारण मरने को है, अपने साथियों से कहता है कि एक वस्तु है अमुक जगह पर जिससे भूख मिटाई जा सकती है।
वृद्ध की मृत्यु के पश्चात और उन जानवरो के गुजर जाने के बाद मनुष्यो की टोली वहां पहुंचती है और उस वृद्ध के कथनानुसार देखती है कि हाँ कुछ लगा तो है।
मनुष्यो की टोली उस चीज को तोड़ने के लिए हाथ बढ़ाती है लेकिन यह क्या- वह चीज तो पकड़ में ही नही आ रही। यह चीज तो न पत्थर से कट रही है और न ही धात्विक हथियारों से।
इसे तो अग्नि भी नही जला पा रही है।
मनुष्यो की टोली में से कुछ मनुष्य निराश है लेकिन कुछ शब्द प्रमाण को मानते है इसलिए वह प्रयास करना नही छोड़ेंगे।
अब चुकी वह चीज उन्हें मिल नही रही है अतः उस चीज को, स्वयं को और उससे अपने सम्बन्ध को पुनर्परिभाषित करते है: यह न प्राप्त होने वाली चीज वास्तव में हमेशा के लिए भूख खत्म कर देगा-हाँ, हाँ इसीलिए हम इसे पकड़ नही पा रहे इत्यादि इत्यादि (मोक्ष त्रिविध दुःखो का आत्यंतिक विनाश है)
काल बीतता जा रहा है और मनुष्यो ने भूख मिटाने के लिए खेती करना सीख लिया है लेकिन जीवन का असल उद्देश्य तो अब हमेशा के लिए भूख को मिटा देने वाले उस वस्तु (यहां हम उसको फल कह सकते है) को प्राप्त करना है।
वह फल उन्हें अब भी नही मिलेगा क्योंकि वह उस समय से उस वृक्ष की छाया पर लगे फल की छाया को पकड़ने का प्रयास कर रहे हैं। लाख कोशिश कर लीजिए आप उस फल से उतपन्न संवेदना को उसकी छाया छूकर महसूस कर ही नही सकते (यते वाचो निवर्तन्ति अप्राप्य मनसा सह)
नज़र बदल दीजिए आपको आज भी वह वृक्ष और वह फल दिखेंगे लेकिन सावधान, वह घण्टे दो घण्टे के लिए भूख मिटा सकता है हमेशा के लिए नही!
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