फ़िलोसॉफिकल एपिलेप्सी 【एक】
----------------------------------
ज्ञान, बौद्धिक या आनुभविक उतना ही पारदर्शी और सत्य है जितना गुरुत्वाकर्षण या विकासवाद या E=Mc^2.।
ज्ञान ब्रह्मण्ड का ही हिस्सा है, उसी की एक घटना अतः ब्रह्मांड हमे धोखा नही देता बल्कि वह अपना असल स्वरूप ही दिखाता है, हाँ यह और बात है कि वास्तविकता की कई परते हैं लेकिन हर परत उतनी ही सत्य है जितनी कोई दूसरी, और यह ब्रह्मांड की विशेषता है।
क्लासिकल भौतिकी का डिटरमिनिज़्म क्लासिकल स्तर पर उतना ही सत्य है जितना क्वांटम भौतिकी की अन्सरटेंती क्वांटम लेवल पर।
ज्ञान का मीमांसा दर्शन प्रतिपादित प्रभाकर के आख्यातिवाद सिद्धान्त के अनुसार कोई भी ज्ञान असत्य नही होता मात्र अस्पष्ट होता है। ख्याति या भ्रम वस्तुतः ज्ञान का अभाव नही, ज्ञान होने की प्रक्रिया का वह कदम है जहाँ ज्ञान पूरी तरह स्पष्ट नही हुवा है।
स्वप्न, जाग्रत और सुसुप्तावस्था की अनालोजी पर आधारित वेदांत तुरीयावस्था की कल्पना करता है क्योकि यह इन तीनो अवस्थाओं को एक दूसरे से पृथक और अलग मानता है लेकिन आधुनिक शोधों में यह निष्कर्ष आ रहे हैं कि स्वप्न हमारे जागृत जगत का ही विस्तार है और जब स्वप्न हमारे जागृत जगत के ही विस्तार हैं तो जागृत अवस्था की तुलना में स्वप्न मिथ्या कैसे?
ब्रह्म भी सत्य है और जगत भी उतना ही सत्य!
--------☆★★★☆----------
No comments:
Post a Comment