सम्भवतः हम आपस मे "कठिन और चुनौतीपूर्ण" शब्द के प्रयोग में समसन्दर्भिक नही हैं। मेरे उक्त शब्द का सन्दर्भ मानवीय अस्तित्व है, कम से कम मेरा अस्तित्व तो है ही। नास्तिक की बजाय आस्तिक एक सीधी रेखा पर चलता है, बल्कि चलना होता है जबकि नास्तिक ज्ञात रास्तों के सीमांत/ सिवान पर खड़ा होता है और उस सीमांत के आगे सब कुछ अनिश्चित और अज्ञात होता होता है।
दरअसल नास्तिकता ही बौद्धिक चेतना की उत्प्रेरक रही है और इसको आदम ईव और फॉरबिडन फ्रूट के अब्राहमिक मिथक ने बड़ी शटल तरीके से हमारे सामने रखा है जब ईश्वर की आज्ञा की अवहेलना में मनुष्य फॉरबिडन फ्रूट खाकर ज्ञानवान हो जाता है और उसे पैराडाइज़ से बाहर कर दिया जाता है।
नास्तिक हुए नही की आप उस काल्पनिक/अकाल्पनिक स्वर्ग से बाहर निकल जाते है और आपको आदम और ईव की तरह अपने अस्तिव की बहुत सी बातो के बारे में पहली बार पता चलता है!
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