Thursday, October 8, 2020

नागसेन मिलिंद संवाद के बहाने



एक उदाहरण सबसे पहले लेते हैं: 
आप एक ईंट का ध्यान करिए।  आप फिर एक अन्य ईंट का ध्यान करिए और फिर यह प्रश्न करिए कि यह दूसरा ईंट थोड़ा ज्यादा पके होने के कारण टेढ़ा होने से भवन निर्माण में न लग सकने के बावजूद ईंट क्यों है? 
अब मानसिक रूप से ईंट के कोने को तोड़िए लेकिन बचा हुआ हिस्सा अभी भी ईंट है। जबतक ईंट ढेला नही बनता तब तक उसमें क्या विशेषता थी कि वह ईंट के रूप में पहचाना जा रहा था?
शायद "ईटत्व"---दुनिया के सारे ईंटो में मौजूद एक सामान्य।
अर्थात दुनिया की सारी गायों में "गोत्व" है और इस गोत्व के कारण हम किसी नई चौपाया को देखकर यह निर्णय देते है की यह जीव गाय है अथवा नही है।

अब दार्शनिकों के पास एक नई समस्या आती है कि इस सामान्य की विवेचना करें--क्या यह सामान्य कोई वस्तुगत सत्ता है या इसको हमारी चेतना रचती है?

अब गाय होती है इसका निषेध तो कोई कर नही रहा किन्तु समस्या यह हैं---
गोत्व वास्तविक है या मेंटल कंस्ट्रक्ट?
गोत्व और गाय का सम्बन्ध क्या है आदि।
यदि इस सामान्य की वस्तुगत सत्ता है तो यह गाय के पूर्व या गाय के अलावा  कहा स्थित है 
और गोत्व और गाय में कौन ज्यादा वास्तविक है? या दोनों ही वास्तविक हैं? या महज गाय ही वास्तविक है?
(आप अंकों 1,2,3,4---के सम्बंध में भी यह प्रश्न उठा सकते हैं)

चलिए अब गाय को आदमी और गोत्व को आत्मा से प्रतिस्थापित कर दीजिए और फिर से विचार करिए---उपनिषद आत्मा की अभौतिक एवम वास्तविक सत्ता मानते हैं जबकि बुद्ध आत्मा को मेंटल कंस्ट्रक्ट।
नागसेन उपरोक्त संवाद में बुद्ध की उसी मान्यता को रथ के दृष्टांत से समझाने का प्रयास कर रहे हैं।

लेकिन यह सब करने का मतलब क्या? क्या फायदा इन लंतरानियो का--दिमाग यह सवसे पहले पूछता है और आपका मष्तिष्क भी यह प्रश्न कर रहा होगा--इसके बारे में आगे!



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उपनिषदों में एक वाक्य है: अयमात्मा ब्रह्म। इस वाक्य के द्वारा आत्मा और ब्रह्म में अद्वैत स्थापित किया गया है---लेकिन यहां आपका प्रश्न होगा कि यह अद्वैत क्यों स्थापित किया गया? ज़रूरत क्या थी इस समीकरण को रचने की।

जवाब बहुविध है--सामाजिक आर्थिक कारक, इन कारकों से निरपेक्ष जीवन जगत विषयक चिंतन। लेकिन फिर आप प्रश्न करेंगे कि यह सब चिंतन भला हुवा ही क्यों?

देखिए ऐसा हुवा है कि पुराने लोगो ने जगत को समझना चाहा और जगत में अपने अस्तिव के अर्थ को समझना चाहा और इस निष्कर्ष पर पहुंचे की आत्मा ही ब्रह्म है: दरअसल जगत और अहम का भेद एक भ्रम है और हम और जगत उसी परम सत्ता की अभिव्यक्ति हैं।

एक विचार आईशोलेशन में नही होता; यह बाद में निर्धारित किया जाएगा कि आर्थिक सामाजिक कारक किसी संस्कृति वाक्य को निर्धारित करते हैं कि ये वाक्य जो मनीषियों के मन मे जन्म लेते हैं या ढूंढे जाते है वो व्यक्ति और समाज, व्यक्ति और व्यक्ति एवम समाज एवम समाज के सम्बन्धो के संग संग व्यक्ति और समाज की जीवन पद्धति निर्धारत करते हैं---फिलहाल अभी यही मानिए की कोई तत्वमीमांसिय विचार अकेले नही होता।

अब एक दूसरा मनीषी, दूसरा विचारक जन्म ले सकता है जिसे ये बाते स्वीकार्य न हों और व्यक्ति और व्यक्ति, व्यक्ति और समाज, व्ययक्ति और जगत के सम्बन्धो को पुनर्परिभाषित करता है और इस क्रम मे कुछ नई स्थापनाए ढूंढता या रचता है।

महात्मा बुद्ध के लिए यह आवश्यक था कि वह व्यक्ति और जगत आदि के सम्बन्धो को पुनर्परिभाषित करें और इस क्रम में उन्होंने आत्मा या ब्रह्म की सत्ता को स्वीकारने से इनकार कर दिया।

नागसेन उपरोक्त संवाद में बुद्ध की उसी स्थापना को तार्किक रुप से डेमोंस्ट्रेट कर रहे हैं एक राजा के सामने।

अब आपका प्रश्न हो सकता है कि बुद्ध के लिए यह नई स्थापना अनिवार्य क्यों थी और इस नई स्थापना का भारत के इतिहास पर क्या असर पड़ा और इसके वर्तमान पर क्या असर पड़ रहा है।
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उपनिषदों की स्थापना है कि आत्मा और ब्रह्म में अभेद है और बुद्ध कह रहे है कि आत्मा नाम की कोई वस्तु या सत्ता होती ही नही है--यह क्या हुवा, बुद्ध ने वैदिक चिंतन की उस धारा को अस्वीकार क्यो कर दिया जो अपने उत्कर्ष पर आत्मा और ब्रह्म के तादात्म्य पर पहुंचती है? बुद्ध ने स्थापित चिंतन के विरुद्ध विद्रोह क्यो कर दिया? 
क्या बुद्ध का अनात्मवाद महज उपनिषदों के विरुद्ध मात्र एक इंसिग्निफिकेन्ट प्रतिक्रिया है अथवा  बुद्ध उपनिषदों के समानांतर मौजूद किन्तु दबे हुए एक दूसरे चिंतन को आवाज दे रहे है? बुद्ध कर क्या रहे हैं आखिर?

इन प्रश्नों पर हम बाद में विचार करेंगे फिलहाल हम नागसेन मिलिंद संवाद पर वापस आते है और नागसेन के तर्क को समझने का प्रयास करते है।
नागसेन रथ का उदाहरण लेते हैं लेकिन चलिए हम  उसी ईंट पर  वापस आते हैं।
फिर से वही प्रश्न की दुनिया की सारी ईंटो में ऐसा क्या सामान्य या ऐसी क्या कॉमन बात है कि वो ईंटे हैं?
एक जवाब हो सकता है कि "इंटत्व"। 
दार्शनिक प्लेटो कहते है कि जगत की वस्तुए इन समान्यो की इम्परफेक्ट अनुकृति हैं और इन समान्यो का, जो कि परफेक्ट हैं इनका अस्तित्व एक अलग लोक में हैं।

मानव जीवन परफेक्ट नही है, मानविक जगत में विविध प्रकार के अशुभ--दैहिक, दैविक, भैतिक उपस्थित हैं लेकिन आत्मा  का ब्रह्म  से तादात्म्य होने के कारण सत चित आनन्द स्वरूपा है।

ध्यान से देखने पर यहाँ व्यवहार और परमार्थ का द्वैत खिंचा दिखाई देता है और यही नही इस चिंतन के अनुसार परमार्थ व्यवहार से ज्यादा प्रासंगिक बन जाता है।
परमार्थ के व्यवहार से ज्यादा प्रसांगिक बनने का प्रभाव यह होता है कि हम इहलोक की समस्यायों का हल उहलोक में ढूंढने लगते है  और इसकी पृष्ठभूमि में पूरा एक तन्त्र विकसित हो जाता है जहाँ तत्वमीमांसिय चिंतन मनुष्य की सत्ता को क्रश करने लगता है। 
बुद्ध ऐसी किसी भी चिंतन, ऐसे किसी भी तन्त्र के विरुद्ध खड़े नजर आते हैं। वह तत्वमीमांसा के अंदर दबी कराहती मानवता को तत्वमीमांसा के बोझ से मुक्त कराने को कृतसंकल्प हैं:
बुद्ध कहते है कि यदि किसी व्यक्ति को तीर लगा हो तो उसका इलाज करना चाहिए न कि यह चिंतन की तीर किस चीज का बना हुआ है, तीर किस दिशा से आया,तीर किस वेग से आया-------

फिर लम्बा हो रहा है अतः अब अगली बार।

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बौद्ध दर्शन और अद्वैत वेदांत के तुलनात्मक अध्ययन पर ऑथिरिटी चन्द्रधर शर्मा अहम के तीन स्तर मानते हैं: प्रमाता, जीवात्मा और साक्षी।
प्रमाता आनुभविक अहम है और साक्षी अतिन्द्रीय ब्रह्मस्वरूपा विशुद्ध सत्ता।
ध्यातव्य है कि हम अहम पर विचार करते करते अहम को एक अतीन्द्रीय सत्ता के रूप में भी स्थापित कर लेते हैं यद्यपि इस अतीन्द्रीय अहम का आधार आनुभविक अहम ही है। यह ठीक उसी प्रकार से है ज्यों जगत की ससीमता सत्ता की असिमिता का बोध देने लगती है; व्यवहार ही परमार्थ की सृष्टि करता है।
अब यहां दो बातें हो सकती है: आनुभविक अहम का खंडन कर अतीन्द्रीय अहम को ही सत्य माना जाय या आनुभविक अहम को खंडित किया जाय ताकि पारमार्थिक अहम स्वयम ध्वस्त हो जाय।
नागसेन-मिलिंद संवाद में नागसेन आनुभविक या व्यवहारिक अहम का खंडन कर रहे है ताकि पारमार्थिक अहम भी खंडित हो जाय किन्तु आनुभविक अहम के खंडन से पारमार्थिक और अनितन्द्रीय साक्षी की सत्ता कितनी खंडित होती है इसकी हम आगे समीक्षा करेंगे और यह भी देखेंगे कि बुद्ध क्या अपने अनात्मवाद द्वारा इस मेटाफिजिकल और अतीन्द्रीय अहम या साक्षी को पूरी तरह एलिमिनेट कर पाते हैं।

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हमने पूर्व में एक प्रश्न उठाया था कि एक नई दृष्टि की स्थापना, एक नया उद्घोष बुद्ध के लिए एक अनिवार्यता क्यों थी। प्रारंभ में कहा जा चुका है कि बुद्ध तत्वमीमांसिय चिंतन की जगह एक व्यवहारिक चिंतन के समर्थक थे और तत्त्वमीमांसिय चिंतन के अंदर दबी कराहती मानवीय सत्ता की दर्शन के ऊपर उसकी प्रतिष्ठा को कृतसंकल्प थे।
ऐसा नही है कि तत्वमीमांसिय चिंतन की विरुद्ध पश्चिम में प्रतिक्रिया नही हुई है--हीगल के साथ तत्वमीमांसिय चिंतन पश्चिम में अपने उत्कर्ष पर पहुंच चुका था और अतः इस चिंतन में निहित विविध बिंदुओं यथा-प्रत्ययवादी प्रवृत्ति, प्रज्ञावाद की अतिशयता, दर्शन तथा तत्वमीमांसिय चिंतन का एकीकरण, परिकल्पनात्मक चिंतन का बाहुल्य के विरुद्ध प्रतिक्रिया स्वाभाविक थी। 
पाश्चात्य जगत में प्रतिप्रज्ञावादी आंदोलन, वास्तववाद का जोर पकड़ना, विश्लेषणात्मक दर्शन की नींव, फिनोमेनोलॉजी, मार्क्स का द्वंदात्मक भौतिकवाद व अस्तित्ववाद की दृष्टि का जन्म वस्तुतः इसी प्रतिवाद में हुवा।

दीघनिकाय के ब्रह्मजालसुत्त के अनुसार बुद्ध के पूर्व 62 दृष्टियां (बौधों के अनुसार मिथ्या दृष्टियां) प्रचलित थीं।
ये बासठ दृष्टियां पूर्वान्त, अपरांत और पूर्वापरांत, इन तीन विभागों में विभाजित है: पूर्वान्त में शाश्वतवाद, नित्यनित्यतावाद, सान्तानन्तवाद, अमराविक्षेपवाद और अकारणवाद, ये पांच वाद थे। ये वाद लोक और आत्मा के शाश्वत अथवा नश्वर होने को लेकर थीं। इन वादों के अंतर्गत बौद्ध साहित्य तत्कालीन प्रचलित 18 मिथ्या धारणाओं की गणना करते हैं।

अपरांत में 44 धारणाएं गिनाई गयी हैं और उन्हें भी पाँच भागो में विभाजित किया गया है: 
◆सत्त्व के मरने पर उसकी चेतना शेष रहती है।
◆सत्त्व के मरने के बाद उसकी चेतना शेष नही रहती।
◆सत्त्व के मरने के बाद उसकी चेतना न तो शेष और न ही अशेष रहती है।
◆उच्छेदवाद, जिसके अनुसार सत्त्व चार महाभूतों से बना है और मृत्युपरांत उन्ही में मिल जाता है तथा
◆दृष्टधर्मनिर्वाणवाद, जिसके अनुसार सत्त्व को इसी जन्म में उसके देखते देखते ही वह निर्वाण लाभ करता है।

बुद्ध का चिंतन तत्वमीमांसिय न होकर व्यवहारिक था। बुद्ध ने केवल उन बातों का उपदेश दिया जो उनके अनुसार जीवन की मुख्य बात, दुख से बचने के लिए आवश्यक है। बुद्ध दुख निवृत्ति के लिए इन तत्वमीमांसिय वाद विवादों को निर्रथक मानते थे और चौदह  तत्वमीमांसिय प्रश्नों का उत्तर नही देते थे जिन्हें बौद्ध साहित्य में अव्यक्तानि कहा गया है।

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बुद्ध के समकालीन तीर्थंकर
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★ पूर्णकाश्यप: पूर्णकाश्यप 'अक्रियावाद' के संस्थापक थे। पूर्णकाश्यप के मतानुसार किसी अच्छे बुरे कार्य का कोई अच्छा अथवा बुरा फल नही मिलता।
★ मक्खलि गोसाल: मक्खलि गोसाल देववाद या नियतिवाद के प्रतिपादक थे। इनके मत में पुरुषार्थ पर कोई विश्वास नही था तथा ये अकर्मण्यवादी थे। जैन आगम गर्न्थो के अनुसार मक्खलि गोसाल निर्ग्रन्थनाथपुत्र महावीर के शिष्य थे किंतु किसी प्रश्न पर विवाद होने के कारण ये महावीर से अलग हो गए और इन्होंने एक नवीन सम्प्रदाय की स्थापना कर ली।
★प्रकुष कात्याययन: ये अकृतवादी या सप्तकायवादी थे। इनका मत था कि पृथ्वी, जल, तेज, वायु, सुख, दुख और जीव ये सब अकृत अनिर्मित और अचल हैं। ये कभी किसी विकार को प्राप्त नही होते। यहाँ न कोई मरनेवाला है, न कोई सुननेवाला और न कोई सुंनानेवाला।
★ अजीत केशकम्बली: ये भौतिकवादी थे। इनके अनुसार संसार मे किसी वस्तु का कोई अस्तित्व नही है। पाप पुण्य स्वर्ग नर्क आदि की सत्ता नही है। ये चार महाभूतों को ही स्वीकारते थे। 
★संजय वेल्टिठपुत्त: यह संदेहवादी थे। इनका कहना था कि कोई भी तत्व यथा परलोक, देवता, पुण्य या अपुण्य होता है या नही इसके विषय मे नही कहा जा सकता।

★महावीर की चर्चा कालांतर में की जाएगी।

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एक सावधानी: हमे बौद्ध दर्शन के अध्ययन के अंतर्गत ही बुद्ध और उनके आंदोलन का अध्ययन नही करना चाहिए बल्कि इन्हें दो अलग अलग शीर्षकों प्रारंभिक बौद्ध धर्म तथा बौद्ध दर्शन में विभाजिर कर इनका अध्ययन किया जाना चाहिए क्योंकि बुद्ध किसी भी दार्शनिक वाद-विवाद के पक्षधर नही थे, उनकी शिक्षा व्यवहारिक थी। बुद्ध के कथनों की दार्शनिक पुष्टि बाद कि घटना है जब बौद्ध मत एवम वेदों से निःसृत मत आमने सामने आए। इस वैदिक और बौद्ध मत के कन्फ्रण्टेशन ने समेकित रूप से भारतीय दार्शनिक साहित्य को बहुत ही विपुल कर दिया।

जोनार्डन गनेरी इसे सूत्रों का काल कहते हैं। जीवन मार्ग के रूप में दर्शन के पश्चात सूत्रों का काल आता है। यहाँ भी हालांकि दर्शन का वह प्रारम्भिक उद्देश्य बना रहता है किंतु दर्शन अब अनवीक्षकी बन जाती है और फोकस उक्त लक्ष्य के बावजूद आत्मा के अलावा प्रमाण और प्रमेय पर केंद्रित हो जाता है। भावत्वमकता का स्थान तर्कशीलता ले लेती है।
यही काल है जब बौद्ध और जैन दार्शनिक विमर्श पाली और प्राकृतिक से हटकर संस्कृत भाषा मे किए जाते हैं।
यह काल दर्शन के लिहाज से बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इस काल मे विविध परम्पराओं ने आपस मे संवाद और विमर्श स्थापित किया।

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रिज़ डैविड्स का कथन है कि "बुद्ध ने संवेदनों की सभा करनेवाले किसी आत्मा रूपी राजा को नही माना।" 
इस कथन के साथ हम वापस मिलिंद-नागसेन संवाद पर आते हैं।
नागसेन मिलिंद से रथ की परिभाषा पूछते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि रथ शब्द रथ के विभिन्न घटकों के संघात का नाम है। नागसेन रथ के इस दृष्टांत से मिलिंद को यह समझाते है कि जिस प्रकार रथ शब्द कुछ भागों के संघात का प्रतीक है ठीक उसी प्रकार आत्मा शब्द भी कुछ भौतिक और मानसिक घटकों के संघात का नाम मात्र है।
रूप, विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार संघात रूप से आत्मा कहे जाते हैं। रूप आत्मा का भौतिक घटक है और बाकी विज्ञान, वेदना, संज्ञा और संस्कार आत्मा के मानसिक घटक। 
एम हिरियन्ना इन घटकों के बारे में लिखते हैं कि इन चार मानसिक घटकों में से कुछ का अर्थ थोड़ा अस्पष्ट है फिर भी इन्हें फिलहाल क्रमश: आत्मचेतना, अनुभूति, प्रत्यक्ष और मानसिक वृत्तियों के समानार्थक माना जा सकता है।

द्रष्टव्य है कि बुद्ध केवल क्षणिक संवेदनों और विचारों की ही सत्ता स्वीकार करते हुए आत्मा को एक अनावश्यक कल्पना मानकर उसका निषेध करते हैं।

प्रोफेस हिरियन्ना आगे लिखते हैं, 
"बुद्ध ने उन चीजों को सत्य माना जिन्हें उपनिषदों ने अतात्त्विक कहकर टाल दिया और उस अधिष्ठान का निषेध कर दिया जिसे उपनिषदों ने एक मात्र सत्य माना।" 

यहाँ चार्वाक के देहात्मवाद अर्थात देह ही आत्मा है और बौद्ध संघातात्मावाद में एक साम्य दिखता है फर्क यह है कि बुद्ध चार्वाकों के विपरीत मानसिक सताओ की भी आत्मा के घटक के रूप में उपस्थिति स्वीकार कर लेते हैं किंतु उल्लेखनीय बात यह है कि बुद्ध इन दोनों में से प्रचलित मत के विरुद्ध मानसिक को भौतिक से कम वास्तविक मानते हैं( रिज़ डैविड्स)।

"बौद्ध और भौतिकवाद" हालांकि एक पी एच डी का विषय हो सकता है किंतु इस पर एक सामान्य चर्चा आगे--!

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प्रारंभिक बौद्धधर्म में कुछ अस्पष्टताएं थी क्योकि बुद्ध का उद्देश्य किसी दर्शन के तन्त्र को खड़ा करने के बजाय उनका ध्यान जीवन के व्यवहारिक उद्देश्य पर अधिक था। बुद्ध के महापरिनिर्वाण के कुछ ही वर्षों के उपरांत बुद्ध की बातों को लेकर उनके अनुयायियों में मतभेद स्थापित होता है गया और शीघ्र ही बुद्ध की मृत्यु के कुछ ही समय बाद (सौ वर्षों के अंदर) अकेले भारतवर्ष में उनकी शिक्षाओं की अट्ठारह व्याख्याएं उपस्थित हो गईं। इन अट्ठारह निकायों के वर्णन आचार्य वसुमित्र ने 'अष्टादश निकाय शास्त्र" में किया है। 
चीनी यात्री इत्सिंग का कहना है कि ये अट्ठारह निकाय प्रमुखत्: चार प्रधान भागो में विभक्त थे--आर्य महासांघिक, आर्य मूल सर्वास्तिवाद, आर्य स्थविरवाद और आर्य सम्मितीय।
ई● पू● पांचवी शती में बौद्ध संघ के तीन प्रधान केंद्र थे---मथुरा, कौशाम्बी और वैशाली। वैशाली के बौद्ध भिक्षुओं में शिथिलता आ गयी थी जिसे लेकर वैशाली में ही एक बौद्ध संगीति बुलाई गई थी और मतभेदों को दूर किया गया था तथापि समय और बौद्ध धर्म के विस्तार के साथ बौद्ध विचारकों के मध्य आंतरिक विभेद बढ़ते गए और  देश-काल-परिस्थिति के अनुसार बौद्ध मत में परिवर्तन होते चले गए और इनमें नवीनताए आती गईं।

उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदायो के प्रमुख समस्त मतों को दो भागों में विभाजित किया जा  है-- हीनयान और महायान।
प्रोफेसर हिरियन्ना लिखते हैं कि इन मतों के आने की सच्चाई जो भी हो, बौद्ध धर्म के इन दोनों ही रूपो में कई महत्वपूर्ण नवीनताये समान रूप से दिखती हैं और इनमें से किसी को भी बुद्ध के मूल उपदेश को यथा रूप प्रस्तुत करनेवाला नही माना जा सकता।

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