Friday, April 17, 2020

सनातनी, ईश्वर और नैतिकता

अव्वल मैं अपने को निरपेक्ष अर्थ में सनातनी नही कहता: मैं बुल्ले की जाना मैं कौन वाली स्थिति में हूँ लेकिन ऐसा नही है कि जब तक इस सवाल का जवाब नही मिल जाए तब तक के लिए मेरी कोई एड होक आइडेंटिटी नही है,बल्कि आइडेन्टिटीज़ नही हैं। 
मैं कौन हूँ इस प्रश्न का उत्तर प्रश्न के परिप्रेक्ष्य पर निर्भर करता है: नैना का पापा, आम्रपाली का पति, राम देव मिश्र का लड़का, झारखण्ड सरकार का एक कर्मी, आधार संख्या -- -------, सर्विस संख्या 185620 कई पहचान हैं। 

सनातनी? 

बाक़ी नही मैं ख़ाकी हूँ
जिंदा हूँ जब तक बाकी हूँ

मैं कभी नही मानता कि कुछ सनातन होता है: यही एक मात्र सनातन है, इस अर्थ में आप मुझे सनातनी कह सकते हैं। 

ईश्वर?

ईश्वर के बारे में मेरी राय यह है कि यह तत्कालीन समाज के आशाओं, अपेक्षाओं, स्वप्नों, पलायनो, जीवटता आदि सारे सामाजिक मनोवैज्ञानिक गुणों अवगुणों का क्रिस्टलाइज़ेशन मात्र है।

"ख़ुदा है और क्या इसके सिवा तो कुछ भी नही
 है वो हसरतें इब्न ए आदम का ही जम जाना"

नैतिकता?

नैतिकता को लेकर मैं निर्पेक्षवादी नही बल्कि सापेक्षवादी हूँ: मूल्य शाश्वत नही होते, कदापि नही; न तो देशीय और न ही कालिय और न ही देश-कालिय आयाम में!

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