Friday, April 3, 2020

कोरोना 1

यदि पूरी दुनिया मे कोरोना महामारी फैल जाती है और कुछ लोग महामारी को हराकर जीवित रह जाते हैं तो यही होगा जैसे जैव विकास काम करता है।
हमारे पूर्वजो (हमारे का मतलब आदमी के पूर्वजो) ने ऐसी कई लड़ाइयां लड़ी हैं और विजयी हुए हैं और तब जाकर आज हमारा अस्तितव है वरना क्या होता है आदमी, कोई कल्पना भी नही कर सकता!

आप मानो या न मानो लेकिन चेतना अस्तित्व के अंतर, अंतरा और परि प्रजातीय संघर्ष के कारण ही जन्मी है; इसकी धारक कोई  शाश्वत, नेति नेति या तत्वमीमांसा वाली आत्मा नही है।

हम संयोगशाली हैं कि कोरोना जैसी आपात हमे साल-दो साल में मिलती है। हमारे पूर्वज रोजाना ऐसी आपात से सामना करते थे।
हमारा अस्तित्व करोड़ो वर्षों से हो रहे अस्तित्व के संगर्ष की गाथा है जो या तो यहीं खत्म हो जाएगी या हम उस महागाथा में दो चार पंक्तियां जोड़कर गाथा को आगे बढ़ा देंगे।

इति सिद्धम, पीड़ा मनुष्य को व्यवहार से बाँधे भी रखती है और मनुष्य से परमार्थ के रूप में पलायन की अधिभौतिकी भी रचवाती है। 
सत चित आनंद का नही पता, सत और चित का भी नही मालूम लेकिन वेदना है, यह निर्विवाद है।
परमार्थ के बोध में पीड़ा का निवारण नही होता बल्कि पीड़ा से पलायन के प्रयास में परमार्थ रचा जाता है।

अतएव धर्म जीवन के लिए है, ईश्वर जीवन के लिए है न कि जीवन धर्म और ईश्वर के लिए। यदि ये जीवन को आसान करने के बजाय और उलझा दें तो फिर अधार्मिक और नास्तिक बनना भला।
जीवन का यदि कोई लोकोत्तर या ट्रान्सेंडैंटल उद्देश्य (मुक्ति/ईश्वरीय साम्राज्य/जन्नत) न हो तो जीवन का मूल्य कम नही हो जाता, जीवन तब भी उतना ही मूल्यवान रहता है, बल्कि इहलोक में ही जीवन के उत्सव मनाने की संभावना तब और बढ़ जाती है, जीवन और जगत जैसा है उसकी स्वीकार्यता बढ़ जाती है, पलायन की अधिभौतिकी नही रचनी पड़ती।
अभी हम बंदर से आदमी ताज़ा ताज़ा बने थे इसलिए अभी भी हम मुकम्मल तौर पर आदमी नही बन पाए 
बनमानुषों ने कुछ खोजा ठीक है लेकिन, आज की पीढ़ी के लोग उन बनमानुषों  द्वारा उनके डर, स्वप्न, आशा, निराशा, पलायन, संघर्ष में ढूंढे गए उस कुछ के लिए अपने अंदर के मानुष की हत्या कर देते हैं, यह कुछ समझ मे नही आता; तब उन बनमानुषो द्वारा अपने अंदर के मानुष की हत्या करनी उनकी मजबूरी थी लेकिन आज का मानुष अपने अंदर के मानुष को मारे ये क्या बात हुई!

------●●●●--------

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...