Thursday, April 9, 2020

कोरोना 2

एक झूठ की तुम ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ रचना हैं; एक झूठ की तुम अशरफ उल मख़लूक़ात हो, एक झूठ की सोबोरे ऊपर मानुष।
एक झूठ की तुम केंद्र में हो।
सच यह कि तुमने यहाँ आने के लिए संघर्ष भी नही किया है, सच मात्र इतना है कि आज तक प्रकृति ने अचेतन रूप से तुम्हारा पक्ष लिया है।
तुम्हारी सभ्यता का दम्भ, तुम्हारी संस्कृति का दर्प, तुम्हारे ज्ञान का अहंकार सब खोखले हैं।
तुम बीमारी से मरते हो, तुम भूख से मरते हो, तुम आपस मे लड़ कर मरते हो।
तुम्हारे झूठ का आवरण हट चुका है, आँखें खोलकर अपनी खिड़की से फैले वीराने को देखो, यह सूनापन चीख चीख कर तुम्हे आईना दिखा रहा है।

आज कपड़ो की कमी हो जाय तो तुम अपने जननांग ढकने के बजाय कपड़े से मुंह-नाक ढकने का विकल्प चुनेंगे!

तुम्हारी सभ्यता ध्वस्त हो रही है, तुम्हारी संस्कृति वाष्पीकृत हो रही है।
वो तुममें से ही एक थी न जो कल नग्न होकर अमेरिका की सड़क पर मुँह में चूहे दबाए बेतहाशा दौड़ रही थी?

तुम बचोगे या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन अगर बच गए तो झूठ और गफलत में मत जीना।
एक नई संस्कृति विकसित करना, अपनी प्राथमिकतायें बदल लेना!

मनुष्यों यह संसार केवल तुम्हारा नही है। तुम किसी प्रयोजन के निमित्त यहाँ नही हो। बस हो।
तुम नही भी हो तो प्रकृति को कोई फर्क नही पड़ेगा। तुम्हारे पुरुष की कल्पना बस अपने मन की तुष्टि के लिए है। पुरुष है ही नही, केवल प्रकृति है: सत तम रज से युक्त, उन्मुक्त!
उन्मुक्त क्योकि उसका कोई नियंता नही है और वह स्वयम भी सचेतन कोई कार्य नही करती।
देश-काल के द्वि पदों से वह बस विचरण करती रहती है, निरुद्देश्य।
उस प्रारंभिक बीज से वह प्रस्फुटित है या वह बीज भी उसने ही जना है यह तुम नही जान सकते क्योंकि उसने तुम्हे यह स्वतंत्रता दी ही नही है।
उसके किसी कदम पर तुम्हारे होने की घटना घट गई, बस यूं ही, निरूद्देश्य और यंत्रवत और तुमने समझा तुम उस प्रकृति के पुरुष हो!

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