प्रश्न बदल जाते हैं।
एक प्रश्न प्रायः पूछा जाता है कि बिग बैंग कहाँ हुवा या यह ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।
सम्भवतः हम गलत प्रश्न पूछ रहे हैं और यह कहॉ ब्रह्मांड पर हम मात्र अपने मष्तिष्क में सादृश्यता की प्रक्रिया द्वारा, ब्रह्मांड के अंदर की घटनाओं को, जो कि देश काल मे घटती है, उनका आरोपण समग्र ब्रह्मांड पर कर रहे हैं।
हमारे "कँहा" कि शायद एक सीमा है क्योकि बिग बैंग हर उस जगह हुवा जिस जगह से हम परिचित हो सकते हैं: मैं जहाँ बैठा हूँ वहां भी और आप जहाँ बैठे हैं वहां भी।
समस्या यह है कि यह "कहाँ" का प्रश्न दिक-काल का, बल्कि दिक के निर्धारण का प्रयास है और दिक ब्रह्मांड के अंदर है तथा हम किसी भी प्रकार ब्रह्मांड के बारे में बाहर की दृष्टि, आउट ऑफ बॉक्स विचार बना ही नही सकते।
सिम्पली नॉट अलाउड, क्या याज्ञवल्क्य ने गार्गी से नही कहा था कि बस करो गार्गी वरना तुम्हारा मस्तिष्क फट जाएगा जब वो इस "कँहा" की शृंखला पर याज्ञवल्क्य पर प्रश्न पर प्रश्न करती जा रही थी।
लेकिन क्यों? क्या उपरतोक्त कारण ही है या अन्य कोई तर्क है जिससे इस बात को बल मीले सकता है कि हम वस्तुतः प्रश्न ही गलत कर रहे हैं?
मैं भी एक साम्यानुमान का सहारा लूंगा।
मेरी बेटी अबोध है। वह देखती है कि पड़ोस वाली बुवा हमारे घर मे आती है फिर अपने घर जाती है अर्थात पड़ोस वाली बुवा यहां से जब चली जाती है तो अपने घर मे जाती है और उनका घर हमारे घर के पीछे है।
एक दिन बेटी सुनती है कि "बिजली चली गई"
अब वह बुवा के साथ उपस्थित चीजो के साथ बनी अपनी मन मे संकल्पना के आधार पर साम्यानुमान का प्रयोग कर पूछती है कि पापा बिजली का घर कहा है?
वह बड़ी होगी और उसकी चेतना विकसित होगी तो वह जानेगी की बिजली चली गई एक बस काम चलाऊ वाक्य है। बिजली चली गई और बुवा चली गई दोनों एक बात नही है।
हममें उनकी जिनकी भौतिकी और गणित में उस स्तर की ट्रेनिंग नही है शायद मेरी बेटी की तरह ही साम्यानुमान के आधार पर यह गलत प्रश्न पूछ रहे है कि बिग बैंग कहा हुवा और ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।* ज्ञान के विस्तार के साथ, चेतना के विकास के साथ शायद हमारे प्रश्न बदल जाए और हमे यह प्रश्न अ-प्रश्न लगे- बिगबैंग कहा हुवा और ब्रह्मांड किसमे फैल रहा है।
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* हॉकिंग कहते हैं कि यह ऐसा ही प्रश्न है कि उत्तरी ध्रुव के उत्तर में क्या है।
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