हल्की सी झपकी लगी थी कोरोना के बारे में सोचते सोचते फिर स्वप्न में कोरोना देख कर नींद उचट गई।
जाग्रत-स्वप्न-जाग्रत के इस चक्कर में याद आया कि जगत स्वप्न की भाँति मिथ्या है तथा ब्रह्म एक मात्र सत्य है अतः कोरोना अविद्या, माया, रज्जू में सर्प का भ्रम मात्र है।
एक मुमुक्षु को कोरोना से भयभीत नही होना चाहिए क्योंकि उसको तो यह सोचना है कि यह सब मिथ्या जगत की मिथ्या चीज़ें हैं; आत्मा को कोरोना छू भी नही सकता भले शरीर तड़प तड़प कर आई सी यू में मर जाए।
कितना खोखला दावा है तुम्हारा, और तुम इसे असल ज्ञान कहते हो!
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जगत मिथ्या है
किंतु महामारी
क्या है
हे आस्तिक शिरोमणी?
और नागार्जुन
कोरोना भी
निः सार निष्परपंच
शून्य है क्या?
अच्छा जिनेन्द्र
तुम बताओ
वायरस में आत्मा
है कि नही?
दरअसल हम कोरोना को उपरोक्त दर्शन/ दृष्टि/ दिठ्ठी में जन्मी शब्दावली में सोच ही नही सकते लेकिन हम उन शब्दावलियों में जगत को बलात अवश्य सोंचेंगे क्योकि अतीत महान था वर्तमान में आपात है और भविष्य फिर से महान होगा भले ही भविष्य नाम की कोई चीज ही न बचे!
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