जिंदगी में कुछ है वै नही सब नाटक है और इस नाटक के नीचे थोड़ी सी ही असल ज़िंदगी है।
कभी उसको देखा भी है तुमने?
देखना, लेकिन तब उसके लिए मौला बनना पड़ेगा, पागल बनना पड़ेगा, मलंग बनना पड़ेगा और साथ ही अपने इनहिबिशन्स पर जीत भी हासिल करनी होगी और यह बड़ी हिम्मत का काम है।
नदी पुल से पार कर लिया तो बड़े तीसमारखाँ हो?
डूबने का मजा लो, गहराई में उतरो, पानी से बाहर आओ फिर डुबो, थोड़ी देर धारा के साथ बहो, थोड़ी देर उसके विरुद्ध तैरो....नदी पार करने का मज़ा तब है न।
नदी के उस पार दो-तीन मन लकड़ी ही है सबके लिए, सबके लिए!
इसलिए अपना ही व्यक्तित्व जियो।
दानिशमंदी बादशाही न मालो असबाब की फिकर
फकीरी करता रहूँ, ज़िंदगी गुजरे मेरी फकीराना।
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