प्रेत
जब वह जन्मा तो वासनाओं का प्रेत था।
जो दार्शनिक और विचारक यह कहते हैं कि वह जन्म के समय निश्छल और पवित्र था वह झूठ कहते हैं और वह यह भी झूठ बोलते हैं कि उसको प्रेत उसके समाज ने बना दिया क्योकि यह समाज ही था जिसने उसके अंदर के आदमी की हत्या कर दी थी वरना वह आदमी से विकसित होकर ईश्वर भी बन सकता था।
दरअसल हम सब वासनाओं के प्रेत ही जन्मते है लेकिन शीघ्र ही हमारा सामना समाज द्वारा रचित महाप्रेत, ईश्वर से होता है जिसकी तुष्टि के लिए हमे अपने प्रेत के एक बहुत बड़े हिस्से की बलि चढ़ानी होती है और यह बचा हुवा हिस्सा ही आदमी कहलाता है।
महाप्रेत को तुष्ट करना हमारी बाध्यता है क्योकि उसके तुष्ट होने के बाद ही समाज हमे स्वीकार करता है और हमे समाज की जरूरत है।
समाज की अपनी वासनाएं है लेकिन उन्हें वह प्रेत कहना पसंद नही करता बल्कि वह अपनी वासनाओं को ईश्वर कहता है। उसने इस शब्द से एक माया रच रखी है ताकि उसके प्रेत के आगे बाकियों के प्रेत उन्हें पापी और छोटे दिखें जिससे उनके प्रेतों का बलिदान करवाया जा सके।
चूंकि आदमी भी प्रेत है और ईश्वर भी अतः इन्हें मात्र भटकते रहना है और ये बस भटकते ही रहते हैं।
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