Wednesday, June 23, 2021

तत्त्वमीमांसा-1

अस्तित्व--ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता की त्रयी समेकित रूप से अस्तित्व की रचना करती है- इस अस्तित्व के बारे में चिंतन ही अधिभौतिकी है। 
वस्तुतः अस्तित्व हमारे सारे ज्ञान, हमारे सारे निर्णय, हमारे सम्पूर्ण अनुभव और हमारे सारे रागों में आरम्भ से ही उपस्थित है, बल्कि यह अस्तिव ही इन सारी चीजों का आधार है जिसपर हमारी कला, वाणिज्य, गणित और विज्ञान आदि खड़े होते  है ---इस आधार, तत्त्व, को पकड़ना ही अधिभौतिकी या तत्त्वमीमांसा है।
भारतीय परम्परा में ---
आत्मा ही वह तत्त्व है,
ब्रह्म ही वह तत्त्व है।
अतः आत्मा ही ब्रह्म है और ब्रह्म ही आत्मा।

दर्शन ब्रह्मांड की व्याख्या नही करता बल्कि यह जगत और संसार की व्याख्या करता है। ब्रह्मांड विशेष दृष्टि का विषय है जिसको बौद्धिक प्रक्रियाओं द्वारा अनुभव में प्राप्त जगत और संसार से निगमित किया जाता है। ब्रह्मांड मूल्यों के साथ संयुक्त होकर जगत है और जगत जन्म- मृत्यु आदि घटनाओं से ऊपजे भाव सुख-दुख आदि द्वारा  के साथ संयुक्त होकर संसार का निर्माण करता है। एक दार्शनिक को संसार और जगत से मतलब रहता है, ब्रह्मांड वैज्ञानिक का विषय वस्तु है लेकिन  एक दार्शनिक को मात्र संसार से ही मतलब नही होता बल्कि वह ब्रह्मांड में पूर्व से उपस्थित तत्त्व या सत्ता को भी पकड़ने की कोशिश करता है और उसका यही प्रयास व्यवस्थित होकर तत्त्वमीमांसा के रूप में उभरता है। 
ध्यातव्य है कि वह तत्त्वमीमांसा ज्यादा सफल और फलीभूत मानी जाएगी जिसने तत्त्व के साथ संसार की भी व्याख्या कर दी।
यहाँ  मानव की बात न कि जाय तो मात्र अस्तिव और तत्त्व की बात करना बेमानी होगी---ज्ञेय और ज्ञान से ज्ञाता को अलग किया ही नही जा सकता हालांकि विज्ञान में ज्ञाता को इब्से अलग करना  वैज्ञानिक दृष्टि विशेष की बाध्यता भी होती है और आवश्यक शर्त भी- तर्क विश्लेषण करती है, अस्मद-युष्मद रचती है और भावना संश्लेषण करती है। तर्क में द्वैत का जन्म होता है और भाव मे अद्वैत का। और मनुष्य इसी तर्क-भावना के द्वंद का नाम है बल्कि इस द्वंद को पार कर जाना, इसे ट्रांसेड कर जाना ही मनुष्य होना है---और इसी द्वंद्व के पार वह मुक्ता जिसे तत्त्व कहते हैं मानवीय मुट्ठी में पकड़े जाने के लिए पड़ा हुवा है।

---जारी।

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