Thursday, June 24, 2021

ईश्वर-अनीश्वर--1

ईश्वर-अनीश्वर--1

इस जगत में कुछ भी पूर्ण नही है, प्रकृति भी नही क्योकि प्रकृति की विकृति का सुधार ही तो संस्कृति है और इस सुधार के द्वारा मनुष्य प्रकृति को पूर्णता प्रदान करने का प्रयास करता है और सबसे बड़ी बात की इन सब का रचयिता ईश्वर भी  पूर्ण नही है--वह दरअसल कभी पूर्ण था ही नही--उसकी अपूर्णता उसे हमेशा परेशान करती है और अपनी अपूर्णता से ईश्वर डरता है और मात्र वह डरता ही नही है बल्कि वह अपूर्णता को छुपाने के लिए हम मनुष्यों से झूठ बोलता है, हमे धोखा भी देता है। हमे धोखा देने के निमित उसने हमारे बीच अपने जासूस भेज रखे हैं जो हमारे बीच उसकी पूर्णता के झूठ का प्रचार करते हैं--उसकी पूर्णता के गीत और काव्य लिखते है।
इन जासूसों ने सदियों से राजाओं, महाराजो, नगरसेठों और धनवानों और शक्तिशालियों की बुद्धि के ऊपर कब्जा कर रखा है क्योकि उन्हें मालूम है कि यदि ईश्वर की पूर्णता के झूठ का बने रहना है तो इन लोगो को अपने जाल में फंसाए रखना जरूरी है--और देखिए राजाओं, महाराजाओं, नगरसेठ आदियों ने उसके झुठ को छुपाने के लिए असंख्य मंदिरों का निर्माण भी किया है जहाँ धन है, वैभव है, ऐश्वर्य है, पूर्णता का एहसास है लेकिन असल मे जो लोग नही देख पाते वह यह है कि वहाँ धोखा है।

ईश्वर की अपूर्णता का नाम अनीश्वर है। अनीश्वर ईश्वर के समान ही शाश्वत और अनश्वर है लेकिन ईश्वर के समान वह न तो सृष्टि की रचना करता है और न ही  उसके समान सचेतन सृष्टि में कोई हस्तक्षेप करता है लेकिन चूंकि अनीश्वर ईश्वर में ही मौजूद है अतः जहाँ भी ईश्वर उपस्थित जाता है वह स्वमेव उपस्थित है--ईश्वर के झूठ और धोखों में भी-ईश्वर के जासूसों द्वारा रचित काव्यो और गीतों में भी और राजाओं, महाराजाओं और नगरसेठों द्वारा बनाए गए मंदिरों में भी।

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