तत्त्व और अनुभव का द्वंद
द्वंद में उलझी विकृति
प्रकृति निर्द्वन्द,
सजीव निर्जीव से परे,
जड़ न चेतन अरे,
वर्गीकरण से पार, अपार!
त्रिगुण की धार!!
मन क्या बुझे जो अ-मना?
यथार्थ, कई यथार्थ;
यथार्थ, अनुभव का गुणधर्म।
तत्त्व, यथो वाचो मनसा
निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह;
शून्य, अज्ञेय या सच्चिदानन्द
वही सत अचित्त वेदना भी।
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