जब तक जगत के केंद्र में ईश्वर था, मनुष्यों को चीजें स्पष्ट थी। उन्हें लगभग हर चीजों का अर्थ मालूम था--जगत, जीवन, मृत्यु, आंनद, पीड़ा---
फिर बुद्धि ने उसके व्यक्तित्व का अतिक्रमण कर लिया और यह अतिक्रमण होना ही था क्योकि पूर्व में उसे जो अर्थ मालूम थे वह उसके अनुभव से मेल न खाते; उसके स्वयम के द्वारा रचित तत्त्व और उसके अपने अनुभव में लगातार एक द्वंद चलता रहता। इस द्वंद के विश्लेषण से मानवीय चेतना ने देखा कि वास्तव में जगत के केंद्र में तो ईश्वर है ही नही और उसने उद्घोष कर दिया कि वह स्वयम अर्थों की कसौटी और मापदंड है। मनुष्यो ने अपने पूर्व के केंद्र ईश्वर को पृष्ठभूमि में भेजना प्रारम्भ कर दिया और केंद्र में स्वयम को स्थापित करना प्रारम्भ कर दिया।
मानवों में से कुछ कवि ह्रदयों ने इस केंद्र की वस्तु के प्रतिस्थापन्न को रूमानी नाम भी दिये-पुनर्जागरण, मानववाद--!
समस्या यह थी कि मनुष्य काफी सीमित था-वह न तो सर्वव्यापी था, न सर्वशक्तिमान, न सर्वकालिक, न अनश्वर और शाश्वत और न ही वह आवश्यकता पड़ने पर कार्य-कारण की मेखला को तोड़ कर चमत्कार आदि ही पूर्व के केंद्र, ईश्वर की भांति कर सकता था-- बल्कि उसकी बुद्धि ने उसे दिखाया था कि वह एक बहुत बड़े स्कीम का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है, एक बहुत बड़े मशीन का एक छोटा सा अमहत्वपूर्ण हिस्सा और वह बड़ी मशीन उसके बिना भी वैसे ही क्रियात्मक है।
मनुष्यों में से कुछ ने अपनी स्थिति स्वीकार करते हुए उस वृहत मशीन पर चिंतन करना प्रारम्भ किया लेकिन यह क्या--इस मशीन का भी कोई अर्थ नही है--यह मशीन तो असल मे मशीन है ही नही--यह तो अराजकता, अतार्किकता की एक बहुत बड़ी गठरी है जो फट चुकी है और उसकी अराजकता और अतार्किकता रिस रिस कर चूती रहती है--!
हा--! कहीं कोई अर्थ नही, कहीं कोई मूल्य नही, कहीं कोई उद्देश्य नही--हर ओर एक शून्यता, एक रिक्तता, एक मूल्यहीनता, एक निराशा-- और मनुष्य की चेतना अवसाद से भर गई।
मनुष्यों में से दार्शनिको ने इस अवस्था को निहिलिज्म का नाम दिया।
इस रिक्तता, इस शून्यता, इस अर्थहीनता ने जब मानवीय चेतना को अवसाद से भर दिया तो इससे उभरने के लिए मनुष्यो ने अपने को फिर से परिभाषित करने का प्रयास किया लेकिन पिछली बार की तुलना में अब उनकी मनुष्य की नई परिभाषा में मनुष्य का अस्तित्व पहले था, उसका सार बाद में; अब मनुष्य का कोई पहले से बना बनाया सार नही था जिसकी ओर गति मनुष्य के जीवन को सार्थक बनाती थी बल्कि अब आरंभ ही मनुष्य से होता जो अपने सार का निर्माण करता और यह सार निर्माण ही उसके जीवन की सार्थकता थी--अर्थात एक मूल्यहीन, अर्थहीन और अराजक जगत में मनुष्यों द्वारा अपने मूल्य, अर्थ और व्यवस्था की तलाश और अब महसूस किया गया कि मनुष्य स्वतंत्र होने को अभिशप्त है।
परन्तु यदि समग्र जगत ही अर्थहीन और निरुद्देश्य है तो क्या मनुष्य का जीवन अर्थपूर्ण हो सकता है जब कि वह तो खुद इस अराजकता और अतार्किकता की बहुत बड़ी गठरी के एक बहुत ही छोटे कोने में बहुत ही अमहत्वपूर्ण तरीके से पड़ा हुवा है--यह प्रश्न तो, बावजूद मनुष्य के अस्तित्व को उसके सार का पूर्वगामी मानने के, जस का तस मुँह बाए खड़ा है।
लेकिन समस्या यह भी है मनुष्य अपने जीवन का अर्थ ढूंढ़ने से बाज नही आता-सम्भवतः यह अर्थ तअलाशने की प्रवृति उसके जीवन के साथ ही ऐसी गुंथी हुई है कि वह इसे अलग नही कर सकता।
मानव का जीवन में इन्हेरेन्ट मूल्य और अर्थ ढूंढने की प्रवृत्ति तथा इस उद्देश्यहीन, अर्थहीन और अराजक ब्रह्माण्ड में उसका ऐसा कर पाने की अक्षमता के द्वंद को एब्ज़र्ड के नोशन या भाव से व्यक्त किया गया है।
एब्ज़रडिज्म के अनुसार मानव जीवन में मूल्य तलाशता है और जब सब कुछ अर्थहीन है लेकिन मानव अर्थ खोजने को विवश है तो मानव के जीवन में एक शून्य का निर्माण होता है।
मनुष्य क्या करे जबकि वह अपने जीवन के अर्थ ढूंढ़ने को विवश भी है और कहीं कोई अर्थ भी नही है---
तीन रास्ते हैं--
-----आत्महत्या
-----आस्था की छलांग लगाते हुए देश-काल से या
देश से या काल से अतीत किसी अपरीक्षित
सत्ता में विश्वाश करते हुए उसे उद्देश्य बनाकर जीना और इसी संदर्भ में जीवन के अर्थ की व्याख्या कर डालना लेकिन तब यह तो फिर आत्महत्या ही हुई--एक बौद्धिक और दार्शनिक आत्महत्या।
------इसको स्वीकार करते हुए कि जीवन और जगत का कोई अर्थ नही है और फिर भी हम उसका अर्थ ढूंढते है, के साथ इस बात से भी विद्रोह करते रहना और जीते जाना, हालांकि कुछ इस स्वीकार्यता और विद्रोह को शैतानी पागलपन भी कहते है, तब भी।
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