Monday, June 21, 2021

जीवन का अर्थ

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।
फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब  हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है। 

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।
उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।

पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।

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