ईश्वर और संसार
समय के उस पार जब हममें से कोई नही था और हमारी दुनिया भी नही थी तब केवल वह था। वह न तो ईश्वर था न शैतान, न जड़ न चेतन हालांकि वह वेदना और आनन्द का सम्मिलित रूप था, उसमें चित भी था और अचित्त भी, वह सत भी था और असत भी।
अपने आरंभ से ही वह महानिद्रा में सोया हुवा था फिर एक दिन उसकी नींद खुल गई-अब वह जाग गया था लेकिन जाग्रत अवस्था मे वह क्या करे?
उसने दूर-दूर तक देखा लेकिन हर जगह वह खुद को ही पाता था-उसकी दृष्टि बहिर्मुखी होने के बावजूद अंतर्मुखी थी। उसने देखा वह चित्त भी है और अचित्त भी, आनन्द भी और वेदना भी, जन्म भी और मृत्यु भी, अच्छा भी और बुरा भी। अपने अंदर असत, अचित्त और वेदना देखकर वह बेचैन हो उठा अतः उसने अपने भीतर के असत, अचित्त और वेदना को इकट्ठा करना प्रारम्भ किया। जब उसके अंदर के समस्त असत, अचित्त और वेदना इकट्ठे हो गए तो उसने इनको अपने से निकाल कर एक गठरी बनाई और उस गठरी को समय के उस पार फेंक दिया।
अब समय के एक तरफ ईश्वर था और दूसरी ओर संसार।
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