दर्शन के बारे में कहा जाता है कि यह जीवन और जगत की सम्पूर्णता में व्यायख्या करने का प्रयास है, बल्कि यह संसार के अर्थ को समझने की कोशिश है।
दो बातें हो सकती हैं--संसार का कोई अर्थ है अथवा संसार का कोई अर्थ है ही नही। संसार के अर्थ निर्धारण का इसके अलावा क्या अभिप्राय हो सकता है कि हम हम अपने अनुभवों को एक सन्दर्भ दें। हमे अपने अनुभवों को सन्दर्भ देने के लिए एक बहुत ही बड़े संरचना, स्ट्रक्चर या फ्रेमवर्क की आवश्यकता होती है जिसके अंदर हम अपने विविध अनुभवों को अलग अलग जगह रखकर एक कोहरेन्ट तस्वीर बनाने का प्रयास करते हैं।
संरचनावादी मानते है कि प्रत्येक संरचना का एक केंद्र होता है जिसके इर्द गिर्द ही संरचनाए विकसित होती हैं-ब्रह्म, शून्यता, ईश्वर आदि ऐसे ही केंद्र हैं।
लेकिन तब संरचनावादियों के अनुसार अर्थ उभरने के लिए विपरितो की उपस्थिति भी आवश्यक है--प्रकाश को हम अंधकार की उपस्थिति में समझ ही नही सकते, जीवन को हम मृत्यु की उपस्थिति में नही समझ सकते, सत को हम असत की अनुपस्थिति में नही समझ सकते।
ध्यातव्य है कि कई बार हम विपरितो की कल्पना भी करते है क्योकि कई चीजें ऐसी है जिनके विपरीत का साक्षात हमे सम्भव नही है। नश्वरता का हमे अनुभव तो है लेकिन शाश्वतता की हमे कल्पना करनी पड़ती है लेकिन इस विपरीत के सृजन के पश्चात यह भी सम्भव है कि हमने अपने स्ट्रक्चर का जो केंद्र स्थापित किया था उसको इस नए विपरीत से प्रतिस्तापित कर दें और कालांतर में हमारे विमर्शों और चिंतन में यह विपरीत ही बार बार उस वास्तविक केंद्र को दबाते हुए उपस्थित हो और हमारी समझ चीजों की वास्तविक समझ से दूर होती चली जाय।
प्रश्न यह है कि क्या संसार और जगत को समझमे के लिए हमने जो केंद्र निर्धारित किया था वह वास्तव में ईश्वर और ब्रह्म था अथवा इनका बाइनरी और अब हमें संसार को अव्यवस्था और असत अचित्त वेदना को भी ध्यान में रखते हुए उन दार्शनिक साहित्यों के अंदर छुपे अर्थ को पकड़ने की कोशिश करनी चाहिए जिनमे ऊपरी तौर पर ईश्वर, ब्रह्म आदि को केंद्र में रखकर संसार की विवेचना की गई है।
इस प्रकार के केंद्र प्रतिस्थापन से यद्यपि हमे एक नया अर्थ अवश्य मिलता है तथापि यह दावा नही किया जा सकता कि हमने चीजों के अर्थ को समझ लिया है क्योकि एक ही घटना को समझने के लिए संरचनाओं का कई तंत्र उपस्थित हो सकता है और प्रत्येक संरचना में एक दूसरे से मात्रात्मक और गुणात्मक रूप से अलग केंद्र उपस्थित हो सकते हैं और ऐसे में घटनाओ का एक निश्चित अर्थ होना अथवा कोई अर्थ होना कहना ही दुराग्रह होगा।
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