Thursday, July 1, 2021

जनेऊ

जनेऊ

उस वासना के प्रेत का जनेऊ पहनना समाज के लिए एक सुखद अनुभूति थी। उसके जनेऊ के समय समाज ने उसे कई प्रण करवाए थे जिनका अभिप्राय उसे प्रकृति से निकाल कर संस्कृति में स्थापित कर देना था क्योकि बुजुर्गों को पता चल चुका था कि प्रकृति में विकृति है और इस विकृति को केवल संस्कृति ही ठीक कर सकती है।
वासना का प्रेत स्वछंद था क्योकि वह प्रकृति की विकृति लिए हुए था। उसकी स्वछंदता के ऊपर गांठ लगानी आवश्यक थी वरना यह दुनियाँ प्रेतों की दुनियाँ बन जाएगी इसलिए समाज ने उसकी वासनाओं में से उन हिस्सों को छोड़कर जिनकी पूर्ति कर वह मनुष्य के रूप में विकसित होगा, शेष पर ब्रह्मगांठ लगा दिया और उस धागे को उस प्रेत के शरीर पर लपेट दिया।
अब वासना का वह प्रेत मानव था और शेष मानवों की पंगत में बैठ सकता था और अब बुजुर्गों से भी सम्वाद कर सकता था। बुजुर्गों द्वारा साक्षात किए गए सत्य अब उसके लिए भी उपलब्ध थे।

लेकिन वासना का वह खास प्रेत, ईमानदार नही था। हालांकि उसने अपने शरीर पर धागे लपेटवाए थे और अपनी स्वच्छन्दता के ऊपर ब्रह्मगांठ लगाने दिया था फिर भी उसके अंदर की बेईमानी ने उसे दिखा दिया कि इस धागे को तोड़ा जा सकता है, ब्रह्मगांठ को खोला जा सकता है और पुनः वापस वासनाओं का प्रेत हुवा जा सकता है। उसे वापस पुनः वासनाओं का प्रेत होना था क्योकि वहाँ प्रकृति की विकृति में उसे ज्यादा सुख मिलता। वँहा उसे ज्यादा सुख मिलता क्योकि प्रकृति की विकृति में वह स्वच्छंद था और स्वच्छन्दता वास्तव में सुसंस्कृत होने से ज्यादा सुख देती है। सभी पुनः वापस प्रेत नही हो जाते क्योकि उन्हें मालूम है कि मात्र सुख ही अब हमारे जीवन का उद्देश्य नही है लेकिन इस बेईमान प्रेत के लिए उसके जीवन का उद्देश्य मात्र सुख ही था।
वासना के इस प्रेत ने जनेऊ तोड़ डाला, अपनी स्वच्छन्दता को ब्रह्मगांठो से मुक्त कर दिया और वापस संस्कृति से प्रकृति की विकृति में चला गया।

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