बौद्ध दर्शन और संस्कृति में काम को मार कहते हैं। सिद्धार्थ मार विजय के पश्चात ही बुद्ध बनते हैं लेकिन यहीं बौद्ध विचार अपूर्ण हो जाता है क्योकि बौद्ध दर्शन में काम पुनर्जीवित नही होता और काम के बिना यह सृष्टि कैसी!
हिन्दू विचार पद्धति में यद्यपि काम को शिव भष्म कर देते हैं तथापि वसंत ऋतु और मदनोत्सव में वह अभी कुछ दिन पहले ही महाशिवरात्रि में माता पार्वती के संग परिणय सूत्र में बंधकर स्वयं कामेश्वर बन कर मदन को नवजीवन प्रदान कर देते हैं और प्रकृति के विविध रंगों में, पुरषों की मस्ती में, स्त्रियों के अल्हड़पन में काम पुनर्जीवित हो उठता है--सृष्टि आगे बढ़ जाती है।
लेकिन, एक चक्र तब तक तो पूर्ण हो चुका है--एक सम्वत्सर बीत चुका है, होलिका के रूप में अन्न की फलियां देवो को समर्पित की जा चुकी हैं--देवो ने अपना अंश भी ग्रहण कर लिया है--सम्हत जल चुकी है और अगले दिन होलाका क्रीड़ा जो रंगों और जल से की जा रही है।
शाश्त्रो में यह होलाका क्रीड़ा वस्तुतः देव यज्ञ है।
[सनातन संस्कृति में पाँच प्रमुख यज्ञ हैं:--
ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ और मनुष्ययज्ञ।
अपना बौद्धिक सम्वर्द्धन ब्रह्मयज्ञ है, देवताओं को उनका हिस्सा देना क्योकि वह वापस हमे पोषित करते हैं, देव यज्ञ है। कुल-परपरा का रक्षण पितृ यज्ञ है, मानवेतर प्राणियों को उनका हिस्सा देना भूत यज्ञ है और मानवमात्र से प्रेम और उनके कल्याण के अर्थ किया गया कार्य मानवयज्ञ है।
होलाका क्रीड़ा उन सामूहिक 20 क्रीड़ाओं में से एक है जिनके बारे में आचार्य वातस्यायन कामसूत्र में लिखते हैं;---
१.यक्षरात्रि, २ शरद पूर्णिमा, ३ सुवसन्तक, ४ सहकार भंजिका, ५ अभ्यूष खादिका, ६ बिसखादिका,७ नवपत्रिका, ८,उद्क क्ष्वेदिका, ९ पांचालानुयान, १० एक शाल्मली,११ यव चतुर्थी, १२ आलोल चतुर्थी, १३ मदनोत्सव, १४ दमन भंजिका, १५, होलिका, १६, अशोकोत्तनशिका, १७ पुष्पावचायिका, १८,चूतलतिका, १९ इक्षु भंजिका और २०, कदम्ब युद्ध
आचार्य वातस्याययन का आदेश है कि ये क्रीड़ाए नागरिक सम्मिलित होकर खेलें।
आचार्य आगे लिखते हैं कि ये वर्णित क्रीड़ाए अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार अकेले नागरिक को नगरवधू के साथ, नगरवधू को अपनी सेविकाओं के साथ अथवा नागरिक को अपने मित्रों के साथ खेलनी चाहिए।]
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