हमारे भाषा की रचना भी बड़ी विचित्र है-यह गुढ़ कथनों को अभिव्यक्त कर एक विरोधाभास में फंस जाती है, निषेध करती है तो वह निषेध ही विधेय बन जाता है, अज्ञेयता का प्रतिपादन करे तो अज्ञेय ज्ञेय बनकर झाँकने लगता है, शून्यता का प्रतिपादन करे तो स्वयम भाव के बारे में बात करती प्रतीत होने लगती है, सापेक्षता का निष्कर्ष स्थापित करे तो स्वयम एक निरपेक्ष भाव और प्रतिज्ञप्ति रचती प्रतीत हो रही होती है।
एक कथन, एक भाव, एक विचार लीजिए:
"हमे जगत के अनुसंधान में निष्पक्ष होना चाहिए और किसी मत मतांतर की पुष्टि तुष्टि से बचना चाहिए"
सामान्यतया वैज्ञानिक दृष्टि इस विचार को व्यवहार में उतारकर ऑब्जेक्टिव होने का दावा प्रस्तुत करती है किंतु उपरोक्त विचार की हमे जगत के अनुसंधान में-----पुष्टि तुष्टि से बचना चाहिए, स्वयम में एक मत है और इस प्रकार वैज्ञानिक दृष्टि भी निष्पक्ष कहॉ रह पाती है?
वस्तुतः जो चार्ज, जो आक्षेप दार्शनिक स्थापनाओं पर भाषा की इस विचित्रता के कारण लगाए जाते हैं उनको वैज्ञानिक दृष्टि और मान्यताओं पर भी उसी आग्रह के साथ लगाया जा सकता है।
-----☆★★★☆------
No comments:
Post a Comment