Wednesday, June 23, 2021

मेरी लघुकथाएँ


 【एक】
   राजा

उस राज्य की सबसे सुंदर स्त्री के सौंदर्य के चर्चे होते थे।  दूर देश के कवि उसकी एक झलक पाने को बेताब रहते थे ताकि उनकी कविता श्रृंगार और विरह के अब तक अनछुए पक्षो को शब्दों में बांध सके। कुछ दीवानों ने तो उस स्त्री के लिए सम्राट के महल में, जहाँ वह रहती थी और उसका मनोरंजन करती थी, छुपकर प्रवेश करने की कोशिश भी की थी और फिर सम्राट के सजग सैनिकों द्वारा पकड़े गए थे और सम्राट के क्रूर जल्लादों द्वारा चौराहे पर काट डाले गए थे।

उस राज्य के सबसे ज्ञानी व्यक्ति के भी देश विदेश हर जगह चर्चे थे और सम्राट ने उसे सरस्वती-पुत्र की उपाधि भी दे रखी थी। वह समस्त शास्त्रों और समस्त विद्याओं का ज्ञाता था तब भी उसकी ज्ञान पाने की भूख मिटती ही नही थी।

सम्राट अपने सिंहासन के बाएं उस सौंदर्यवान स्त्री को अपने बाएं तथा ज्ञानी को दाएं बिठाकर शासन चलाता। 

एक दिन ज्ञानी और सौन्दर्यवती एक दूसरे पर आसक्त हो गए किंतु वह सम्राट से मन ही मन डरते भी थे अतः उनके मन मे इस विचार ने जन्म लिया कि सौंदर्य और  ज्ञान मिलकर शासन क्यो न करे, आख़िर हमे इस सम्राट की आवश्यकता क्या है! और यह विचार विद्रोह में बदल गया। 
ज्ञानी ने अपने ज्ञान से सबसे घातक विष तैयार किया जिसे उस सौन्दर्यवती स्त्री ने धोखे से सम्राट को उस रात शराब की प्याली में शराब ढालने वक्त मिला दिया। 

अगली सुबह सम्राट के सिंहासन के अगल-बगल की जगह खाली थी, पता चला कि कल रात ज्ञानी ने एक विष बनाया था जिसका उसने स्वयम पर प्रयोग किया   और उस विष की बेचैनी में उसने उस सौन्दर्यवती को मार दिया तथा स्वयम भी उस विष के प्रभाव से मर गया।

सिंहासन पर बैठे सम्राट की आँखों मे कोई पश्चाताप नही था बल्कि उसके चेहरे को बड़े ध्यान से देखने पर संतोष का भाव दिखता था जो इस बात की चुगली थी कि वह बलवान है।
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【दो】

पतित

अपने अंतरंग वार्तालाप के क्षणों में नदी ने सागर से इठलाते हुए उस चट्टान के बारे में बताया: एक अभागा पत्थर था जो बाकी पत्थरो से टूट कर मुझमे गिर गया लेकिन मुझे तो सागर में मिलना था इसलिए मैंने उस पत्थर पर थोड़ी अठखेलिया कर लीं। और दोष मेरा भी नही है क्योंकि यदि मैं उस पर अठखेलिया ना करती तो वो मेरा बहाव रोक देता लेकिन मुझे तो सागर में मिलना है।
सागर अपनी सम्पूर्ण गम्भीरता से बोला: पत्थरो की यही नियति है। मैं कई युगों से उनकी यह नियति देख रहा हूँ।

वही बगल में सागर और उस नदी की आंखों से अदृश्य उनकी बातें एक पतित देवदूत ने सुन लिया।
उसे अपनी और उस चट्टान की नियति एक दिखी--दोनों ही तो पतित थे; दोनों ही ने विद्रोह किया था; आह, दोनों ही ने तो सपने देखे थे!
तभी उस पतित देवदूत को स्मरण हुवा कि उसके पास तो स्वप्न विधाता ने भेजे थे और हाथ जोड़ते हुए यह मिन्नत की थी कि इस स्वप्न को देखो ताकि तुम पतित बनो--तुम पतित बनो क्योकि मेरी बनाई दुनिया अभी अपूर्ण है; मैं इसमें पुण्य डालना चाहता हूँ; मैं इसमें मुक्ति डालना चाहता हूँ; मैं इसमें धवल श्वेत रंग भरना चाहता हूँ लेकिन तब पुण्य के लिए पाप होना ज़रूरी है, धवल श्वेत रंग के लिए गहन तम का कालापन होना ज़रूरी है; मुक्ति के लिए मूल पाप का होना ज़रूरी है।
तो क्या इस पत्थर से भी विधाता ने प्रार्थना किया था, पतित देवदूत ने स्वयम से प्रश्न किया।

उधर सबसे ऊपर के आकाश में रहनेवाले जगत के सृष्टिकर्ता ने प्रयोगवश अपनी शब्दावली से पतित शब्द को मिटा दिया क्योकि वह देखना चाहता था कि इस शब्द के बगैर मानवता बनी रह सकती है कि नही।

पतित शब्द के मिटते ही विधाता का अस्तित्व भी वाष्पीकृत हो गया!

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【तीन】
अखलाक/ नैतिकता
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मजलिस जमी थी, यह रंको की मशहूर चौपाल थी जहाँ उनके बच्चे रंको की तहजीब सीखते। इस मजलिस के सामने जो ऊँची जगह थी वहाँ रखी तख्ती तब से मौजूद है जब से दुनिया मे बादशाहत कायम हुई। दुनिया मे बादशाहत कायम होने के अगले ही दिन वहाँ पहली मजलिस जमी थी। उस तख्त पर उसी दिन एक पहला नासेह बैठा था जिसने रँको को नैतिकता / अखलाकियत की पहली सबक सिखाई थी। 
तब से आज तक यह रवायत कायम थी। रंको की दुनिया का सबसे उम्दा नासेह उस तख्ती पर बैठता, सामने बच्चे बैठते और अखलाकियत कि सबक चलती।

नासेह ने एक दास्तान के ज़रिए सबक पढ़ना शुरू किया:
"एक क्रूर राजा था
था एक ज़ालिम बादशाह!"

कहते हैं कि करामन और कातिबीन हर जगह मौजूद होते हैं। इंसान के कर्मों का लेखा-जोखा रखने का काम ईश्वर ने दो फ़रिश्तों को दे रखा है। ये फ़रिश्ते इंसान के हर अच्छे-बुरे कर्म को लिखते हैं। इन फ़रिश्तों को करामन-कातिबीन कहा जाता है। ये फ़रिश्ते जिस रजिस्टर में कर्मों को लिखते हैं उसे नामा-ए-आमाल कहा जाता है। 

इस दिन किसी तरह नामा-ए-आमाल करामन कातिबीन के हाथ से फिसलकर नीचे ज़मीन पर गिर पड़ा और किसी ने उसमे लिखी बाते पढ़ लीं। उसमे लिखा था: 
"यह रंको कि कौम के नासेह जो कहते हैं कि एक क्रूर राजा था, एक था ज़ालिम बादशाह, हक़ ये है कि वो बादशाह ज़ालिम हो न हो ये कौम बदअख़लाक़ी ज़रूर है, बिल्कुल बेईमान और भगोड़ी।"
 
आगे एक शेर दर्ज था जिस के नीचे करामन और कातिबीन दोनों के दस्तखत थे---

"तुम भी चाहते तो थे के तेरी ही होती दुनिया
उसकी दुनिया जो हुई, कहते हो ज़ालिम था वो!"
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【चार】
बी ए प्रोफेट ऑनटू दाईसेल्फ

इस समाचार को सुनने के पश्चात की सम्बुद्ध, वह जिन्हें सारे रहस्य ज्ञात हैं, कल इस पगडंडी से गुजरेंगे, सड़क के किनारे अपनी दुकान लगाने वाला चर्मकार खुशी से झूम उठा--
"मेरी अज्ञानता ने मेरी राह रोक रखी है अतः कल महाज्ञानी से रहस्य को जानूँगा", चर्मकार ने इस प्रकार मन मे विचार और निश्चय किया।

अगली सुबह जब सम्बुद्ध जब उस चर्मकार की अस्थाई दुकान के सामने से गुजर रहे थे तब वह अपनी चटाई से लगभग छलांग लगाते हुए सम्बुद्ध के सामने हाथ जोड़े खड़ा हो गया।

हे परमज्ञानी, मैं आपसे एक सत्य, एक रहस्य जानना चाहता हूँ, चर्मकार ने सम्बुद्ध से कांपते हुए कहा।
-मित्र, सत्य ही केवल उत्तर है, कुछ नही बल्कि मात्र सत्य, प्रश्न करो!
-प्रभु, जूतों की कैसे सिलाई करूँ की वह जूते न कभी घिसे, न फटे?
-एक सम्बुद्ध से इस प्रकार के ओछे प्रश्न करने की  तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई!! सम्बुद्ध के अनुयायियों ने उनका अपमान समझते हुए क्रोधित होकर कहा।
-लेकिन प्रभु, मेरे लिए इसी प्रश्न का उत्तर सारे रहस्यों की कुंजी है क्योकि आपके पिता, जो इस राज्य के महाराजधिराज थे, ने मेरे पिता को इसी गलती के लिए सजा दी थी कि मेरे पिता ने उनके लिए जो जूते बनाए वह शाश्वत नही थे, कुछ  दिनों के पश्चात उनकी सिलाई खुल गई और मैं भी उस दण्ड को मैं भोग रहा हूँ तथा मेरी आने वाली पीढियां भी भोगेंगी।

सम्बुद्ध हमेशा की भांति मौन होक र आगे बढ़ गए-अव्यक्तानि;अप्रश्नानि!!
चर्मकार के मन मे एक निश्चय आया: अप्पदीपो भव!!

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【पाँच】

मुक्ति

अपराधी को फाँसी के तख्ते पर ले जाया गया। वहाँ उसके शरीर ने उन स्तम्भो को स्पर्श कर लिया जिनसे वह रस्सी बंधी थी जो थोड़ी ही देर में उसके गले मे पड़ने वाली थी--स्पर्श अत्यंत ठंढा था, बिल्कुल बर्फ सा--मानो समाज ही आज स्वयं सर्द, भावहीन होकर खड़ा हो--आखिर उसे अपने मे से ही किसी को मारना है। 
लेकिन, इस स्पर्श ने अपराधी के अंदर मृत्यु के भय को हिकारत की भावना में तब्दील कर दिया--यह स्पर्श उसके लिए कोई नया नही था--ठंढा और सर्द।
इसमें सर्द और ठंडे स्पर्श में उसने बल्कि समाज के उसके प्रति ठंडे और सर्द भावना को ही महसूस किया और वह तेजी से उस रस्सी के नीचे जाने के लिए छटपटा उठा मानो मृत्यु की गरमाहट का ही उसे वर्षो से इंतज़ार हो और यह गरमाहट ही उसकी मुक्ति हो।

सामने उसकी लाश पड़ी थी, उन्होंने अपने मे से किसी को अपना प्रतिनिधि बनाकर उसके लाश के पास भेजा। प्रतिनिधि ने उसके शरीर को स्पर्श किया--एकदम सर्द और ठंढा, उसके नब्जों को महसूस किया जो शांत पड़े थे।
प्रतिनिधि ने नोट किया-यह अब हमारे जैसा हो चुका है--शांत, सर्द और ठंढा।
फिर उसने इन तीनो शब्दो को मिलाकर एक शब्द अपनी रिपोर्ट में लिखा--अपराधमुक्त, और नीचे अपने दस्तखत कर दिए।

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【छह】

मनुष्य और जीवन

जब तक वह पत्थर रूप था उसे जीने की जरूरत ही नही थी--बस यूँ ही निष्प्राण कही उसे पड़े रहना था--हाँ कभी उसे मनुष्यो की ठोकर सहनी थी, कभी नदियों के साथ बहना था तो कभी हवाएं उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर रख देतीं।
फिर ईश्वर ने उसके अंदर जीवन फूंक दिया। अभी भी हालांकि उसका शरीर था तो पत्थर का ही लेकिन उसके अंदर कुछ नया उतपन्न हुवा जो अब मात्र पत्थर ना था--उसके इस नवीन अंश में कोमलता थी और अब  हवाएं और नदियाँ भी इस बात को जानते थे कि वह अब मात्र पत्थर न था क्योकि वह नदियों और हवाओ से खुद को सींचने लगा था--मनुष्यो ने भी उसके इस बदलाव को देखा और इस बदलाव में उन्हें अपना प्रारंभिक रूप दिखा-मनुष्य यह जान चुके थे कि उनकी अनन्त की यात्रा में उनका सहमार्गी उपस्थित हो चुका है। 

यद्यपि उस पत्थर के अंदर जीवन फुट चुका था तथापि उसका जीना मनुषयो के जीने से अलग था-उस जीवित पत्थर के लिए आज भी महज उसकी प्रवृत्तियां ही सबकुछ थी और वह इनके आगे नही बढ़ पा रहा था। उसके लिए पदत्त संसार ही उसका संसार था जबकि मनुषयो के पास प्रदत्त संसार से एक नवीन संसार का जन्म हो चुका था मानो पत्थर में प्राण वाली घटना उनके संसार के संदर्भ में दुबारा घटी हो।

उस जीवित पत्थर ने और ध्यान से देखा--मनुष्य दिए हुए संसार से अधिक इस नए संसार मे ज्यादा जीते थे--वह प्रवृतियों से आगे बढ़कर मूल्यों में जीने लगे थे।
पत्थर दार्शनिक की भांति गहन चिंतन में डूब गया और कुछ देर बाद उसकी आत्मा में यह प्रकाशित हुवा की वह मात्र जी रहा है जबकि मनुष्य जीवन का अर्थ जानते हैं।

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【सात】

देवता
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प्रोफेसर वृहस्पति सैमुअल अपनी कक्षा में विद्यार्थियों को साहित्य पढा रहे हैं। उन्होंने पुस्तक खोली और आज उन्हें जिस पाठ को पढ़ाना है उसका नाम "देवता" है।
प्रोफेसर सैम्युल का मानना है कि अतीत में मनुष्य पाखंडी थे। एक तरफ तो वह अमर होना चाहते थे लेकिन दूसरी तरफ वो अमरता से डरते थे। अतीत के मनुष्य अपनी कथाओ में, अपने मिथकों में, अपने पुराणों में अमर हुए पात्रों को शापित बना देते थे ज्यों मृत्यु जीवन से बेहतर हो और तभी चाहे वह अश्वत्थामा हो, वांडरिंग ज्यू हो या सलोमी हो, अमरता इनका अभिशाप है। 
प्रोफेसर सैम्युल का यह भी कहना था कि अतीत के मनुष्य मात्र पाखंडी ही नही बल्कि उनके अंदर दोहरा व्यक्तित्व, एक स्प्लिट पर्सनैलिटी थी क्योंकि तब मनुष्य मृत्यु से डरकर अमरत्व की कामना भी करते थे और अमरत्व से डरते भी थे। वह अपने मे से किसी के अमर हो जाने से घबरा भी जाते और कोई अमरता की चाहत न रखे इसके लिए मिथक भी रचते थे। लेकिन फिर वो अमरता की चाह भी रखते। अमरता की उनकी चाहत उनके द्वारा रचित उनके देवताओं में अभिव्यक्त होता था लेकिन विडम्बना की देवता उनमे से नही होता। 
प्रोफेसर ने लेक्चर प्रारम्भ किया:
"हमने जेनेटिक स्तर पर मृत्यु की उसमे मौजूद सूचना को  हमेशा जवान और युवा रहने की सूचना से परिवर्तित कर अतीत के उन मनुष्यो के पाखण्ड को ही मात्र खत्म नही किया बल्कि देवत्व की तरफ एक कदम बढ़ाते हुए एक ऐसे मनुष्य का सृजन कर लिया है जिसका व्यक्तित्व उन अतीत के मानवो की भांति विभक्त नही है।
और हाँ, देवता अपनी प्रजाति नही बढ़ाते, वो स्वयम अमर होते हैं------"

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【आठ】

दानव
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"पर वह अश्वत्थामा की तरह अमर किन्तु मणि विहीन लोग हैं", सामने बैठे उस व्यक्ति ने कहा जो अन्य लोगो को सम्बोधित कर रहा था।
यह अतीत के एक समय की नही बल्कि भविष्य के एक समय की बात है। तब के वैश्विक सरकार की नज़र में ये लोग आतंकवादी है और इसलिए इनको आज सबसे बचकर यह मीटिंग करनी पड़ रही है जिसमे आज कुछ नए रिकरयूट भी शामिल होंगे।

मनुष्य वैज्ञानिक रूप से बहुत-बहुत ही ज्यादा प्रगति कर चुका है। आज किसी की चेतना को डिजिटलाइज कर उसको बायोप्यूटर में फीड कर उसको प्रिजर्व कर देने की बात भी इनके लिए बहुत पुरानी है। अब तो मनुष्य हज़ार -डेढ़ हजार साल से मरता ही नही। मनुष्य अब जीन को पूरी तरह कंट्रोल करना सीख गया है। भोजन भी अब जीवित रहने के लिए कोई करता ही नही, जिव्हा का कार्य अब मात्र कुछ इलेक्ट्रोड्स जोड़ कर स्वाद लेने का है। अपनी प्रजाति को बढाने के लिए सेक्स करने पर रोक लगा दी गई है  और ऐसी एक सरकारी एजेंसी है जो आपको स्टेराइल कर एक कार्ड इशु करती है जिसे रखना आपकी जिम्मेदारी है। हाँ आप मज़े के लिए चाहे जैसे सेक्स करें: रियल, वर्चुवल, कम्प्यूयर प्रोग्राम्ड...इसकी कोई मनाही नही है लेकिन यदि आप अपना स्टेरेलाइज़ेशन नही करवाते तो आप बायो-टेरोरिस्ट हैं और आपको सबसे दुखदाई तरीके से ही नही बल्कि आपके मस्तिष्क में पेन अमलीफिकेशन प्रोग्राम इम्प्लांट करके आपकी दर्द के अहसास को उस अनुपात में बढ़ा दिया जाता है जिस अनुपात का तब के मानक के अनुसार आपने अपराध किया है।

आज से एक लाख वर्ष पूर्व किसी ने यह कल्पना भी नही की थी कि भविष्य में स्वयम को जीवित रखने की प्रवृत्ति और अपनी प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति के मध्य टकराहट होगी लेकिन पिछले पच्चीस हजार वर्षों में यह हुवा है और स्वयम को जीवित रखने वाली प्रवृत्ति जीत गई है।
पूरे विश्व में हालांकि कुछ लोग हैं जो उनके पूर्वजो की अवस्था मे लौट जाने को सही मानते हैं। उनके अनुसार अंततः जीत प्रजाति को जीवित रखने की प्रवृत्ति की होगी और उसके लिए वह संघर्षशील हैं।
सरकार की नज़र में ये बहुत ही खतरनाक
आतंकवादी हैं, बिल्कुल "दानव", इनका सफाया ज़रूरी है।

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【नौ】

मनुष्य

कुछ ज्ञानी उसे अभी भी पत्थर समझते हैं जबकि कुछ ज्ञानी उसे मात्र चेतना जबकि वास्तव में वह चेतन प्राणमय पत्थर है। दूसरे प्रकार के ज्ञानी उसे मात्र चेतन मान कर उसका स्रोत पत्थर और प्राण प्रकिया के बाहर किसी अन्य लोक में ढूंढते है जबकि वह अन्य लोक मैंने रचा ही नही है। जब मैं चेतन कहता हूं तो उसके अंदर प्राणमय पत्थर पूर्व से ही शामिल होता है जिसको यह ज्ञानी देख नही पाते -----अपनी डायरी का यह अंश पढ़कर ईश्वर ने  विचार किया कि क्या एक ऐसा शब्द नही हो सकता जिसके अंदर चेतना, प्राण और पत्थर के साथ  वह स्वयं भी शामिल हो?
लेकिन समस्या यह थी चेतन--प्राणमय--पत्थर की  
 श्रृंखला में खुद को आखिर रखे कहाँ--वह किसका विशेषण बने और विशेषित किससे हो क्योकि वह तो हर जगह विशेषण भी है विशेष्य भी। असल मे उसे ईश्वरमय ईश्वर-ईश्वरमय चेतना-ईश्वरमय प्राण-ईश्वरमय पत्थर--ईश्वरमय ईश्वर जैसा कुछ लिखना पड़ा लेकिन तब भी वह अपने इस लिखे से संतुष्ट नही था। उसकी असंतुष्टि ने तभी आकार ग्रहण किया और उसके सामने उपस्थित हो गई। ईश्वर ने उसे ध्यान से देखा तो यह मनुष्य था--इसके अंदर वह जो लिखना चाहता था वह सब कुछ तो था ही उसकी असंतुष्टि भी थी।

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【दस】

ॐ अपूर्णमद: अपूर्णमिदम

महासागर ने देखा उसमेंमें जल की विशाल राशि है। वह स्वयम भी जल की विशाल राशि ही है क्योकि वास्तव में तो उसमें "में" और है का भेद खत्म है। जलधि, जलनिधि, समुद्र या सागर एक दृष्टि में जल की एक बहुत बड़ी बून्द ही तो है-- बिल्कुल उस छोटी बून्द की तरह जो सामने रेत पर बैठे उस आदमी की उंगलियों पर मौजूद है। महासागर ने स्वयं से प्रश्न किया इस छोटी बून्द और मुझमें में पूर्ण कौन है? 
 उत्तर पाने के लिए महासागर ने पुनः अपनी ओर नजरें दौड़ाईं--वह विराट था, समग्र। उसे गर्व हुवा की उसने असंख्य वैसी छोटी बूंदों को अपने अंदर समेट रखा है लेकिन तत्क्षण वह परेशान हो उठा क्योकि उसे भान हुवा की वह तो छोटी छोटी उन बूंदों से ही मिलकर निर्मित है।

रेत पर बैठा वह आदमी जो अपनी उंगलियों पर बूंदों के साथ खेल रहा था कोई साधारण मानव न था। वह किसी के भी मन की बात पढ़ लेता था। वह सागर के पास गया और उसने सागर को वह बूंदे जो उसकी उंगलियों पर थी सागर को लौटाते हुए कहा--

 तुम दोनों ही अपने आप मे पूर्ण हो: यह छोटी बून्द भी और तुम महासागर भी। तुम जलनिधि जल की छोटी छोटी बूंदों से निर्मित होने के बावजूद, और ये छोटी बूंदे एक विशाल बून्द के टुकड़ों में बट जाने के बाद भी अपने आप मे पूर्ण हैं।

फिर उसने मन मे सोंचा--
महासागर की उस बड़ी बून्द को छोटी छोटी बूंदे बनना पड़ता है यह उसकी मुक्ति है और फिर इन छोटी बूंदों का महासागर बनना इन छोटी बूंदों की मुक्ति। 
मात्र यह बून्द ही बद्ध नही है,  महासागर भी मुक्त नही है क्योकि ये दोनों एक दूसरे के सामने अपूर्ण है।

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【ग्यारह】
हिन्दू-मुसलमान

"ख़ुदा है और क्या इसके सिवा तो कुछ भी नही
 है वो हसरतें, बनी आदम का ही जमते जाना"



खुदा/भगवान आदम की औलादों की हसरतों का ही जम जाना है जी, कही पत्थरो में तो कहीं अल्फाज़ो में:
हसरतें खत्म, खुदा तमाम!

तब हरफ़ बिखरे पड़े थे। अलिफ़ कहीं, लाम कहीं और हे कहीं। किसी ने हरफों को जोड़ दिया, हरफो में उसको बांध दिया। माटी भी बिखरी पड़ी थी, पत्थर भी तब लावारिश थे। किसी दूसरे ने माटी में, पत्थर में उसको गढ़ दिया।

किसी ने हरफों से मूर्ती बनाई तो किसी ने पत्थरो से सिफ़ात!
हिंदुओ में वह पत्थर में जम गया है, मुसलमानों में   निन्यानबे  अल्फाज़ो में -----मकसद एक ही है।

(बनी आदम: आदम की संतानें।)

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