Saturday, July 10, 2021

कांटियन ज्ञानमीमांसा और पोस्टमोडरनिज्म

कांटियन ज्ञानमीमांसा और पोस्टमोडरनिज्म

कांटियन ज्ञानमीमांसा यह निष्कर्ष स्थापित करती है कि हमारी बुद्धि न्युमोना या थिंग-इन-इटसेल्फ या परम सत्ता तक नही पहुँच सकती; इसकी पकड़ मात्र फेनोमेना तक ही है। फेनोमेना वह है जो हमारी चेतना में प्रकाशित होता है। न्युमोना को हमारी चेतना अपने पूर्वनिर्धारित संरचना, नियम और कोटियों के माध्ययम से पकड़ती है जिसके कारण चेतना में जो प्रकाशित होता है वह थिंग इन इटसेल्फ या वस्तुगत सत्ता नही होती बल्कि इसमें व्यक्तिनिष्ठता होती है।
कांट के इस ज्ञानमीमांसिय स्थापना के विरूद्ध यद्यपि प्रतिक्रियाएं हुई और न्यूमोना को अनावश्यक मान कर हीगल ने फेनोमेना को ही अपने "फेनोमेनोलॉजी ऑफ द स्पिरिट" का विषय-वस्तु बनाया तथापि कांटियन स्थापना अपने मूल भाव के साथ आगे के दार्शनिक विचारों को प्रभावित करने वाली थी और  हाइडेगर तथा नीत्शे के दर्शन में बुद्धि सत्ता को जानने और पकड़ने के लिए मनुष्य के अन्य सम्वेदनाओं से कमतर ही नही बल्कि उग्र रूप में यह स्वीकारोक्ति बन जाती है कि मानवीय बुद्धि सत्ता की डिफ़ॉर्मड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर प्रस्तुत करती है। नीत्शे का सुपरमैन इस आशय से बुद्धि का त्याग ही कर देता है और वह यथार्थ को बिना किसी रेशनलाइजेशन, नीत्शे के अनुसार जिसके निमित्त ही बुद्धि है, के स्वीकार करता है। 

पोस्टमोर्डन ने सत्यता और बुद्धि विषयक विचारधारा को, जिसका जन्म कांट की ज्ञानमीमांसा में हुवा था और जिसको नीत्शे एवम हाइडेगर आगे ले जाते है, और आगे ले जाते है जिसके कारण मानवीय बुद्धि में विश्वास, जो कि पुनर्जागरण और आधुनिक दर्शन का केंद्र बिंदु था, दर्शन के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है और
निष्कर्षत: बुद्धि हमे सत्यता दिखाने में समर्थ ही नही है तथा वस्तुगत सत्यता कुछ होती ही नही है, की स्थापना होती है।

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