ज्ञानमीमांसा और मनोविज्ञान
हमारी संवेदनाएं, वाह्य और आंतरिक इंद्रियों के माध्यम से हमारे मनस में उपस्थित होती रहती हैं। इनमें कुछ सम्वेदनाएँ वाह्य होती है और कुछ आंतरिक। पुनः असामान्यता की स्थिति में छद्म सम्वेदनाएँ भी उपस्थित होती हैं जिनकी रचना हमरा मस्तिष्क करता है। सम्भव है कि कुछ सम्वेदनाएँ बिना बुद्धि की पकड़ में आए हमारे मनस में उपस्थित हों यथा यह उन प्राणियों में होता है जिनका मष्तिष्क अभी बुद्धि के लिए बिकसित नही हुवा है। मस्तिष्क के विकास के साथ बुद्धि अस्तित्व में आती है और फिर यह सम्वेदनाओं पर सक्रिय होती है। सम्वेदनाओं पर बुद्धि की सक्रियता के पश्चात या साथ ही मष्तिष्क की कोई और शक्ति भी सक्रिय होती है जो इनकी पहचान करती है। सम्भवतः इसी शक्ति में हमारी भाषा का स्रोत भी उपस्थित है जिसके द्वारा अब इस कोपम्लेक्स को व्यक्त किया जा सकता है।
इस पूरी प्रक्रिया को यदि एक रेखाचित्र के माध्ययम से व्यक्त किया जाय तो यह निम्नवत होंगी-
इस रेखाचित्र से कई सम्भावनाओ को पकड़ा जा सकता है--
एक वाह्य जगत है जिससे हमें उद्दीपन प्राप्त होते है किंतु सारे उद्दीपन संवेदना नही बनते बल्कि इनमें से कुछ उद्दीपनो में ही वह शक्ति होती है जो हमारी ज्ञानेंद्रियों को क्रियारत कर सकता है। वैसे उद्दीपन जिनमे यह शक्ति होती है वही मात्र सम्वेदनाएँ बनती हैं।
हमारा विकास चूंकि वैसे जीवों से होकर हुवा है जिनके पास बुद्धि नही थी और यह सम्वेदनाएँ उन्हें सीधे अनुभूत होती थी अतः हमारी कुछ सम्वेदनाएँ उन पर बिना बुद्धि के क्रियाशील हुए हमारी अनुभति का हिस्सा बन जाती हैं।
दार्शनिक भाषा मे सम्भवतः यही निर्विकल्प प्रत्यक्ष है।
बची हुई सम्वेदनाओं पर बुद्धि क्रियाशील होती हैं और इन्हें नाम, रूप, आकार, जाति आदि कोटिया प्रदान किया जाता है और इसके बाद यह अनुभूति के लिए उपलब्ध होती हैं।
यह भी सम्भव है, जैसा कि मनोरोगों में होता है कि
या तो सम्वेदनाएँ वाह्य और आंतरिक यथार्थ में हो ही नही और तब भी कहीं से उपस्थित हो और इन पर बुद्धि कार्य कर आगे अनुभूति के लिए प्रेषित कर रही हो और उसकी अनुभूति भी हो रही हो (साइकोसिस) या उतनी इंटेंस संवेदना न हो जिस इंटेंसिटी के साथ वह अनुभूत हो रही हो या जिस इंटेंसिटी के साथ संवेदना उपस्थित है वह उस इंटेंसिटी के साथ अनुभूत न हो रही हों।
पुनः यह भी सम्भव है कि वाह्य या आंतरिक वस्तु या घटना से जो संवेदनों का प्रवाह प्राप्त हो रहा है वह व्यक्ति विशेष के संदर्भ में औसत से इस मामले में विचलित हो गया हो कि कहा और किस क्षण तक वह सीधे अनुभूत हो रही है और कहा और किस क्षण और स्तर तक उनपर बुद्धि क्रियाशील होकर उसे आगे अनुभूति के लिए प्रेषित कर रही है।
ऐसे में यदि एक आदमी सबको (औसत की दृष्टि से) आदमी दिखता हो तो सम्भवतः उपरोक्त इस असामान्य प्रकिया के कारण उस आदमी की ट्विस्टेड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर इस असामान्य व्यक्ति को मिल रही हो। (चित्र)
असामान्यता की स्थिति में यह भी सम्भव है कि सम्वेदनाओं पर बुद्धि सक्रिय ही न हो पा रही हो या कम सक्रिय होती हो जो किसी घटना विशेष के संदर्भ में भी हो सकता है या व्यक्ति के साथ यह हमेशा की बात हो यथा एक मंदबुद्धि।
बोध/अनुभूति के समरूप और बराबर भाषिक रूप हो भी सकता है और नही भी हो सकता। जब यह भाषिक रूप बोध/अनुभूति के बराबर नही होता तो इसे भाषा व्यक्त नही कर पाती या यदि करती है तो भाषा के सर्वमान्य नियम टूटने लगते हैं और शब्द अर्थ से परे जाने लगते हैं यथा रहस्यवादी अनुभव का वर्णन।
ज्ञानमीमांसा ज्ञान विषयक अध्ययन है जिसमे ज्ञान के सम्प्रत्यय, ज्ञान के स्रोत, ज्ञान की कसौटियां, इसकी सीमाएं आदि का अध्ययन होता है। जिस ज्ञान, जिस बोध को भाषा मे व्यक्त ही न किया जा सके उसका अध्ययन करना लगभग असंभव है अतः रहस्यात्मक ज्ञान ज्ञाननमीमांसा का विषय नही बनता। पुनः ज्ञानमीमांसा का विषय मनुष्येतर प्राणियों का ज्ञान(?) या वह ज्ञान (?) जिसमे संवेदना और बुद्धि या इनमें से कोई एक सांख्यकीय दृष्टि से विचलित हो अथवा कोई ऐसा ज्ञान जिसके विषय मे यह दावा किया गया हो कि इसमें कोई संवेदना उपस्थित नही है या यह इन सारी प्रक्रियाओं से हटकर आई है, नही है।
अतः ज्ञानमीमांसा के अंतर्गत जो ज्ञान है वह संवेदना-बुद्धि--भाषा, इन तीन तंतुओं से बनी रस्सी है।
बुद्धि संवेदना से विशिष्ट है क्योकि यह चेतना के विकास क्रम में दूसरे स्तर पर इमर्ज होती है (प्रथम स्तर पर संवेदना और तृतीय स्तर पर भाषा इमर्ज होती है) को इनपुट चाहिए-यह इनपुट उसे संवेदनों से भी मिल सकता है , स्वयम बुद्धि से भी और यह स्वयं से मिले प्रदत्तो पर भी क्रियाशील होकर उन्हें भाषिक रूपों में परिवर्तित कर उन्हें ज्ञान बना सकती है।
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