Sunday, July 11, 2021

उत्तरआधुनिकता

कांट--मानवीय बुद्धि सत्य तक पहुंचाने में  असमर्थ है।
हीगल--सत्य बौद्धिक है साथ ही यह स्वयम को व्यघातो के द्वारा प्रस्तुत करता है।
मार्क्स: यद्द्यपि सत्य स्वयम को व्याघातो द्वारा प्रस्तुत करता है यह अपने अंतिम स्वरूप में भौतिक है।

लेकिन आगे दर्शन का विकास उपरोक्त की भांति लीनियर या रैखिक नही हुवा। आगे दर्शन की कई धाराओं में एक धारा यह आई जिसमे उसने कांट और हीगल का संश्लेषण प्रस्तुत किया जिसके अनुसार यथार्थ को मानवीय बुद्धि नही पकड़ सकती साथ ही सत्य द्वन्दों और कन्फ्लिक्टस से भरा हुआ है।
मार्क्स के लिए यद्द्यपि सत्य द्वंद और संघर्षों से भरा हुआ है तथापि वह मानवीय बुद्धि का विषय है और इस अर्थ में मार्क्स भी पुनर्जागरण के दार्शनिक कहे जा सकते है किंतु जर्मनी में दर्शन की एक और धारा भी पनप रही थी जिसका चरित्र पुनर्जागरण की भावना के विरुद्ध था।

इस प्रतिपुनर्जागरण की मूल स्थानपा इस बात के इर्द-गिर्द होने वाली थी कि मानवीय बुद्धि सत्यता को समझने में असमर्थ है। प्रोफेसर स्टीफेन हिक्स इसे ज्ञानमीमांसा की असफलता कहते है जिसके बीज कांट के क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन में उपस्थित थे जिसको हीगल के व्यघाती सत्य की संकल्पना के साथ आगे संश्लेषित किया जाना था।
कालांतर में यह व्यघाती सत्य जीवन मे उपस्थित संघर्ष और कनफ्लिक्ट बन गया और मानवीय बुद्धि को तो इस प्रति-पुनर्जागरण के चिन्तनों के उग्र रूप में सत्य को समझने की राह में व्यवधान की तरह देखा गया। 

यद्यपि जर्मनी से निकली प्रति पुनर्जागरण  की धारा अपनी दिशा में नीत्शे, हाइडेगर और हुसर्ल आदि के दर्शन में फल फूल रही थी तथापि पाश्यात्य जगत में दर्शन की एक धारा थी जिसने पुनर्जागरण की मानवीय बुद्धि में विश्वास को जीवित रखा था। यह धारा एंग्लो-अमेरिकन परम्परा की धारा थी लेकिन इनके हाथों में दर्शन का स्वरूप अब वह नही रह गया जो आज तक दर्शन के स्वरूप के विषय मे पाश्चात्य जगत की परपरा थी। इस एंग्लो-अमेरिकन परम्परा के यह निष्कर्ष थे कि तत्त्वमिमनासा के कथन ही निर्रथक है अतएव अब अपनी भूमिका में दर्शन को विज्ञान का सबऑर्डिनेट बन जाना चाहिए तथा इसका काम किसी प्रकार का संश्लेषण नही वरन विश्लेषण होना चाहिए। इस धारा ने भाषा, चिन्हों, संकल्पनाओं का विश्लेषण प्रारम्भ कर दिया लेकिन तब तक ऊपर वर्णित विचारधारा स्वयम को स्थापित कर चुकी थी अतः दर्शन की इस विचारधारा और उस विचारधारा के मध्य एक खाई पैदा हो गई।
दर्शन के इतिहासकार इस घटना को एनालिटिकल-कॉन्टिनेंटल स्पिल्ट कहते है। 

मजेदार बात यह है कि प्रति-पुनर्जागरण जे  उत्तरआधुनिक दर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फला फुला जबकि उनकी धारा तो विश्लेषणात्मक थी। इसका कारण यह है कि विश्लेषणात्मक दर्शन  ने विकसित होकर इस तथ्य को उदघाटित किया कि भाषा अपने से इतर किसी के बारे में नही बता सकती अतः किसी वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करना बेमानी है। हिक्स लिखते है कि जो बात कांट ने लगभग 200 वर्षो पूर्व की थी वही बात अब विश्लेषणात्मक दार्शनिक कर रहे थे और इसका प्रभाव यह हुवा की अमेरिकन विश्वविद्यालय नीत्शे और हाइडेगर आदि की तरफ झुकते चले गए।

अब समग्र पाश्चात्य जगत में वस्तुगत सत्यता एक मिथक था तथा बुद्धि भी उतनी बौद्धिक नही थी---इस स्थापना के साथ ही आधुनिक युग का अंत हो चुका था और हम उत्तरआधुनिक युग मे प्रवेश कर चुके थे।

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