नौलेज इज़ पावर--मिशेल फूको को पढ़ने के बाद स्पष्ट हो गया कि पूर्वाधुनिक काल की प्रवृतियां आधुनिक काल मे भी नही बदली और वास्तव में पुनर्जागरण का वह उद्देश्य की ज्ञान से मानव को उसके अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करना है--वही, नए कलेवर में, ऋग्वेद के तमसो मा ज्योतिर्गमय पुनः प्रभुता (डोमिनेन्स) का एक हथियार ही बन गया और मार्क्सवादी विमर्शों की पूर्व आधुनिक काल का बाइनरी 'विप्र और शूद्र' आधुनिक काल मे एक नए शरीर के साथ उपस्थित हो जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयम मार्क्सवादी के पास इनको या तो देखने और महसूस करने की दृष्टि नही है या वो जानबूझ कर इनकी अनदेखी करते हैं।
सम्भवतः इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद संरचनावाद के इर्द गिर्द बुना गया विमर्श और चिंतन है। इसकी जगत और मानवीय दशा की व्याख्या में अर्थव्यवस्था आधार रूप में उपस्थित है लेकिन अब हम इतिहास के उत्तरआधुनिक युग मे पहुंच गए है और इस युग की चेनता ने हमे दिखाया है कि सतह के नीचे कोई स्ट्रक्चर या आधार नही है।
दो बिम्ब--सतही और आधार की थ्योरी खत्म हो रही है। सतही और सामान्य अनुभव के पीछे कुछ है यथा इंद्रधनुष। इंद्रधनुष सतही बिम्ब है तथा इसका एक वैज्ञानिक विम्ब भी है जिसे 'आधार बिम्ब' कहा जाता रहा है, परन्तु यह आधार-बिम्ब भी अपने आप मे और जाननेवाले से इस प्रकार उलझा हुवा है कि अब विज्ञान और फिक्शन का अंतर मिटता प्रतीत हो रहा है।
आधुनिकता के पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसने मनुष्य को केंद्र में स्थापित कर एक संरचना विकसित की थी। आधुनिकता के पास अपने आधुनिक मूल्य थे लेकिन उसके गर्भ में ही कुछ ऐसा भी पल रहा था जिसने उसे आगे अप्रसांगिक कर दिया और आधुनिकता की आशा को ही अब संशय से देखा जाने लगा। आधुनिकता ने जो संरचना बनाई थी, जो उद्देश्य बनाए थे, जो मूल्य रचे थे उसका क्षरण आरंभ हो गया। आधुनिकता इस क्षरण को त्रासदी के रूप में देखती है लेकिन उत्तरआधुनिकता का तो जन्म ही इसी में हुवा है अतः वह इस क्षरण को एन्जॉय करती है।
देज़ा वू!! आधुनिकता का जन्म भी तो पूर्वआधुनिकता के क्षरण में हुवा था। उसने भी तो ईश्वर का मजाक उड़ाया था। उत्तरआधुनिकता का जन्म भी आधुनिकता के क्षरण में हो रहा है और वह अब आधुनिकता के केंद्र वाले मनुष्य को चिढ़ा रही है।
No comments:
Post a Comment