ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति।
मुझे मालूम है कि एक न्युमोनल यथार्थ है और एक फिनोमेनल यथार्थ है। न्यूमोनल यथार्थ के पार और परे कोई यथार्थ है या नही यह मुझे नही मालूम लेकिन फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक नया यथार्थ रचने की कोशिश हमेशा से मेरे पूर्वजो ने की है, और उन्होंने फेनोमेनल यथार्थ के अंदर एक यथार्थ की रचना करने का सतत प्रयास फेनोमेनल यथार्थ की नग्न सच्चाइयों से बचने के लिए किया है। फेनोमेनल यथार्थ बहुत ही कुरूप है। इससे संयुक्त होकर मेरे पूर्वज वेदना और पीड़ा से ग्रस्त हो गए। इस कुरूपता को उन्होंने अपनी कविताओं और चित्रों से ढकने का प्रयास किया ताकि उनकी पीड़ा कुछ कम हो सके किन्तु ऐसा नही हुवा। मेरे पूर्वजो ने फिनोमेनल यथार्थ की कुरूपता से बचने के लिए न्युमोनल यथार्थ को भी पकड़ने की कोशिश की और ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का गीत गाया किन्तु सच यह है कि यह न्यूमोना उनकी पकड़ में कभी आया ही नही और वो फेनोमेना की कुरूपता और वहाँ उपस्थित वेदना से तिल तिल कर मरते रहे।
मैं फेनोमेनल यथार्थ में एक वैज्ञानिक हूँ अतः मैंने इसकी कमियों को, इसकी कुरूपता को काव्य और पुराणों से ढकने के बजाय एक हाईपररियलिटी की रचना कर डाली और इसको मेरे सामने खड़े लोगो की सामूहिक चेतना से जोड़ डाला। मैं इसे प्रकृति से संस्कृति की ओर वास्तविक संक्रमण कहता हूँ और देखिए इन लोगो को ये कितने खुश हैं--यह जो दौड़ रहा है वह फेनोमेना में हाथ-पैर से अपाहिज बिस्तर पर पड़ा हुवा है-- एक दुर्घटना ने इसके हाथों और पैरों को छीन लिया। यह जो दूसरा सबको उपदेश दे रहा है वह भी फेनोमेना में एक बिस्तर पर बेहोश पड़ा हुवा है। यह वहां एक अपराधी था और इसे फांसी की सजा दी गई थी लेकिन फांसी के रस्सियों ने इसे मारा नही बल्कि इसके मस्तिष्क को क्षतिग्रस्त कर दिया और इसे हमेशा के लिए बेहोश कर दिया। फेनोमेना में अभी इसको लेकर तर्क वितर्क चल रहे है कि इसके होश में आने पर इसे पुनः फाँसी देनी चाहिए या इसकी सजा पूरी मानकर इसे मुक्त कर देना चाहिए।
ईश्वर है या नही मैं नही जानता और मनुष्य न्युमोना को जानकर ईश्वरतुल्य हो जाता है या नही यह भी मैं नही जानता क्योकि ईश्वर यदि हो भी तो उसने न्युमोनल यथार्थ के बारे में फिनोमेनल यथार्थ के मनुषयो को कुछ नही बताया लेकिन मैंने इन सबको यह बता दिया है कि वो एक सिम्युलेशन में हैं और फेनोमेनल यथार्थ में वो बिस्तर पर पड़े घुट रहे हैं। अब जब उनसे फेनोमेनल वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करने की कोशिश करता हूँ तो वह मुझसे ही पूछते है कि उन्हें उस वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में क्यो जानना चाहिए। फिर वो आगे कहते है कि फेनोमेना में मनुष्य की धारणा थी कि उन्हें वस्तुनिष्ठ यथार्थ को इसलिए जानना चाहिए कि वो अपने पीड़ा को उतपन्न करने वाली परिस्थितियों को बदल सके लेकिन इस हाइपररियल्टी में तो उन्हें कोई पीड़ा ही नही है अतः उनके लिए ब्रह्मविदम ब्रह्मैव भवति का कोई मतलब नही।
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