Sunday, July 4, 2021

विद्रोही


विद्रोही

विद्रोही ने दो बार यमदूतों को मारने की कोशिश की थी हालांकि दोनों ही बार वह असफल हुवा।  तीसरी बार जब वह उनको मारने की योजना बना रहा था तब यमराज के क्रूर यमदूतों ने उसे गिरफ्तार कर लिया और बेड़ियों में जकड़ कर यमराज के पास ले गए। यद्यपि वह उन क्रूर यमदूतों द्वारा पकड़े जाने से बचने के लिए आत्महत्या कर  सकता था लेकिन उसने उनके द्वारा खुद को पकड़ लिए जाने के विकल्प को चुना क्योंकि कोई तीसरा विकल्प नही था।

यम-दरबार मे मुकदमा चला और यमराज ने उसके सामने दो विकल्प रखे--या तो वह यम-सत्ता के साथ हो जाए या सजा स्वीकार करे। 
विद्रोही को यम की सत्ता के साथ हो जाना भी उसका आत्महत्या ही लगा, एक दार्शनिक आत्महत्या। अतः यहाँ भी उसने सजा का विकल्प चुना।
सजा देने के लिए यमराज ने उसे नीचे धर्मराज के पास भेज दिया।
विद्रोही को तब तक कोड़े मारने की सजा सुनाई गई जब तक वह मर न जाए लेकिन उसे यह बात न बताई गई या उसने यह नही सुना या सम्भवतः उसने सुन कर भी अनसुना कर दिया।

अगले दिन उसे खुले मैदान में लाया गया और उस मैदान के बीचों बीच वाले खंभे से उसका मुंह और पेट सटाकर बांध दिया गया। कमर तक उसके कपड़े उतार दिए गए ताकि उसकी नंगी पीठ जल्लाद के सामने हो।

धर्मराज के जल्लाद ने कोड़े लगाने शुरू किए--सौ- दोसौ कोड़ो तक विद्रोही  के लिए सब कुछ सामान्य रहा: विद्रोही कोड़ो से उठे दर्द को अपने दांतों से दबा लेता तथा जल्लाद और अधिक वेग से उसकी पीठ पर कोड़े बरसाता। लेकिन इसके बाद वह टूटने लगा था: विद्रोही के मुँह से चीख भी निकलती और जल्लाद के कोड़े लगाने का वेग भी बढ़ता  जाता।
लेकिन, केवल यही बात न थी--विद्रोही के अंदर कुछ और भी घट रहा था--विद्रोही के मन और शरीर को दो कोड़ो के बीच के अंतराल को महसूस करने लगे थे। धीरे धीरे उसके मन और शरीर ने उन अंतरालों को पकड़ना भी सिख लिया और और फिर मात्र पकड़ा ही नही बल्कि उन्हें जकड़ने और अपने पास उन अंतरालो को हमेशा रखने के लिए प्रयास भी करने लगे; उसके मन ने दो कोड़ो के अंतराल के उसके समय-बोध को बदल दिया; उसके लिए उसके मन ने इन अंतरालों में समय की चाल को अत्यंत धीमा कर दिया। इन अंतरालों में उसके मन और शरीर खुश हो जाते, उन्हें जीवन अच्छा लगने लगता, फिर से कुछ नए स्वप्न सृजित हो जाते लेकिन तभी कोड़े का पीठ से स्पर्श.... और सारे स्वप्न, खुशी पानी के बुलबुले की तरह फूट जाते। बहुत देर तक यही चला परन्तु धीरे धीरे अब कोड़े के दर्द के अंदर यह आशा भी पनप जाती की इसके बाद एक अंतराल है जिसमे पीड़ा नही होगी। हर दर्द के साथ ही पैदा हो जाने वाली इस आशा ने उसके पीड़ा को भी कम कर दिया और उसकी चीखों की तीव्रता भी थोड़ी कम हो गई---वह विद्रोही था--जीवन विद्रोही, क्योकि जीवन ही विद्रोह है।
वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी--!

लेकिन, यह अर्धसत्य है!!
जीवन निश्चितरूप से विद्रोह है लेकिन दार्शनिक ने उस विद्रोही को सम्पूर्णता में न देखा था तथापि यह कह डाला था 'वन मस्ट इमेजिन द रेबेल हैपी'। यह सच है कि पीड़ा ने विद्रोही के सामने उसके अस्तित्व के नए आयामो को खोल दिया था तथा उसे दो कोड़ो के बीच के अंतराल को  पकड़ना आ गया था। इस अंतराल में समय-बोध को उसने काफी धीमा करना भी सीख लिया था और इन अंतरालों में उसके अंदर से स्वप्न भी फूट पड़ते जो आगे भले ही कोड़ो से उपजे दर्द में चकनाचूर हो जाते।
कोड़े के साथ उठने वाली पीड़ा में आशा का जन्म भी वास्तविक थी, लेकिन मात्र इन चीजों के देखकर जब दार्शनिक ने उसे जीवन-विद्रोही कह दिया था, वह गलत था। वह गलत था, क्योकि विद्रोही के अस्तित्व की गहराई में घटी उसकी अतार्किक, आस्था की छलांग को दार्शनिक देख ही नही पाया था। दार्शनिक यह भी नही देख पाया था कि विद्रोही के अस्तित्व में सपने दरअसल उसकी आस्था के छलांग के बाद से आते थे और उनके स्रोत वहीं अवस्थित थे जहाँ विद्रोही का अस्तित्व छलांग लगा कर पहुंचा था।
यहाँ पहुंच कर विद्रोही ने अपने व्यक्तिनिष्ठ तत्त्वमीमांसा की रचना कर डाली जिसमे वह मुक्त था ;उसके पास सारी स्वतंत्रता थी; यहाँ उसकी सारी पीड़ा मिट जाती।
उसे यह मुक्ति अच्छी लगी अतः हर बार वह उन अंतरालों में अपनी इस तत्त्वमीमांसा का लेप इस स्थान से दोनों मुट्ठियों में उठाता और वहां अपने बंधे शरीर पर लेप आता--विद्रोह!

यद्यपि भविष्य में मनोवैज्ञानिक यह लिखने वाले थे कि असल मे उसका मस्तिष्क उसे धोखा दे रहा था ताकि उसकी पीड़ा की तीव्रता उसके लिए कम हो सके तथापि उसके लिए उसकी निजी तत्त्वमीमांसा असली थी जो उसके अस्तित्व ने छलांग लगाकर शून्य से रची थी। यह कोई दार्शनिक आत्महत्या भी नही थी क्योकि जीवन का स्वभाव ही यही है: दरअसल  हर विद्रोह के पीछे आस्था है, विद्रोह का बीज विश्वास की जमीन पर ही पनप सकता है, चाहे वह जीवन-विद्रोह ही सही।

पोस्ट स्क्रिप्ट: माताजी का कैंसर के कारण लंबी बीमारी से देहांत हुवा। उन्हें असहनीय पीड़ा उठती थी लेकिन पीड़ाओं के बीच के अंतरालों को वह जीती थी, उन पीड़ाओं के बीच उठने वाले अंतरालों में उनके पास स्वप्न होते थे, आशाएँ होती थीं।


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(कामू के सिसिफस के मिथ और माताजी की पीड़ा से  प्रेरित)

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