रहस्यानुभूति १
मुझे अपने जन्म का अनुभव नही है, शायद किसी को उसके जन्म का अनुभव नही है क्योकि तब मेरी चेतना उतनी विकसित नही थी पुनः मैं अपने मृत्यु के अनुभवों को साझा करने के लिए भी उपस्थित नही रहूंगा, कोई नही रहता तो इसका क्या यह अर्थ ले लिया जाय कि जन्म और मृत्यु के समय कोई अनुभव होते ही नही?
यद्यपि इन अनुभवों के न्यूरल कोरिलेट्स ढूंढ लिए जाएं और उनको कोई बहुत ही एडवांस मशीन मेरे लिए रिप्रोड्यूस भी कर के इनकी अनुभूति मेरे लिए उपलब्ध करा दे तथापि क्या दूसरा कोई मेरी अनुभूति को अनुभूत कर सकता है?
सम्भवतः नही, मनस दर्शन में इसे क्वालिया कहा जाता है और इसकी व्यक्तिनिष्ठता से सम्बंधित क्यों और कैसे को डेविड चालमर हार्ड प्रॉब्लम ऑफ द कौंससनेस कहते है।
साधारण उदाहरण से समझना हो तो क्या आप मेरे सामने रखे लाल रंग के मेरे अनुभव को समझ सकते हैं? मेरे अनुभव मेरे नितांत निजी अनुभव हैं इनको उसी रूप में पूर्णता के साथ न तो आप समझ सकते हैं और न ही मैं इंनको व्यक्त कर सकता हूँ और इसका कारण यह है कि हमारी भाषा असीम रूप से सामर्थ्यवान नही है, इसकी अपनी सीमाएं हैं। और चुकी इसकी अपनी सीमाएं है अतः जगत में हमे केवल अभिव्यक्त होने वाली सत्ताएं और घटनाएं ही नही मिलती बल्कि वैसी सत्ताएं भी हैं जिनको अभिव्यक्त नही किया जा सकता।
पुनः हमारी भाषा मात्र चेतना की सामान्य दशा में हमारे लिए उपलब्ध अनुभवों के परित: ही विकसित हुई है अतः चेतना के अल्टर्ड स्टेट में अभव्यक्ति भाषा के नियम और शब्दावलियों से पार चले जाते हैं साथ ही हमारी भाषा चेतना की एक सामान्य दशा में भी एक निश्चित स्पेक्ट्रम तक ही अपने कार्य को करने में समर्थवान है। इस रेंज से निचे और ऊपर के हमारे अनुभवों का भी हमारी भाषा साथ नही दे पाती।
रहस्यानुभूति ऐसी ही परिघटना है जिसको यदि अभिव्यक्त करें तो भाषा टूट जाती है, शब्द अपने से परे अर्थ देने लगते है, अनुभूति करने वाला उलटबांसियों और व्याघातों में बात करने लगता है।
ज्ञान भाषा से घनिष्ठ सम्बन्ध रखता है क्योकि हम जिस न्यायोचित सत्य विश्वास को ज्ञान कहते है वह कॉन्सेप्चुवल होता है और कोई भी कॉन्सेप्ट शब्द और भाषा के उस नियम के पालन के बगैर,जिससे दुसरो को भी सहमति है, व्यक्त नही किया जा सकता। इन कॉन्सेप्ट्स की संरचना, अमूर्तीकर्ण और नामकरण मनुष्य की विचारशीलता पर आधारित है और विचार स्वयम अभव्यक्ति के लिए भाषा पर अतएव, रहस्यानुभूति जो कि अत्यंत निजी घटना है, इसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन बहुत ही कठिन है तथापि इसका विविध दृष्टिकोणों से अध्ययन करने का प्रयास किया गया है।
रहस्यानुभूति २
बेली लिखते हैं कि जिन्हें इस "उपस्थिति" का साक्षात्कार हुवा है उनके लिए तर्क अनावशयक है और जिन्हें इस उवस्थिति का साक्षात्कार नही हुवा है उनके लिए तर्क बेकार है।
रुडोल्फ ओटो का कहना है कि रहस्यवादी अनुभूति अनूठी और अनुपम है। यह अनुभति सभी धार्मिक अनुभूतियों की सतह पर विद्यमान है तथा यह इतनी प्राइमरी और एलिमेंट्री है कि इसे किसी भी अनुभूति अथवा कॉन्सेप्ट के आधार पर स्पष्ट नही किया जा सकता। यह स्वजातीय और स्वर्गीय अथवा सुई जेनेसिस है अर्थात भाषा में अभिव्यक्त होने के बुद्धि की आवश्यक प्रक्रिया इसका वर्गीकरण, अमूर्तकरण, नामकरण आदि नही कर पाती।
प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति निर्विकल्प प्रत्यक्ष के पूर्व की भी घटना है और इस कारण यह अयोक्तिक, सरलतम और अभेदित है और इसी कारण यह हमारी भाषा का विषय नही बन पाती।
फर्नांड दी सुसुर, लिंग्विस्ट, के अनुसार हमारी भाषा भेदों की उपस्थिति के आधार पर काम करती है।
जेम्स के अनुसार रहस्यानुभूति के चार प्रमुख लक्षण है-अनिवर्चनीयता, प्रज्ञानात्मकता का एक अंश, क्षणभंगुरता और शिथिलता।
प्रतीत होता है कि रहस्यानुभूति चेतना की वह सरलतम और अभेदित अवस्था है जिसमे संज्ञानत्मकता और भावात्मकता दोनों ही अपने आरंभिक रूप में गूंथे होते है और आगे चलकर हमारा मस्तिष्क या मन या बुद्धि या स्वयम इस चेतना में अन्य जटिलताएँ जुड़कर और डिफ्रेंशिएट या विभेदित होकर स्पष्ट भावना और हमारे सहज बोध का निर्माण करती है।
रहस्यानुभूति ३
समाधि
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सम्भव है जब तक ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत बना रहे यह अविद्या है। अविद्या के नष्ट होने पर यह द्वैत तिरोहित हो जाता हो।
हमारा ज्ञान हमारे जीवन, हमारी प्रजाति के जीवन के बने रहने की प्रवृत्ति से कंडिशन्ड है।
पता नही हम इस कंडिशनिग को तोड़ सकते हैं या नही, शायद तोड़ सकते हों, शायद मिनिमाइज कर सकते हों और वही समाधि की अवस्था हो और तब जो ज्ञान होगा, जो प्रज्ञा जागेगी वह न्यूनतम प्रतिबंधित, न्यूनतम कंडिशन्ड हो।
इस प्रज्ञा में सम्भव है कि जगत का नानात्व, ज्ञाता और ज्ञेय का द्वैत मिट जाता हो और इस दृष्टि में परमार्थ दिखता हो जिसमें "अयमात्मा ब्रह्म"और इस बोध को प्राप्त व्यक्ति फिर तो व्यवहार में यही कहेगा: नेति, नेति!
शायद वह प्रकिया विकास को उलट कर, जीवन के पहले को महसूस करने की है तभी यह कंडिशनिग जाएगी।
एक प्रयोग किया, मष्तिष्क को विचार शून्य करने का प्रयास किया। यदि यह अवस्था पा लेता हूँ तो विकास को पीछे ले जाकर उस अवस्था के बोध में शायद पहुंच जाऊंगा जब विचार नही हैं, केवल सम्वेदनाएँ है: एक जानवर के मस्तिष्क की अवस्था (जानवर हमसे कम कंडिशन्ड हैं)। फिर और पीछे, फिर और पीछे---------और तब शायद समाधि।
कुंडलिनी जगाने/समाधि का मतलब कहीं जीवन जिस प्रारंभिक कंडीशन से शर्तबद्ध है उसको भी सचेतन पार कर जाना तो नही?
रहस्यानुभूति ४
जीवन की उत्तपति से पहले अजीवन था अथवा ब्रह्मांड की उतपत्ति बिग बैंग में होती है अथवा जगत में दो चीजें होती हैं -उतपत्ति और नाश अथवा जगत और हमारे खुद के विषय मे हमरा जो भी अनुभव है और इन अनुभवों के लिए जो भी समीकरण हैं वह वस्तुनिष्ठ रूप से (बल्कि सत्तात्मक रूप से कहना ज्यादा उचित होगा) कितने वस्तुनिष्ठ हैं या वह जीवन के आधार रूप के ऊपर इमर्ज जीवितों की चेतना के स्वरूप का किसी उपस्थिति या सत्ता पर आरोपण है यह हम नही कह सकते।
सम्भवतः उतपत्ति, विनाश, जीवन, अजीवन आदि कोटिया हमारी चेतना की रचना हो और यह रचना हमारे जीवन (जीवित रहने नही) की शर्त से बंधा हो लेकिन कोई तरीका भी उपस्थित हो के हम शर्त को हटाकर भी कुछ देख सकते हैं और समाधि, रहस्यानुभूति वही हो।
कब, कहाँ, क्यों, कैसे, कितना इन्ही प्रश्नों का उत्तर ही तो विज्ञान भी हमे देता है न लेकिन सत्ता, अस्तित्व या उपस्थिति मात्र इन्ही प्रश्नों के उत्तर से बना है यह कहना ठीक नही होगा; ये प्रश्न या भाव हमे जीवित रखने में तो सहायक होते हैं किंतु सत्ता सम्भवतः इनके पार रहती है।
दुर्योधन कृष्ण को कब क्या क्यो कैसे कितना की कड़ियों से बने बेड़ियों से बांध लेगा?
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