पोस्टमोडरनिज्म
एक:
कांटियन ज्ञानमीमांसा यह निष्कर्ष स्थापित करती है कि हमारी बुद्धि न्युमोना या थिंग-इन-इटसेल्फ या परम सत्ता तक नही पहुँच सकती; इसकी पकड़ मात्र फेनोमेना तक ही है। फेनोमेना वह है जो हमारी चेतना में प्रकाशित होता है। न्युमोना को हमारी चेतना अपने पूर्वनिर्धारित संरचना, नियम और कोटियों के माध्ययम से पकड़ती है जिसके कारण चेतना में जो प्रकाशित होता है वह थिंग इन इटसेल्फ या वस्तुगत सत्ता नही होती बल्कि इसमें व्यक्तिनिष्ठता होती है।
कांट के इस ज्ञानमीमांसिय स्थापना के विरूद्ध यद्यपि प्रतिक्रियाएं हुई और न्यूमोना को अनावश्यक मान कर हीगल ने फेनोमेना को ही अपने "फेनोमेनोलॉजी ऑफ द स्पिरिट" का विषय-वस्तु बनाया तथापि कांटियन स्थापना अपने मूल भाव के साथ आगे के दार्शनिक विचारों को प्रभावित करने वाली थी और हाइडेगर तथा नीत्शे के दर्शन में बुद्धि सत्ता को जानने और पकड़ने के लिए मनुष्य के अन्य सम्वेदनाओं से कमतर ही नही बल्कि उग्र रूप में यह स्वीकारोक्ति बन जाती है कि मानवीय बुद्धि सत्ता की डिफ़ॉर्मड और डिस्टॉर्टेड तस्वीर प्रस्तुत करती है। नीत्शे का सुपरमैन इस आशय से बुद्धि का त्याग ही कर देता है और वह यथार्थ को बिना किसी रेशनलाइजेशन, नीत्शे के अनुसार जिसके निमित्त ही बुद्धि है, के स्वीकार करता है।
पोस्टमोर्डन चिंतन, सत्यता और बुद्धि विषयक विचारधारा को, जिसका जन्म कांट की ज्ञानमीमांसा में हुवा था और जिसको नीत्शे एवम हाइडेगर आगे ले जाते है, को और आगे ले जाते है जिसके कारण मानवीय बुद्धि में विश्वास, जो कि पुनर्जागरण और आधुनिक दर्शन का केंद्र बिंदु था, दर्शन के केंद्र से बाहर कर दिया जाता है और
निष्कर्षत: बुद्धि हमे सत्यता दिखाने में समर्थ ही नही है तथा वस्तुगत सत्यता कुछ होती ही नही है, की स्थापना होती है।
कांट--मानवीय बुद्धि सत्य तक पहुंचाने में असमर्थ है।
हीगल--सत्य बौद्धिक है साथ ही यह स्वयम को व्यघातो के द्वारा प्रस्तुत करता है।
मार्क्स: यद्द्यपि सत्य स्वयम को व्याघातो द्वारा प्रस्तुत करता है यह अपने अंतिम स्वरूप में भौतिक है।
लेकिन आगे दर्शन का विकास उपरोक्त की भांति लीनियर या रैखिक नही हुवा। आगे दर्शन की कई धाराओं में एक धारा यह आई जिसमे उसने कांट और हीगल का संश्लेषण प्रस्तुत किया जिसके अनुसार यथार्थ को मानवीय बुद्धि नही पकड़ सकती साथ ही सत्य द्वन्दों और कन्फ्लिक्टस से भरा हुआ है।
मार्क्स के लिए यद्द्यपि सत्य द्वंद और संघर्षों से भरा हुआ है तथापि वह मानवीय बुद्धि का विषय है और इस अर्थ में मार्क्स भी पुनर्जागरण के दार्शनिक कहे जा सकते है किंतु जर्मनी में दर्शन की एक और धारा भी पनप रही थी जिसका चरित्र पुनर्जागरण की भावना के विरुद्ध था।
इस प्रतिपुनर्जागरण की मूल स्थानपा इस बात के इर्द-गिर्द होने वाली थी कि मानवीय बुद्धि सत्यता को समझने में असमर्थ है। प्रोफेसर स्टीफेन हिक्स इसे ज्ञानमीमांसा की असफलता कहते है जिसके बीज कांट के क्रिटिक ऑफ प्योर रीजन में उपस्थित थे जिसको हीगल के व्याघाती सत्य की संकल्पना के साथ आगे संश्लेषित किया जाना था।
कालांतर में यह व्याघाती सत्य जीवन मे उपस्थित संघर्ष और कनफ्लिक्ट बन गया और मानवीय बुद्धि को तो इस प्रति-पुनर्जागरण के चिन्तनों के उग्र रूप में सत्य को समझने की राह में व्यवधान की तरह देखा गया।
यद्यपि जर्मनी से निकली प्रति पुनर्जागरण की धारा अपनी दिशा में नीत्शे, हाइडेगर और हुसर्ल आदि के दर्शन में फल फूल रही थी तथापि पाश्यात्य जगत में दर्शन की एक धारा थी जिसने पुनर्जागरण की मानवीय बुद्धि में विश्वास को जीवित रखा था। यह धारा एंग्लो-अमेरिकन परम्परा की धारा थी लेकिन इनके हाथों में दर्शन का स्वरूप अब वह नही रह गया जो आज तक दर्शन के स्वरूप के विषय मे पाश्चात्य जगत की परपरा थी। इस एंग्लो-अमेरिकन परम्परा के यह निष्कर्ष थे कि तत्त्वमिमनासा के कथन ही निर्रथक है अतएव अब अपनी भूमिका में दर्शन को विज्ञान का सबऑर्डिनेट बन जाना चाहिए तथा इसका काम किसी प्रकार का संश्लेषण नही वरन विश्लेषण होना चाहिए। इस धारा ने भाषा, चिन्हों, संकल्पनाओं का विश्लेषण प्रारम्भ कर दिया लेकिन तब तक ऊपर वर्णित विचारधारा स्वयम को स्थापित कर चुकी थी अतः दर्शन की इस विचारधारा और उस विचारधारा के मध्य एक खाई पैदा हो गई।
दर्शन के इतिहासकार इस घटना को एनालिटिकल-कॉन्टिनेंटल स्पिल्ट कहते है।
मजेदार बात यह है कि प्रति-पुनर्जागरण जे उत्तरआधुनिक दर्शन अमेरिकी विश्वविद्यालयों में फला फुला जबकि उनकी धारा तो विश्लेषणात्मक थी। इसका कारण यह है कि विश्लेषणात्मक दर्शन ने विकसित होकर इस तथ्य को उदघाटित किया कि भाषा अपने से इतर किसी के बारे में नही बता सकती अतः किसी वस्तुनिष्ठ यथार्थ के बारे में बात करना बेमानी है। हिक्स लिखते है कि जो बात कांट ने लगभग 200 वर्षो पूर्व की थी वही बात अब विश्लेषणात्मक दार्शनिक कर रहे थे और इसका प्रभाव यह हुवा की अमेरिकन विश्वविद्यालय नीत्शे और हाइडेगर आदि की तरफ झुकते चले गए।
अब समग्र पाश्चात्य जगत में वस्तुगत सत्यता एक मिथक था तथा बुद्धि भी उतनी बौद्धिक नही थी---इस स्थापना के साथ ही आधुनिक युग का अंत हो चुका था और हम उत्तरआधुनिक युग मे प्रवेश कर चुके थे।
दो:
नौलेज इज़ पावर--मिशेल फूको को पढ़ने के बाद स्पष्ट हो गया कि पूर्वाधुनिक काल की प्रवृतियां आधुनिक काल मे भी नही बदली और वास्तव में पुनर्जागरण का वह उद्देश्य की ज्ञान से मानव को उसके अज्ञानता की बेड़ियों से मुक्त करना है--वही, नए कलेवर में, ऋग्वेद के तमसो मा ज्योतिर्गमय पुनः प्रभुता (डोमिनेन्स) का एक हथियार ही बन गया और मार्क्सवादी विमर्शों की पूर्व आधुनिक काल का बाइनरी 'विप्र और शूद्र' आधुनिक काल मे एक नए शरीर के साथ उपस्थित हो जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि स्वयम मार्क्सवादी के पास इनको या तो देखने और महसूस करने की दृष्टि नही है या वो जानबूझ कर इनकी अनदेखी करते हैं।
सम्भवतः इसका कारण यह है कि मार्क्सवाद संरचनावाद के इर्द गिर्द बुना गया विमर्श और चिंतन है। इसकी जगत और मानवीय दशा की व्याख्या में अर्थव्यवस्था आधार रूप में उपस्थित है लेकिन अब हम इतिहास के उत्तरआधुनिक युग मे पहुंच गए है और इस युग की चेनता ने हमे दिखाया है कि सतह के नीचे कोई स्ट्रक्चर या आधार नही है।
दो बिम्ब--सतही और आधार की थ्योरी खत्म हो रही है। सतही और सामान्य अनुभव के पीछे कुछ है यथा इंद्रधनुष। इंद्रधनुष सतही बिम्ब है तथा इसका एक वैज्ञानिक विम्ब भी है जिसे 'आधार बिम्ब' कहा जाता रहा है, परन्तु यह आधार-बिम्ब भी अपने आप मे और जाननेवाले से इस प्रकार उलझा हुवा है कि अब विज्ञान और फिक्शन का अंतर मिटता प्रतीत हो रहा है।
आधुनिकता के पास एक प्रोजेक्ट था जिसके लिए उसने मनुष्य को केंद्र में स्थापित कर एक संरचना विकसित की थी। आधुनिकता के पास अपने आधुनिक मूल्य थे लेकिन उसके गर्भ में ही कुछ ऐसा भी पल रहा था जिसने उसे आगे अप्रसांगिक कर दिया और आधुनिकता की आशा को ही अब संशय से देखा जाने लगा। आधुनिकता ने जो संरचना बनाई थी, जो उद्देश्य बनाए थे, जो मूल्य रचे थे उसका क्षरण आरंभ हो गया। आधुनिकता इस क्षरण को त्रासदी के रूप में देखती है लेकिन उत्तरआधुनिकता का तो जन्म ही इसी में हुवा है अतः वह इस क्षरण को एन्जॉय करती है।
देज़ा वू!! आधुनिकता का जन्म भी तो पूर्वआधुनिकता के क्षरण में हुवा था। उसने भी तो ईश्वर का मजाक उड़ाया था। उत्तरआधुनिकता का जन्म भी आधुनिकता के क्षरण में हो रहा है और वह अब आधुनिकता के केंद्र वाले मनुष्य को चिढ़ा रही है।
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