वेश्या
तुम एक वेश्या हो, मात्र कामकला में सिद्धहस्त नही वरन पुरुष के काम मनोविज्ञान के अंतरतम की ज्ञाता। यह सँच है कि संस्कृति ने नर और मादा के सम्बन्ध को विवाह में बांध दिया है; एक नर और एक मादा लेकिन, प्रवृत्तियां कहाँ मानती हैं, जीवन तुम्हे अंदर ही अंदर ढूंढता है। इसलिए नही की तुम एक वेश्या हो बल्कि इसलिए की तुम जीवन की सबसे मूल प्रवृति को तृप्त कर देती हो; तृप्तिका!
तो क्या वह दूसरी स्त्री मेरी प्रवृत्तियों को तृप्त नही कर पाती? न ऐसा नही है लेकिन तुम्हारे पास आकर मुझे अपने पुरुष होने का अहसास और प्रबलता से होता है। मेरे पसीने से कमाए धन का तुम बढ़कर मोल चुकाती हो; तुम्हारे पास आकर मैं इस संस्कृति से बदला लेता हूँ; तुम्हारे पास हलाकि मैं चोरों की तरह आता हूँ लेकिन मेरा और तुम्हारा कुछ ऐसा नाता है कि मैं रोमांचित तो महसूस करता ही हूँ, अंततोगत्वा एक विजेता, नही विजेता पुरुष की भांति महसूस करता हूँ और इसमें तुम मेरे साथ कदम से कदम, हांथो से हाथ, कंधे से कंधा और सांसो से साँस मिलाकर चलती हो।
लेकिन तुमने उस दिन मेरे पूर्ण पुरुष होने के भ्रम को खंडित कर दिया था जब मैंने तुम्हारे आस-पास एक दूसरे पुरुष की उपस्थिति को महसूस किया था। उस दिन वह पुरूष तुम्हारी बातों में था, तुम्हारी आंखों में था, तुम्हारे शरीर पर मैंने उसके छाप महसूस किए थे, तुम्हारे पसीने में उसके पसीने की बदबू थी, तुम्हारी सांसों में उसके सांसों की दुर्गंध थी---- हाँ तुम वेश्या हो--मुझे तुमसे घृणा हो गई है---वेश्या!!
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