न्याय बनाम जैन और प्रमा
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ध्यातव्य है कि भारतीय परम्परा में ज्ञान और प्रमा के मध्य भेद है। प्रमा वैध ज्ञान है। ज्ञान जब प्रामाणिक हो जाता है तो वह ज्ञान प्रमा है। प्रश्न यह है कि ज्ञान में प्रमाणिकता कहां से आती है। क्या यह प्रमाणिकता अवबोधन या उपलब्धि की घटना के बाहर से आती है या प्रत्येक संज्ञानात्मक एपिसोड अपने अंदर ही इस प्रमाणिकता को लिए होता है?
न्याय और जैन दोनों ही यह स्वीकार करते है कि अवबोधन मात्र एक प्रक्रिया है, एक घटना मात्र।
किन्तु न्याय और जैन उक्त बात की सहमति के बावजूद आगे की स्थापनाओं में मौलिक रूप से अलग अलग मान्यताएं स्थापित करते हैं।
अवबोधन या संज्ञानात्मक एपिसोड मात्र एक घटना होने के कारण न्याय दर्शन की दृष्टि में इसमें प्रमाणिकता और और अप्रमाणिकता सम्बंधित संज्ञानात्मक एपिसोड के बाहर से आती है।
न्याय की मान्यता है कि कोई भी संज्ञान तभी वैध कहा जा सकता है जब उसमे "सफलप्रवृत्ति जनकत्व" अर्थात उसमे उसमे अर्थक्रियाकरित्व या उससे उस लक्ष्य की प्राप्ति हो जिसकी उससे आशा की जाती है।
ध्यातव्य है कि नैयायिकों की भाँति जैन दार्शनिकों की भी इस बात से सहमति है कि अवबोधन मात्र एक प्रक्रिया है किंतु इसे साथ वह यह भी स्वीकार करते हैं कि सत्य अत्यंत दुर्बोध है। अनन्त धर्मकम होने के कारण प्रत्येक संज्ञात्मक अवबोधन में ही सत्यता और असत्यता दोनों ही गुण उपस्थित है: कोई ज्ञान न तो पूर्ण रूप से सत्य है और न ही पूर्ण रूप से असत्य।
आशय यह कि प्रत्येक अवबोधन अपने संग ही अवबोधन के प्रमा या अप्रमा बनने के गुण लिए होता है और इस निर्धारण के लिए हमे उस संज्ञानत्मक एपिसोड से बाहर जाने की आवश्यकता ही नही है।
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बौद्ध और प्रमा
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द्रष्टव्य है कि नैयायिकों के विचार को जहाँ इस प्रकार-"प्रमाण्यम अप्रमाण्यम उभयम परत:" के सूत्र से अभिव्यक्त किया जा सकता है वही जैनियों के उक्त विचार को "प्रमाण्यम अप्रमाण्यम उभयम स्वतः" से।
बौद्ध विचारको के अनुसार "अप्रमाण्यम स्वतः प्रमाण्यम परत:"
अर्थात बौद्ध यह मानते हैं कि प्रत्येक संज्ञानत्मक अवबोधन अपनी उत्तपत्ति में ही अवैधता लिए होता है और उसकी प्रमाणिकता के लिए बाह्य कारक की सहायता लेनी पड़ती है। सरलता के लिए इसे इस प्रकार कहा जा सकता है कि प्रत्येक ज्ञान में मिथ्यात्व अंतर्निहित होता है और सत्य वाह्य कारणों से प्रतिष्ठित होता है और ये वाह्य कारक है: अविस्मवादित्व और अर्थक्रियाकरित्व।
तातपर्य यह है कि ज्ञान तभी सत्य होता है जब वह जीवन के अनुभव से बाधित नही होता और प्रत्याशित फल की उतपत्ति में सक्षम होता है।
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वेदांती, मीमांसक और प्रमा
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प्रमाण्यम स्वतः अप्रमाण्यम परत:
वेदांती और मीमांसक यह मानते है कि कोई भी संज्ञानत्मक अवबोधन प्रत्येक परिस्थिति में अपनी वैधता का लिए ही हमारे सम्मुख उपस्थित होता है: सारे ज्ञान, सारी उपलब्धियां, सारी कॉग्निटिव एपीसेड्स अपने आप मे वैध है और उनमें अवैधता उस संज्ञानत्मक एपिसोड के बाहर से आती है। वेदांती और मीमांसक यह मानते हैं कि हमारा समस्त अनुभव सहजरूप से प्रमाणिक है क्योकि ज्ञान-ज्ञान है, भ्रम नही। ज्ञान अप्रमाणिक तब बनता है जब उसमे कोई वाह्य व्यवधान उपस्थित होता है। ज्यो ही यह व्यवधान दूर होता है ज्ञान अपने रूप में हमारे सम्मुख उपलब्ध होने लगता है: ब्रह्म हमे उपलब्ध हो रहा है किंतु हमारे और ब्रह्म के मध्य एक व्यवधान माया है। माया के व्यवधान के तिरोहित होते ही हमे सत चित आनंद की उपलब्धि होने लगती है लेकिन इस व्यवधान की उपस्थिति तक हमे उपलब्ध नाम-रूप जगत भी असत नही है क्योकि ज्ञान कभी असत्य होता ही नही अतः जगत सत भी है और असत भी अर्थात जगत मिथ्या है जबकि ब्रह्म विशुद्ध सत।
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