Saturday, October 10, 2020

वैदिक चिंतन: एक

वैदिक चिंतन में प्राकृतिक शक्तियों का मानवीकरण किया गया और उन प्राकृतिक शक्तियों को वश में करने हेतु उनकी आराधना की जाती है। वैदिकों ने प्रत्येक प्राकृतिक घटना के संचालक की कल्पना कर उन्हें मानवीय रूप देने के साथ अलग अलग देवता को विभिन्न प्राकृतिक   घटनाओं को सम्बद्ध कर दिया था जिसे वेदों का बहुदेववाद कहते है।
किन्तु देवताओं की इस बहुलता में एक विशेषता थी कि जब किसी एक देवता की आराधना की जाती तो उसे ही सुप्रीम मान लिया जाता तथा बाकी अन्य देवता पृष्टभूमि में चले जाते फिर जब दूसरे देवता की आराधना की जाती तो यह दूसरा देवता प्रमुख हो जाता और बाकी अन्य देवता पृष्ठभूमि में चले जाते--मैक्समूलर इसे वेदों का हिनोथिज़्म कहते हैं। एकेश्वरवाद इसी हिनोथीज़्म की तार्किक निष्पत्ति रही है। 
मैक्समूलर इस एकाधिदेववाद को एकत्व की दिशा में ले जाने की सहज प्रवृत्ति की अचेतन अभिव्यक्ति मानते हुए बहुदेववाद और एकेश्वरवाद के मध्य विकास की एक निश्चित अवस्था कहते हैं।
यद्यपि मैक्समूलर के इस मत को अधिक लोगो का अनुमोदन प्राप्त नही हुवा क्योकि इस तरह का अतिश्योक्तिपूर्ण वर्णन सभी धार्मिक काव्यो में स्वाभाविक होता है जहाँ आराध्य ही प्रमुख होता है तथा अन्य देवता पृष्ठभूमि में चले जाते है, तथापि यह अवसरवादी एकेश्वरवाद नाना देवताओं के स्थान पर अकेले ईश्वर में विश्वास पैदा करने में सहायक हुवा।

यहाँ अब्रह्मीय धर्मो में एकेश्वरवाद की उत्तपत्ति पर दो शब्द वांछनीय होगा---

अब्राहमीय एकेश्वरवाद के सापेक्ष यदि भारतीय एकेश्वरवाद को रखें तो यह इसे अन्य कई मार्गों की भांति केवल एक मार्ग के रूप में स्वीकार करता है, क्योंकि "ईश्वर एक है", इस कथन का अभिप्राय भारतीय तथा अब्राहमीय परम्परा में गुणात्मक रूप से अलग है। जहाँ अब्राहमीय परम्परा में "एक" अलगाव और यूनिकनेस का भाव व्यक्त करता है वहीं, भारतीय परम्परा "एक" शब्द के अंदर सबको समाहित कर लेती है।
भारतीय परंपरा में एकेश्वरवाद की वैचारिक स्तर पर जगत के विविध घटनाक्रमो में एक सामान्य सिद्धान्त ढूंढ़ने के क्रम में एक आंतरिक निष्पत्ति है। 
अब्राहमीय परम्परा में एकेश्वरवाद की स्थापना का क्रम यह नही रहा है। यहाँ एकेश्वरवाद का सन्दर्भ अपेक्षाकृत सामाजिक अधिक रहा है तथा कई परिस्थितियों में इसे वाह्य रूप से अथवा समझौते के रूप में आरोपित किया गया है।
याहवा यहूदी धर्म के देवता हैं। प्रारम्भ में यह एक जनजातीय देवता थे जो जनजातियों के आपसी संघर्ष में इनके माध्ययम से उस जनजाति की, जिसके यह देवता थे, अपने मे उत्कृष्टता के विश्वास को, याहवा के एकमात्र स्वामित्व या लॉर्डशीप के द्वारा व्यक्त किया गया है।
जनजातियों द्वारा शासन तंत्र और राज्य के विकास के साथ यह उनके एकमात्र राष्ट्रीय देवता बन गए और तत्कालीन मौजूद अन्य जनजातियों के देवताओं की विशेषताओं और गुणों का इनमे विलय कर दिया गया।
तौहीद इस्लामी एकेश्वरवाद की अभिव्यक्ति है। शिर्क, तौहीद की प्रतिपक्षता है। इस्लामी शरीअत की शब्दावली में शिर्क का अर्थ अल्लाह के साथ उस के स्वामित्व, इबादत या नाम और गुणों में कोई साझीदार या सदृश बनाना है। शिर्क इस्लाम मे घोरतम पाप है।
क़ुरान में आया है, "अल्लाह त'आला अपने साथ शिर्क किए जाने को माफ़ नही करेगा, और इसके अतिरिक्त जिसे चाहेगा क्षमा कर देगा और जो अल्लाह के साथ शिर्क करे उसने अल्लाह पर भारी आरोप गढ़ा 【सुरतुन निसा :48】

हमे यही आरम्भ में ही एकेश्वरवाद और अद्वैतवाद का भेद भी स्पष्ट कर लेना चाहिए क्योंकि वेदों की दार्शनिक एकेश्वरवाद ढूंढने की प्रवृति ने एक अलग तरह के एकवाद--अद्वैतवाद को जन्म दिया।

एकेश्वरवाद ईश्वरविषयक चिंतन की एक संकल्पना है जिसकी मान्यतानुसार "ईश्वर एक है" जबकि अद्वैतवाद धर्म दर्शन का सम्प्रत्यय होते हुए भी एक तत्वमीमांसिय संकल्पना अधिक है। यह बात तब और अधिक स्पष्ट हो जाती है जब हम हम इस तथ्य पर विचार करते हैं कि ईश्वर उपासना, भक्ति, प्रेम आदि का विषय है जबकि अद्वैत के घटक आत्मा और ब्रह्म  विशुद्ध ज्ञान और अनुभूति के। एकेश्वरवाद की मान्यता के अनुसार यद्यपि "एक ईश्वर है" तथापि  इस सिद्धान्त में  इस संभावना को जगह मिल सकती है कि वह जगत और मानव से परे रहे। एकेश्वरवाद जगत की उतपत्ति के लिए तब ईश्वर के संकल्प के कारण शून्य से जगत की  सृष्टि स्वीकार करता है इसके उलट अद्वैतवाद जीव-जगत और उस परमसत्ता के एकत्व का संश्लेषण है जिसकी अभिव्यक्ति "अयमात्मा ब्रह्म", "अहम ब्रह्मास्मि" "तत्त्वममसि" आदि सूत्रों के मध्ययम से होती है।  कबीरदास जी इस अद्वैतवाद को निन्म दोहे से समझाते हैं: 
जल में कुंभ कुम्भ में जल है बाहर भीतर पानी
फूटा कुम्भ जल जलहि समाना, यह तथ कथौ गियानी।
अद्वैतवाद का प्रतिपाद्य विषय है आत्मा और ब्रह्म की एकता।

क्रमश:------

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