वास्तविकता 【एक】
■प्रतिज्ञा: यथार्थता चेतना से वाह्य उस विषय का वस्तुनिष्ठ गुण नही होता जो चेतना का विषय बनती है बल्कि यथार्थता मनस द्वारा रचित गुण है और इस गुण को मनस चेतना के विषय पर आरोपित करता है।
'जैसे ही हम यथार्थ पर चिंतन प्रारम्भ करते है, यह विशीर्ण हो जाती है: सर्वदर्शनसंग्रह।'
वास्तविकता पर विचार करते ही हमारा सामान्य अनुभव छिन्न-भिन्न होने लगता है और सहज यथार्थवाद टूटकर हमे असहज करने लगता है।
सहज यथार्थवाद की मान्यताओं को निम्न विन्दुओ में समाहित किया जा सकता है:
■वस्तु जो जाने जाते हैं वह हमारी चेतना से स्वतंत्र वाह्य जगत में अस्तित्वमान हैं अर्थात, हमारी चेतना उन वस्तुओं की रचना नही करती। उनका अस्तित्व तब भी होता है जब वह ज्ञान के विषय नही होते।
■ वस्तुओं में गुण उनकी अपनी निजी विशेषता होती है। उनके गुणधर्म ज्ञाता की चेतना में जन्म नही लेती।
■ वस्तुओं का गुणधर्म ज्ञाता की उपस्थिति में परिवर्तित नही हो जाता अर्थात यह ज्ञाता की चेतना से निरपेक्ष होता है।
■ सत्ता जैसा है वैसा ही हम उसका प्रत्यक्षीकरण करते हैं। आभास ही सत्यता है।
■ वस्तुओ का अव्यवहित ज्ञान होता है। ज्ञाता की चेतना और ज्ञेय को जोड़ने के लिए किसी अन्य माध्ययम की आवश्यकता नही होती।
■ वस्तु सार्वजनीन होते हैं अर्थात वह किसी ज्ञेय विशेष की चेतना ही उन्हें नही जानती बल्कि सभी ज्ञाता उस वस्तु को एक समान रूप में जानते हैं।
सामान्य जनमानस सामान्य स्थिति में ज्ञान-वस्तु-ज्ञेय के त्रिकोण में ऊपरोक्त 6 बातें चेतन-अचेतन रुप से स्वीकार करता है और इन 6 बातों पर ज्यादा तूल नही देता लेकिन ज्ञान-ज्ञेय-ज्ञाता का त्रिकोण यदि उपरोक्त 6 बातों को हमेशा पुष्ट ही करता तो क्या बात थी परन्तु समस्या यह है कि सामान्य अनुभव की कई प्रतीतियां आपस मे संगति नही रखती और उस विरोधाभास की व्याख्या करने के लिए हमे अपने सामान्य अनुभव विषयक सामान्य बातों में सुधार करनी पड़ती है।
इस सुधार के पश्चात जो वस्तुवाद जन्म लेता है वह सहज वस्तुवाद या सामान्य अनुभव वस्तुवाद नही रह जाता।
स्टीफ़ेन हॉकिंग अपनी पुस्तक "द ग्रैंड डिज़ाइन" में लिखते हैं: "आधुनिक भौतिकी के आने के पूर्व तक यह सामान्यतया यह सोंचा जाता था कि विश्व विषयक समस्त ज्ञान डायरेक्ट प्रेक्षण से प्राप्त किया जा सकता है क्योकि चीजें वास्तव में वैसी है जैसा उनकी हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ प्रत्यक्षीकरण करती हैं लेकिन आधुनिक भौतिकी की अप्रत्याशित सफलता जो कि फाइनमेन सरीखे विद्वानों के विचारो पर आधारित हैं और इन विद्वानों के ये विचार दैनिक जीवन के सामान्य अनुभवों से मेल नही खाते,ने यह सिद्ध कर दिया है कि वस्तु स्थिति वैसी नही है जैसा कि शास्त्रीय भौतिकी में सोचा जाता था।"
बर्ट्रेंड रसेल लिखते हैं: सहज यथार्थवाद भौतिकी की ओर ले जाता है, और भौतिकी, यदि सही है, यह सहज यथार्थवाद को गलत प्रदर्शित करती है।
अतः सहज यथार्थवाद, यदि सही है, तो गलत है: अतः यह गलत है।
इन विरिधाभासो से बचने के लिए हॉकिंग एक नए अप्रोच को अडॉप्ट करने की बात करते हैं:
मॉडल डिपेंडेंट रियलिज़्म।
मॉडल डिपेंडेंट रियलिज़्म या प्रतिमान आधारित वस्तुवाद इस विचार पर आधारित है कि हमारा मष्तिस्क हमारी इंद्रियों से प्राप्त इनपुट या प्रदत्तो को जगत का एक मॉडल या प्रतिमान या आकार बना कर इंटरप्रेट करता है और जब यह प्रतिमान घटनाओं की व्याख्या करने में सफल होते हैं तो हम इस प्रतिमान और इसके अवयवों में वास्तविकता को एक गुण के रूप में आरोपित करते हैं।
अब यहाँ एक समस्या उत्पन्न होती है कि यदि समान घटनाओं की व्याख्या करने के लिए उपलब्ध प्रतिमानों में से यदि एक से अधिक प्रतिमान घटनाओं की समान रूप से व्याख्या करने में सफल हो जाते हैं तो इन प्रतिमानों में से किसे वास्तविक माना जाय?
हॉकिंग कहते है कि ऐसी स्थिति में दोनों ही प्रतिमान यथार्थता का गुण लिए हुए हैं और इनमें से हम किस का चयन करते है यह हमारे लिए मात्र उनका मैटर ऑफ कनिविनिएंट होना है।
अल्बर्ट आइंस्टीन लिखते हैं:हम वास्तविकता को अपने समझने के प्रयास में उस व्यक्ति के समान हैं जो एक बन्द (रुकी हुई नही) घड़ी के मैकेनिज़्म को समझने के प्रयास में है। वह व्यक्ति घड़ी की मुख को देखता है, उसकी चलती हुई सुइयों को देखता है, अंदर से आती टिक-टिक की आवाज सुन सकता है लेकिन वह किसी भी प्रकार उस बन्द घड़ी को खोल नही सकता। वह व्यक्ति इंजीनियस है तो वह घड़ी के अंदर के मैकेनिज़्म की एक तस्वीर की कल्पना कर सकता है जो घड़ी के समस्त दृश्य चीजों की व्यख्या कर दे लेकिन यह इस बात को लेकर कभी सुनिश्चित नही हो सकता कि केवल उसकी कल्पित तस्वीर ही घड़ी के अंदर की मैकेनिज़्म की व्याख्या कर पाएगी।
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