Monday, October 12, 2020

उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष

उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष  【क】
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बौद्ध दार्शनिक दो प्रमाणों को स्वीकार करते हैं: प्रत्यक्ष और अनुमान हालांकि उनके मत में अनुमान का मूल्य अस्थायी मात्र है। पुनः यद्यपि बौद्ध दर्शन के सारे सम्प्रदाय प्रत्यक्ष को स्वीकार करते हैं तथापि उसके स्वरूप के विषय मे उनके मध्य तीव्र मतभेद है। उत्तरकालीन बौद्ध सम्प्रदायो को उनकी प्रत्यक्ष की अवधारणा के आधार पर वास्तववादी और प्रत्ययवादी, इन दो वर्गों में रखा जा सकता है। हीनयानी वास्तववादी हैं क्योकि ये वस्तुओ के अस्तित्व को चेतनावाह्य और चेतनानिरपेक्ष मानते हैं जबकि महायानी योगाचारी जहाँ वह्यरथो का जहाँ निषेध करते हैं वही मध्ययमिक इन्हें शून्य मानते हैं।
हमे यहाँ इस बात का ध्यान रखना होगा कि यद्यपि हीनयानी वह्यार्थो में विश्वास करते हैं तथापि बौद्ध दर्शन की मूल स्थापना के अनुसार ये क्षणभंगवाद का पालन करती हैं।

वैभाषिक और सौत्रान्तिक यद्यपि वाह्य जगत के अस्तित्व में विश्वस्त है तथापि वाह्य जगत का ज्ञान कैसे होता है इस पर उनका मतैक्य नही है।
वैभाषिकों के अनुसार वाह्य जगत का हमे प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। वस्तुओ की हमे ज्ञान में यथारूप उपलब्धि होती है किंतु सौत्रान्तिक इस प्रक्रिया में बौद्ध सिद्धान्त क्षणभंगवाद को लाकर वाह्य जगत विषयक हमारे ज्ञान को थोड़ा जटिल बना देता है।
बौद्ध क्षणभंगवाद के अनुसार कोई भी वस्तु दो क्षणों तक एक ही नही रहती--उनमें प्रतीत्यसमुत्पाद के अनुसार प्रत्येक क्षण परिवर्तन होता रहता है अतः जिस क्षण हमे किसी वस्तु का प्रत्यक्ष होता है उस समय के संस्कार हमारे चित में अंकित हो जाते हैं लेकिन जब तक हम इस संस्कार के अनुरूप किसी निर्णय पर पहुंचते है तब तक क्षणभंगवाद के अनुसार जिस वस्तु के कारण हमें संस्कार उतपन्न हुवा था वह परिवर्तित हो चुका होता है। ध्यातव्य है कि निर्णय के समय संस्कार उतपन्न करनेवाली वस्तु उपस्थित न होकर नष्ट हो चुकी होती है किंतु हमरा निर्णय उस विनिष्ट वस्तु के बारे में होता है और इस प्रकार सम्बंधित निर्णय में अनुमान शामिल हो जाता है और हम वाह्य जगत का प्रत्यक्ष नही करते बल्कि उसके विषय मे अनुमान द्वारा निर्णय देते हैं।

ध्यान देने योग्य बात है कि वास्तववादी होने के बावजूद वैभाषिक और सौत्रान्तिक द्रव्य और गुण के भेद को मानने से इनकार कर देते हैं क्योकि जहाँ औपनिषदिक चिंतन में द्रव्य की वास्तविक सत्ता है वहीं बौद्ध गुण मात्र को ही स्वीकार करते हुए गुणों के आधार या सब्स्ट्रेटम द्रव्य की कल्पना को व्यर्थ मानकर उसका निषेध कर देते हैं। इनके अनुसार जब हम यह निर्णय देते है कि "यह लाल है" तब हम लालपन को यह का विधेय बनाते है और यह निर्णय सविकल्प प्रत्यक्ष होने के कारण इसमें वस्तु के सवलक्षण में हमारी कल्पना का अंश समाहित होता है। अर्थात हम "स्वलक्षणों" पर अपनी कल्पना आरोपित कर "यह" कि रचना कर रहे होते हैं।
इस आरोपण के कारण हमारा प्रत्यक्ष शुद्ध संवेदना नही रहा जाता जो कि निर्विकल्प प्रत्यक्ष में होता है क्योकि निर्विकल्प प्रत्यक्ष में मन निष्क्रिय होता है।
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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【ख】

सौतन्त्रिक यद्यपि चेतनावाह्य वस्तुओ का अस्तित्व स्वीकार करता है तथापि उनके ज्ञान के विषय मे उसकी स्थापना है कि ये बाह्यार्थ अनुमान के आधार पर प्रमाणित होते हैं। 
हम वाह्य वस्तुओ को साक्षात नही जाते बल्कि उनके और हमारे मध्य ज्ञान के क्रम में एक मानसिक माध्ययम उपस्थित होता है। 
सौत्रान्तिको का यह विश्लेषण पाश्चात्य अनुभववादी दार्शनिक जॉन लॉक के रिप्रेजेंटेटिव रियलिज़्म अथवा प्रत्ययप्रतिनिधिवादी सिद्धान्त से बहुत हद तक साम्य रखता है।
ज्ञान की प्रक्रिया में इंद्रियों का वस्तुओ से सम्पर्क होता है और इस सम्पर्क के फलस्वरूप वस्तुओ के संस्कार मन पर अंकित होते हैं और हमे वस्तुओ की जगह उनके संस्कारो का ज्ञान होता है। यहाँ तीन बातें हो सकती है--प्रथम की वस्तुओ और उनके संस्कारो में संवादिता हो और ये संस्कार वस्तुओ को हुबहु प्रस्तुत करते हों या इन संस्कारों और वस्तुओ में कोई संवादिता ही न हो और इस प्रकार वस्तुओ के वास्तविक स्वरूप और उनके उस स्वरूप का जो हम उनके संस्कार के कारण ग्रहण करते है, का एक द्वैत उपस्थित हो सकता है। काँट के दर्शन में यह द्वैत अपनी जगह पाता है और काँट न्युमोना और फेनोमेना की बात करते हैं। न्युमोना "थिंग इन इटसेल्फ" है और ये अज्ञेय हैं। हम केवल फेनोमेना, जो कि इन  अज्ञेयो का एक सीमित ज्ञेय रूप है और जो संस्कार में अभिव्यक्त होता है, को ही जान सकते हैं।
ध्यातव्य है कि यहाँ बौद्ध वास्तवाद और काँट के दर्शन में एक सादृश्यता दृष्टिगत होती है तथापि दोनों के मत एक नही हैं।
'काँट की तरह बौद्ध वास्तववादी भी एक सदवस्तु (स्वलक्षण) मानता है, और प्रत्यक्ष में जैसी वह प्रकट होती है उसे मन के द्वारा उस पर अपनी कल्पना (कल्पना ही बुद्धिविशेष:) के आरोप किए जाने का फल मानता है लेकिन बौद्ध यह मानता है कि स्वलक्षण का ज्ञान होता है और इसलिए वह काँट के "थिंग इन इटसेल्फ" की तरह अज्ञेय नही है। एक और बात यह भी है कि मन सदवस्तु पर जिन कल्पनाओं का आरोप करता है, वे हूबहू वैसी नही है जैसी उन्हें काँट के मत में स्वीकार किया गया है।'

वैभाषिक और सौतन्त्रिको के अनुसार वाह्य और आंतरिक दोनों जगत की सत्ता स्वीकार की जाती है और इसीलिए इनके मत को समेकित रूप से "सर्वास्तिवाद" कहा जाता है। इनका कथन है "सर्वमस्ति"।  यद्यपि वाह्य तथा आंतरिक दोनों जगतो की सत्ता है तथापि इनका आधार क्षणिक धर्म है क्योकि ये निरंतर परिवर्तनशील हैं। ये धर्म ही स्वलक्षण या काँट की शब्दावली में "थिंग इन देमसेल्वस" हैं किन्तु इनके प्रत्यक्ष में मन की पाँच कल्पनाएँ शामिल होती हैं: 
जाति या सामान्य, गुण, कर्म, नाम और द्रव्य। प्रत्येक वस्तु इन्ही के माध्ययम से देखी जाती है।
किसी भी वस्तु का शुद्ध स्वलक्षण रूप दृषिटगत नही होता।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【ग】

सर्वास्तिवादी बौद्ध धर्म का सौतन्त्रिक सम्प्रदाय प्रत्यक्ष के विषय मे आधुनिक दर्शन की शब्दावली में "प्रत्ययप्रतिनिधिवाद" की स्थापना करता है किंतु बौद्ध दर्शन का विज्ञानवादी सम्प्रदाय ज्ञेय-ज्ञान-ज्ञाता के या वस्तु--विज्ञान--मनस या आत्मा के त्रिक से वस्तु और मनस का पूर्णतया निषेध कर विज्ञान मात्र की सत्ता स्वीकार करता है। विज्ञान मात्र की सत्ता स्वीकार करने के कारण ही इस सम्प्रदाय का नाम विज्ञानवादी है।
अस्तु, विज्ञानवाद के अनुसार न तो ज्ञाता का अस्तिव है और न ज्ञेय वस्तुओ का, बल्कि केवल प्रत्यय की सन्ततियो का ही अस्तित्व है। 
अर्थात "उद्दीपन सदैव अंदर होता है, बाहर से कदापि नही आता। ज्ञान का आकार(फॉर्म) कभी बाहर विद्यमान वस्तुओ के ऊपर निर्भर नही होता, बल्कि पूर्व के अनुभव के छोड़े हुए संस्कार या वासना से प्राप्त होता है। पिछले अनुभव का कारण एक अन्य संस्कार होता है और इस प्रकार एक अनादि संतान अनन्त तक चलती है।"  सौत्रान्तिक के प्रत्ययप्रतिनिधिवाद के अनुसार यद्यपि ज्ञान की प्रक्रिया में हमारा मन जाति, नाम, कर्म, गुण और द्रव्य की कल्पना बाह्यार्थ से प्राप्त संस्कारो पर आरोपित करता है किंतु विज्ञाननवादीयो के अनुसार विचार अपने अलावा किसी अन्य चीज़ की ओर संकेत नही करते और मात्र विज्ञानों की ही सत्ता है।

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उत्तरकालीन बौद्ध और प्रत्यक्ष 【घ】

वैभाषिक वाह्य एवम आंतरिक दोनों जगतो की सत्ता मानते है यद्यपि इनका आधार कोई सत्ता नही है और ये क्षण-क्षण परिवर्तनशील हैं और वाह्य जगत का अव्यव्हीत प्रत्यक्ष होता है। सौत्रान्तिक मत के अनुसार यह प्रत्यक्ष व्यव्हीत होता है; हमरा प्रत्यक्ष संस्कारो से होता है और हम इन संस्कारों के आधार पर एक वाह्य जगत को अनुमान द्वारा स्थापित करते हैं। विज्ञाननवादी   ज्ञाता और ज्ञेय को अनावश्यक मानकर विज्ञान मात्र की सत्ता को मानता है किंतु माध्यमिक ज्ञाता, ज्ञेय के साथ-साथ ज्ञान की तत्त्वता का भी निषेध कर परमार्थत: शून्यता की स्थापना करता है। माध्यमिक सम्प्रदाय की यह स्थापना शून्यवाद कही जाती है।
शून्यवाद की दो व्याख्याए दी जाती हैं: निहिलिज़्म या नि: शेषता और जगत की चतुष्कोटी विमुक्तता। 
इसमें पहली शून्यता की निषेधात्मक व्याख्या है और दूसरी सकारात्मक। 
चतुष्कोटी विमुक्तता का अर्थ यह है कि:
◆विश्व की विभिन्न वस्तुओं को हम सत्य नही कह सकते क्योकि सत्य का अर्थ निरपेक्ष होता है जबकि  चराचर जगत की सारी वस्तुए सापेक्ष हैं।
◆ विश्व की वस्तुओं को असत्य भी नही कह सकते क्योंकि  उनका हमे प्रत्यक्ष होता है।
◆विश्व की वस्तुओं को हम  एक साथ सत्य और असत्य भी नही कह सकते क्योंकि ऐसा कहना व्याघात होगा।
◆ हम विश्व की वस्तुओं के विषय मे यह भी नही कह सकते कि ये न सत्य हैं और न असत्य क्योकि यह आत्मविरोधी कथन होगा।
नागार्जुन वस्तुओ को चतुष्कोटिय तर्क पर कसने के पश्चात उन्हें शून्य प्रमाणित करते हैं और कहते है कि शून्यता ही निर्वाण है।

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