Friday, October 16, 2020

कल्याण हो!

वैभाषिक: वाह्य और आंतरिक दोनों जगतो का अस्तित्व है।
सौत्रान्तिक: यद्यपि बाह्य और आन्तरिक दोनों जगतो का अस्तित्व है तथापि वाह्य जगत का ज्ञान प्रत्यक्ष से नही बल्कि अनुमान से होता है साथ ही वाह्य जगत के ज्ञान में मानसिक माध्यम (विज्ञान या चेतना का प्रवाह) अनिवार्य रूप से उपस्थित होता है।
योगाचार: वाह्य जगत-चेतना का प्रवाह-आंतरिक जगत के त्रिक में मात्र विज्ञान या चेतना के प्रवाह की सत्ता होती है, वाह्य जगत और आंतरिक जगत नही होते।
माध्यमिक: तत्त्वतः तो किसी की सत्ता नही है, चेतना के प्रवाह की भी नही। तत्त्वतः सब कुछ शून्य है हाँ व्यवहारिक प्रयोजन हेतु संवृतिक जगत अवश्य मौजूद है।

बुद्ध कही बैठे इन चारों की बात यदि सुन रहे होते  जैसा कि मेरे अंदर बैठ कर उन्होंने इन चारों की बात सुनी, तो वो वहाँ भी इनसे कहते: 
तुमलोग कहते हो कि महायानी माध्यमिकों के विचार मेरी मेरी शिक्षाओं का उत्कर्ष है लेकिन मैंने तुम्हें प्रारम्भ में ही मना किया था कि तत्त्वमीमांसिय वाद-विवादों में मत पड़ना और व्यवहारिक जीवन और इसकी समस्याओ को सारे दार्शनिक वाद-विवाद और सिद्धान्त के ऊपर रखना किंतु तुम नही माने और तुमने संवृति और परमार्थ का द्वैत उपस्थित कर मेरे पथ पर चलने वालों के लिए समस्या खड़ी कर दी।
ठीक है, तो अब सुनो और बहुत ध्यान से सुनना---तुम कहते हो कि शून्यवाद मेरी बातों का उत्कर्ष है और तुम संवृति (व्यवहार) और परमार्थ का द्वैत उपस्थित कर देते हो। फिर तुम कहते हो कि तत्त्व शून्यता है। यह अवर्णनीय है। यह अपरप्रत्ययम है, यह शांतम है, यह प्रपंचरहितम है, यह निर्विकल्पम है, यह अनानार्थम है तो यह यह तुम्हारे संवृत्तिक जगत पर न प्रभाव डाल सकता है और न ही यह तुम्हारे संवृत्तिक जगत से प्रभावित हो सकता है, और तब इसकी सत्ता है या नही है इससे क्या प्रभाव पड़ता है, और तुम इस अनावश्यक चीज का भार क्यो ढोते हो, क्या तुम्हारा जीवन वैसे ही कम भारयुक्त है?
मैं तब भी कहता था कि व्यवहारिक जीवन और इसकी समस्याओ पर ध्यान दो और आज भी यही बात कह रहा हूँ।

कल्याण हो!!!!
-----☆★★★☆------

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