Friday, October 16, 2020

चेतना का प्रवाह

चेतना का प्रवाह मात्र क्षैतिज ही नही है बल्कि यह लम्बवत भी प्रवाहित है और इस प्रकार कई स्तरों में विभक्त है और इसका हर स्तर वास्तविकता की अभिव्यक्ति के विविध स्तरों में से सम्बंधित और संवादित स्तर से अनिवार्यत: गुंथित है, साथ ही चेतना के हरेक स्तर पर इसकी अपनी विविध अवस्थाएं भी उपस्थित हैं।
चेतना की इस विविध स्तरों पर उपस्थित विविध अवस्थाओं में आए जगत की किसी रूप को अवास्तविक नही कहा जा सकता, बल्कि किसी भी अन्य स्तर और अवस्था मे आए जगत की तुलना में भी किसी अन्य स्तर और अवस्था मे उपलब्ध जगत में से कोई ज्यादा वास्तविक नही कहा जा सकता।
हमारे पास यह कहने का क्या आधार की स्वप्न का जगत जाग्रत अवस्था के जगत से कम वास्तविक है जबकि हम यही नही तय कर सकते कि जाग्रत अवस्था का विश्व वास्तव में वास्तविक है या नही।
प्रत्ययवादी चिंतन में प्रयुक्त यथार्थ और आभास का द्वैत और इस द्वैत की पृष्ठभूमि में उभरा चिंतन का प्रतिमान बहुधा एक व्यायाम मात्र है जहाँ भाषाई अज्ञेयो से बुद्धि क्रीड़ा की जाती है। 
यदि प्लेटो की गुफा की दीवार पर किसी वास्तविक दुनिया के कारण ही छाया उभर रही हो और हम किसी भी तरह उस वास्तविक दुनिया तक न तो पहुंच सकते हों और न ही वह वास्तविक दुनिया हमे इस क्रीड़ा के अलावा जीवन के किसी अन्य पक्ष पर प्रभावीत करती हो तो उस वास्तविक दुनिया के बारे में चिंतन बुद्धि का अपव्यय है और चिंतन का उहलोक से इहलोक की ओर वापस उन्मुख हो जाना ही हमारे बौद्धिक होने की सार्थकता है।

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