Saturday, October 10, 2020

जैन---1

कर्म सिद्धान्त भारतीय दर्शन के प्राण हैं। भारतीय दर्शन मात्र अनवीक्षकी और बुद्धि विलास नही है। यह जीवन को, मनीषियों ने जैसा देखा चाहे वो जैन हों, बौद्ध हो, वेदांती हों या कोई भी, उसके उद्देश्य में स्थापित करने का साधन मात्र स्वीकार किया गया है। ध्यातव्य है कि कई परम्पराओ में दर्शन अपने आप मे साध्य है किंतु भारतवर्ष में चार्वाक विचारकों को यदि अपवाद में लें तो दर्शन तत्व साक्षत्कार का साधन मात्र रहा है और अविद्या को दूर करने का एक करण ताकि मनुष्य शब्दे निष्णात से आगे बढ़कर परे निष्णात हो जाय। 
भारतीय परंपरा में तत्वमीमांसिय विचारों का मोल तो रहा है किंतु विचारों पर आचरण की प्रमुखता सभी आस्तिक और नास्तिक सम्प्रदाय स्थापित करते हैं और इस कारण इस परंपरा में जितना विमर्श 'कर्म' पर हुवा है वह अद्वितीय है। 
मुझे याद है कि जब मैंने बेकन, जो कि आधुनिक पाश्चात्य दर्शन के जनक स्वीकार किए जाते है, के बारे में यह पढा की वह घूस लेते हुए पकड़े गए थे  तो मैं हतप्रभ हो गया था क्योकि मेरे अचेतन में दार्शनिक का अर्थ अच्छे आचरण वाला अंकित था। 
बहरहाल, समग्र भारतीय चिंतन की परम्पराओ में कर्म पर विमर्श हुए है तथापि जैनियों का कर्म सिद्धान्त अनूठा है। जैनियों का कर्म सिद्धान्त इस अर्थ में अनूठा है कि वो कर्म को पौद्गलिक स्वीकार करते है; कर्म के अणुओं की उपस्थिति में विश्वास करते हैं और उसी के अनुरूप उन्होंने अपनी बंधन और मोक्ष की संकल्पना को विकसित किया है।

जैन बौद्धों के विपरीत जीव या आत्मा की सत्ता को मानते है हालांकि जैन की जीव की अवधारणा और भारतीय दर्शन के विविध आस्तिक सम्प्रदायो की आत्मा की अवधारणा में भेद है। 
जैन दार्शनिकों के अनुसार जीव एक द्रव्य है। यह चेतन तथा आस्तिकाय या दिक में विस्तृत होता है। एक मात्र द्रव्य जो नास्तिकाय है वह काल है, शेष सभी द्रव्य जीव और अजीव आस्तिकाय हैं। 
अजीव आस्तिकाय द्रव्यो के अंतर्गत पुद्गल, आकाश, धर्म या गति और अधर्म या स्थिति को रखा गया है जबकि जीव को मुक्त और बद्ध में विभाजित किया गया है। 
जैन दर्शन में जीव चार स्वभावतः चार अनन्तताओ से परिपूर्ण होता है: अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त वीर्य और अनन्त आनन्द किन्तु ये अनन्तचतुष्टय मात्र मुक्त जीवों में अभिव्यक्त होती है। बद्ध होने की स्थिति में ये अनन्तताए ढकी होती है और वह आवरण जो इन अनन्तताओ को ढके रहता है वह है पौद्गलिक कर्म अथवा कर्म के अणु। अर्थात जैन विचार में जीव और कर्मपुद्गलों का संयोग होना ही बंधन है और इसी बंधन के कारण जीव जन्म ग्रहण करता है। जीव अपने कर्मो के अनुसार शरीर धारण करता है। जीव के अतीत कर्मो से जीव में वासनाएं पैदा हो जाती है और ये वासनाएं तृप्त होना चाहती हैं, परिणामस्वरूप वे पुद्गलों को अपनी ओर आकृष्ट कर जीव को शरीर से सम्बद्ध कर देती हैं।

जीव की ओर कर्म पुद्गलों का प्रवाह आस्रव कहा जाता है।
जैनियों के मत में जीव का कर्म पुद्गलों से विच्छेद ही मोक्ष है; इस विच्छेद के फलस्वरूप जीव पुनः अपनी अनन्तचतुष्टयता को अभिव्यक्त करने लगता है।
मोक्ष के लिए दो बातों का होना आवश्यक है--पहला की जीव की ओर नए कर्मपुद्गलों का प्रवाह रुक जाए और दूसरी जीव में प्रविष्ट पुराने कर्मपुद्गलों का विनाश हो जाय--इनमे पहली अवस्था संवर कहलाती है और द्वितीय अवस्था निर्जरा।

बद्ध जीव संवर और निर्जरा के द्वारा कर्मपुद्गलों से पूर्णतया मुक्त हो मुक्तावस्था को प्राप्त होता है।

-------☆★★★★☆--------

No comments:

Post a Comment

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण

डीहवार, चेरो और खरवार: एक भाषाई और ऐतिहासिक विश्लेषण भूमिका: भारतीय समाज की विभिन्न जनजातियाँ न केवल अपने ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भों में...