Friday, October 16, 2020

■बौद्ध दर्शन के सत्ययता की कसौटी की आलोचना

■बौद्ध दर्शन के सत्ययता की कसौटी की आलोचना

सत्यता की कसौटी क्या है इस प्रश्न पर प्राची और प्रतीची दोनों ही कि दार्शनिक परम्पराओ ने विचार किया है। सत्यता का संवादिता सिद्धान्त, सत्यता का ससंकत्ता सिद्धान्त, सत्यता का अर्थक्रियावादी सिद्धान्त आदि पाश्चात्य परम्परा में  सत्यता के विविध सिद्धान्त रहे है। भारतीय परंपरा में बौद्ध दार्शनिक सत के विषय मे कहते हैं कि "अर्थक्रियाकरित्वम लक्षणम सत"। अर्थात सत्यता की कसौटी उसका अर्थक्रियाकारी होना है। "अर्थक्रियाकरित्व लक्ष्णम सत"। अर्थ का अभिप्राय, प्रयोजन को पूर्ण करने का सामर्थ्य है। इसी आधार पर अनुवादकों ने  "प्रैगमटिज़्म" का अनुवाद "उपयोगितावाद" के साथ "अर्थक्रियावाद" भी किया है। 
ध्यातव्य है कि बौद्ध  "स्वतः अप्रमाण्य और परत: प्रमाण्यवादी हैं। अर्थात बौद्ध यह मानते है कि प्रत्येक ज्ञान अपनी उतपत्ति में अप्रामाणिक होता है और उसमे प्रमाणिकता इस ज्ञान की प्रक्रिया के बाहर से आती है और ज्ञान प्रकिया के बाहर जो तत्व ज्ञान को प्रमा बनाती है या प्रामाणिक करती है वह है ज्ञान से सम्बंधित अर्थकरियकरित्व। 

हम एक दृष्टांत के माध्ययम से बौद्ध मत की उपरोक्त इस स्थापना का परीक्षण करते है कि किस स्तर तक अर्थक्रियाकारित्व सत्य का निकष हो सकता है: 
माना एक व्यक्ति रात्रि में में सर्प देखता है और सर्प के भय से उसका ह्रदयाघात हो जाता है और उसकी मृत्यु हो जाती है। उस व्यक्ति के साथ चल रहा दूसरा व्यक्ति उस सर्प को मारने के लिए दौड़ता है और अत्यंत नज़दीक जाकर पाता है कि वह सर्प नही रज्जू है।
एक सर्प का अर्थक्रियाकरित्व क्या हो सकता है?
भय उतपन्न करना और इस तरह ऊपर के दृष्टांत में रज्जू सर्प के अर्थक्रियाकरित्व को उतपन्न कर रही है तो क्या इस स्थिति में रज्जू सर्प है?

इस दृष्टांत में ज्ञान स्वतः अप्रमाणिक भी है और परत: प्रमाणिक होने से उस व्यक्ति की सर्प के भय से मृत्यु भी हो जाती है तो क्या बौद्ध कहेंगे कि रज्जू वास्तव में सर्प ही है?

यहाँ बौद्ध दर्शन अपने द्वारा स्थापित क्षणभंगवाद से उत्पन्न विरोधाभास में फँस जाता है और सत्यता की कसौटी में अर्थक्रियाकरित्व के साथ "त्रिकालाबाधित्व" को नही रख पाता जो बौद्ध को उपरोक्त विरोधाभास से बचा सकता था।
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