Friday, October 16, 2020

उपनिषद और बुद्ध (एक)

संत ऑगस्टीन कहते हैं:-यदि मैं गलती करता हूँ तो मैं अस्तित्वमान हूँ।  
आशय है कि यद्यपि तत्वतः आत्मा की सत्ता न हो  तब भी व्यहारिक अहम की सत्ता स्वयम सिद्ध है क्योकि यदि प्रमाता की सत्ता न हो तो और प्रमाता की सत्ता को लेकर मुझे भ्रम है तो भी यह भ्रम ही मेरी सत्ता सिद्ध कर देता है।
नागसेन मिलिंद संवाद में यदि रथ की सत्ता न हो यह मात्र रथ के घटकों का समुच्चय ही हो तो भी रथ विषयक यह अविद्या किसको हो रही है? 
माना कि आंतरिक जगत में मात्र चेतना का प्रवाह है तथापि यह प्रवाह स्मृति द्वारा आपस मे सम्बद्ध है और स्मृति भी भ्रम हो तब भी प्रमाता की सत्ता उपस्थित है क्योकि प्रमाता चेतना के प्रवाह का स्मृति से सम्बद्ध होने के अलावा और क्या है तथा  यदि स्मृति भ्रम भी हो तो यह भ्रम किसी को होता है और देवदत्त  बुद्ध की चेतना के प्रवाहों से उस रूप में सम्बद्ध नही है जैसा वह सम्पुर्ण जगत में किसी एक की चेतना के प्रवाह से सम्बंधित है और वह देवदत्त स्वयम है। यह अन्य मनस का अज्ञान का अभाव भी प्रमाता की सत्ता सिद्ध करता है।

यद्यपि उपनिषद और बुद्ध दोनों ही प्रमाता की तात्त्विक सत्ता का निषेध करते हैं तथापि बुद्ध और उपनिषद के चिन्तनों में एक भेद है: उपनिषद प्रमाता का वृहतिकरण करते हुए  अंततः  उसकी ब्रह्म में स्थापना के साथ प्रमाता का निषेध करती है जबकि बुद्ध के दर्शन में इस सकारत्मकता का अभाव है और वह निषेध को ही लक्ष्य मान बैठते हैं और उसी के अनुरूप अपने विश्व दर्शन और नीतिशास्त्र की रचना करते हैं।

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