खलील जिब्रान को
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खलील,
ओ खलील,
सुलग रहा है ओरफेलीज़,
फँसा उनके कब्जे में।
तुम्हारे अलमुस्तफ़ा से
किसको मतलब,
किसको मकसूद तेरे
पयम्बर से।
चाह सबको बारूद की है।
तेरे किस्से,नज़्में ओ नसीहत,
किसी काम के न रहे,
बिक रहे बाजारों में ये
कौड़ियों के दाम या,
रौंदे जाते हैं बूटों के तले
उन बर्बरों के।
खलील,
सुलग रहा है ओरफेलीज़।
ओ खलील!
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