वासना
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हमारे मन की संरचना को इस दृष्टि से फ्रायड ने बड़े अच्छे से समझी-समझाई है।
इड-ईगो-सुपरईगो
यह वासना इड को सामाजिकता के लिए बलिदान करते हुए सुपरईगो के स्तर का शब्द है।
सामाजिकता के लिए मौलिक प्रवृत्ति का बलिदान देना होता है और आप इसे एक अच्छा शब्द संस्कार कह लीजिए।
समस्या यह है कि एक व्यक्ति में इड-ईगो-सुपर ईगो हमेशा बैलेंस में नही रह पाता, इनमे संघर्ष होता रहता है।
सुपरईगो इड को नियंत्रण में रखने के लिए कुछ माया रचता है, वासना एक ऐसा ही शब्द है।
भूख प्यास निंद तो जानवर में भी जैविक स्तर पर पाई जाती है, क्या उनमें वासना भी पाया जाता है?
नही, क्योकि यह जैविक चीज है ही नही बल्कि एक आवरण है उस व्यवस्था को संचालित करने के लिए जिसमे एक नर-एक मादा हो, वरना हम आपस मे ही लड़ मरेंगे, धर्म के लिए नही, पैसों के लिए नही, मादाओं के लिए।
लेकिन यह आवरण कोई धोखा नही है बल्कि मनुष्य में घटी एक बिल्कुल नवीन घटना है और मनुष्य मात्र जैविक स्तर पर ही नही बल्कि सांस्कृतिक स्तर पर भी अस्तित्वमान होता है।
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